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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 831, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 831
  • लङ्काकाण्ड *

८२१

तात कुसल कहु सुखनिधान की । सहित अनुज अरु मातु जानकी ॥ कपि सब चरित समास बखाने । भए दुखी मन महुँ पछिताने ॥

[भरतजी बोले—] हे तात! छोटे भाई लक्ष्मण तथा माता जानकीसहित सुखनिधान श्रीरामजीकी कुशल कहो। वानर (हनुमान्जी) ने संक्षेपमें सब कथा कही। सुनकर भरतजी दुखी हुए और मनमें पछिताने लगे ॥ १ ॥

अहह दैव मैं कत जग जायउँ । प्रभु के एकहु काज न आयउँ ॥ जानि कुअवसरु मन धरि धीरा । पुनि कपि सन बोले बलबीरा ॥

हा दैव! मैं जगत्में क्यों जन्मा? प्रभुके एक भी काम न आया। फिर कुअवसर (विपरीत समय) जानकर मनमें धीरज धरकर बलवीर भरतजी हनुमान्जीसे बोले— ॥ २ ॥

तात गहरु होइहि तोहि जाता । काजु नसाइहि होत प्रभाता ॥ चढु मम सायक सैल समेता । पठवौँ तोहि जहाँ कृपानिकेता ॥

हे तात! तुमको जानेमें देर होगी और सबेरा होते ही काम बिगड़ जायगा। [अतः] तुम पर्वतसहित मेरे बाणपर चढ़ जाओ, मैं तुमको वहाँ भेज दूँ जहाँ कृपाके धाम श्रीरामजी हैं ॥ ३ ॥

सुनि कपि मन उपजा अभिमाना । मोरें भार चलिहि किमि बाना ॥ राम प्रभाव बिचारि बहोरी । बंदि चरन कह कपि कर जोरी ॥

भरतजीकी यह बात सुनकर [एक बार तो] हनुमान्जीके मनमें अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझसे बाण कैसे चलेगा? [किन्तु] फिर श्रीरामचन्द्रजीके प्रभावका विचार करके वे भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले— ॥ ४ ॥

दो०— तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत ।

अस कहि आयसु पाड़ पद बंदि चलेउ हनुमंत ॥ ६० ( क ) ॥

हे नाथ! हे प्रभो! मैं आपका प्रताप हृदयमें रखकर तुरंत चला जाऊँगा। ऐसा कहकर आज्ञा पाकर और भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हनुमान्जी चले ॥ ६० ( क ) ॥

भरत बाहुबल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार ।

मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार ॥ ६० ( ख ) ॥

भरतजीके बाहुबल, शील (सुन्दर स्वभाव), गुण और प्रभुके चरणोंमें अपार प्रेमकी मन-ही-मन बारंबार सराहना करते हुए मारुति श्रीहनुमान्जी चले जा रहे हैं ॥ ६० ( ख ) ॥

उहाँ राम लछिमनहि निहारी । बोले बचन मनुज अनुसारी ॥ अर्ध राति गड़ कपि नहीं आयउ । राम उठाइ अनुज उर लायउ ॥