श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 831, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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तात कुसल कहु सुखनिधान की । सहित अनुज अरु मातु जानकी ॥ कपि सब चरित समास बखाने । भए दुखी मन महुँ पछिताने ॥
[भरतजी बोले—] हे तात! छोटे भाई लक्ष्मण तथा माता जानकीसहित सुखनिधान श्रीरामजीकी कुशल कहो। वानर (हनुमान्जी) ने संक्षेपमें सब कथा कही। सुनकर भरतजी दुखी हुए और मनमें पछिताने लगे ॥ १ ॥
अहह दैव मैं कत जग जायउँ । प्रभु के एकहु काज न आयउँ ॥ जानि कुअवसरु मन धरि धीरा । पुनि कपि सन बोले बलबीरा ॥
हा दैव! मैं जगत्में क्यों जन्मा? प्रभुके एक भी काम न आया। फिर कुअवसर (विपरीत समय) जानकर मनमें धीरज धरकर बलवीर भरतजी हनुमान्जीसे बोले— ॥ २ ॥
तात गहरु होइहि तोहि जाता । काजु नसाइहि होत प्रभाता ॥ चढु मम सायक सैल समेता । पठवौँ तोहि जहाँ कृपानिकेता ॥
हे तात! तुमको जानेमें देर होगी और सबेरा होते ही काम बिगड़ जायगा। [अतः] तुम पर्वतसहित मेरे बाणपर चढ़ जाओ, मैं तुमको वहाँ भेज दूँ जहाँ कृपाके धाम श्रीरामजी हैं ॥ ३ ॥
सुनि कपि मन उपजा अभिमाना । मोरें भार चलिहि किमि बाना ॥ राम प्रभाव बिचारि बहोरी । बंदि चरन कह कपि कर जोरी ॥
भरतजीकी यह बात सुनकर [एक बार तो] हनुमान्जीके मनमें अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझसे बाण कैसे चलेगा? [किन्तु] फिर श्रीरामचन्द्रजीके प्रभावका विचार करके वे भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले— ॥ ४ ॥
दो०— तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत ।
अस कहि आयसु पाड़ पद बंदि चलेउ हनुमंत ॥ ६० ( क ) ॥
हे नाथ! हे प्रभो! मैं आपका प्रताप हृदयमें रखकर तुरंत चला जाऊँगा। ऐसा कहकर आज्ञा पाकर और भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हनुमान्जी चले ॥ ६० ( क ) ॥
भरत बाहुबल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार ।
मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार ॥ ६० ( ख ) ॥
भरतजीके बाहुबल, शील (सुन्दर स्वभाव), गुण और प्रभुके चरणोंमें अपार प्रेमकी मन-ही-मन बारंबार सराहना करते हुए मारुति श्रीहनुमान्जी चले जा रहे हैं ॥ ६० ( ख ) ॥
उहाँ राम लछिमनहि निहारी । बोले बचन मनुज अनुसारी ॥ अर्ध राति गड़ कपि नहीं आयउ । राम उठाइ अनुज उर लायउ ॥