श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 832, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
वहाँ लक्ष्मणजीको देखकर श्रीरामजी साधारण मनुष्योंके अनुसार (समान) वचन बोले—आधी रात बीत चुकी, हनुमान् नहीं आये। यह कहकर श्रीरामजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको उठाकर हृदयसे लगा लिया ॥ १ ॥
सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ । बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ ॥ मम हित लागि तजेहु पितु माता । सहेहु बिपिन हिम आतप बाता ॥
[और बोले—] हे भाई! तुम मुझे कभी दुःखी नहीं देख सकते थे। तुम्हारा स्वभाव सदासे ही कोमल था। मेरे हितके लिये तुमने माता-पिताको भी छोड़ दिया और वनमें जाड़ा, गरमी और हवा सब सहन किया ॥ २ ॥
सो अनुराग कहाँ अब भाई । उठहु न सुनि मम बच बिकलाई ॥ जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू । पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू ॥
हे भाई! वह प्रेम अब कहाँ है? मेरे व्याकुलतापूर्ण वचन सुनकर उठते क्यों नहीं? यदि मैं जानता कि वनमें भाईका विछोह होगा तो मैं पिताका वचन [जिसका मानना मेरे लिये परम कर्तव्य था] उसे भी न मानता ॥ ३ ॥
सुत बित नारि भवन परिवारा । होहिं जाहिं जग बारहिं बारा ॥ अस बिचारि जियै जागहु ताता । मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥
पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार—ये जगत्में बार-बार होते और जाते हैं, परन्तु जगत्में सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता। हृदयमें ऐसा विचारकर हे तात! जागो ॥ ४ ॥
जथा पंख बिनु खग अति दीना । मनि बिनु फनि करिबर कर हीना ॥ अस मम जिवन बंधु बिनु तोही । जौं जड़ दैव जिआवै मोही ॥
जैसे पंख बिना पक्षी, मणि बिना सर्प और सूँड़ बिना श्रेष्ठ हाथी अत्यन्त दीन हो जाते हैं, हे भाई! यदि कहीं जड़ दैव मुझे जीवित रखे तो तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी ऐसा ही होगा ॥ ५ ॥
जैहउँ अवध कवन मुहु लाई । नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई ॥ बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं । नारि हानि बिसेष छति नाहीं ॥
स्त्रीके लिये प्यारे भाईको खोकर, मैं कौन-सा मुँह लेकर अवध जाऊँगा? मैं जगत्में बदनामी भले ही सह लेता (कि राममें कुछ भी वीरता नहीं है जो स्त्रीको खो बैठे)। स्त्रीकी हानिसे [इस हानिको देखते] कोई विशेष क्षति नहीं थी ॥ ६ ॥
अब अपलोकु सोकु सुत तोरा । सहिहि निठुर कठोर उर मोरा ॥ निज जननी के एक कुमारा । तात तासु तुम्ह प्रान अधारा ॥