श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 833, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
८३१
अब तो हे पुत्र! मेरा निष्ठुर और कठोर हृदय यह अपयश और तुम्हारा शोक दोनों ही सहन करेगा। हे तात! तुम अपनी माताके एक ही पुत्र और उसके प्राणाधार हो ॥७॥
सौंपैसि मोहि तुम्हहि गहि पानी । सब बिधि सुखद परम हित जानी ॥ उतरु काह दैहउँ तेहि जाई । उठि किन मोहि सिखावहु भाई ॥
सब प्रकारसे सुख देनेवाला और परम हितकारी जानकर उन्होंने तुम्हें हाथ पकड़कर मुझे सौंपा था। मैं अब जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा? हे भाई! तुम उठकर मुझे सिखाते (समझाते) क्यों नहीं? ॥८॥
बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन । स्वत सलिल राजिव दल लोचन ॥ उमा एक अखंड रघुराई । नर गति भगत कृपाल देखाई ॥
सोचसे छुड़ानेवाले श्रीरामजी बहुत प्रकारसे सोच कर रहे हैं। उनके कमलकी पँखुड़ीके समान नेत्रोंसे [विषादके आँसुओंका] जल बह रहा है। [शिवजी कहते हैं—] हे उमा! श्रीरघुनाथजी एक (अद्वितीय) और अखण्ड (वियोगरहित) हैं। भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवान्ने [लीला करके] मनुष्यकी दशा दिखलायी है ॥९॥
सो०—प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए वानर निकर । आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महाँ बीर रस ॥६१॥
प्रभुके [लीलाके लिये किये गये] प्रलापको कानोंसे सुनकर वानरोंके समूह व्याकुल हो गये। [इतनेमें ही] हनुमान्जी आ गये, जैसे करुणरस [के प्रसङ्ग] में वीररस [का प्रसङ्ग] आ गया हो ॥६१॥
हरषि राम भेटेउ हनुमाना । अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना ॥ तुरत बैद तब कीन्हि उपाई । उठि बैठे लछिमन हरषाई ॥
श्रीरामजी हर्षित होकर हनुमान्जीसे गले लगकर मिले। प्रभु परम सुजान (चतुर) और अत्यन्त ही कृतज्ञ हैं। तब वैद्य (सुषेण) ने तुरंत उपाय किया, [जिससे] लक्ष्मणजी हर्षित होकर उठ बैठे ॥१॥
हृदयं लाइ प्रभु भेटेउ भ्राता । हरषे सकल भालु कपि ब्राता ॥ कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा । जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा ॥
प्रभु भाईको हृदयसे लगाकर मिले। भालू और वानरोंके समूह सब हर्षित हो गये। फिर हनुमान्जीने वैद्यको उसी प्रकार वहाँ पहुँचा दिया जिस प्रकार वे उस बार (पहले) उसे ले आये थे ॥२॥