श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 834, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
यह ब्रूतांत दसानन सुनेऊ । अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ ॥ व्याकुल कुंभकरण पहिं आवा । बिबिध जतन करि ताहि जगावा ॥
यह समाचार जब रावणने सुना, तब उसने अत्यन्त विषादसे बार-बार सिर पीटा । वह व्याकुल होकर कुम्भकर्णके पास गया और बहुत-से उपाय करके उसने उसको जगाया ॥ ३ ॥
जागा निसिचर देखिअ कैसा । मानहुँ कालु देह धरि बैसा ॥ कुंभकरण बूझा कहु भाई । काहे तव मुख रहे सुखाई ॥
कुम्भकर्ण जगा (उठ बैठा) । वह कैसा दिखायी देता है मानो स्वयं काल ही शरीर धारण करके बैठा हो । कुम्भकर्णने पूछा—हे भाई ! कहो तो, तुम्हारे मुख सूख क्यों रहे हैं ? ॥ ४ ॥
कथा कही सब तेहिं अभिमानी । जेहि प्रकार सीता हरि आनी ॥ तात कपिन्ह सब निसिचर मारे । महा महा जोधा संघारे ॥
उस अभिमानी (रावण) —ने उससे जिस प्रकारसे वह सीताको हर लाया था [तबसे अबतककी] सारी कथा कही । [फिर कहा—] हे तात ! वानरोने सब राक्षस मार डाले । बड़े-बड़े योद्धाओंका भी संहार कर डाला ॥ ५ ॥
दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी । भट अतिकाय अकंपन भारी ॥ अपर महोदर आदिक बीरा । परे समर महि सब रनधीरा ॥
दुर्मुख, देवशत्रु (देवान्तक), मनुष्यभक्षक (नरान्तक), भारी योद्धा अतिकाय और अकम्पन तथा महोदर आदि दूसरे सभी रणधीर वीर रणभूमिमें मारे गये ॥ ६ ॥
दो०— सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरण बिलखान । जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान ॥ ६२ ॥
तब रावणके वचन सुनकर कुम्भकर्ण बिलखकर (दुखी होकर) बोला—अरे मूर्ख ! जगज्जननी जानकीको हर लाकर अब तू कल्याण चाहता है ? ॥ ६२ ॥
भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा । अब मोहि आइ जगाएहि काहा ॥ अजहुँ तात त्यागि अभिमाना । भजहु राम होइहि कल्याना ॥
हे राक्षसराज ! तूने अच्छा नहीं किया । अब आकर मुझे क्या जगाया ? हे तात ! अब भी अभिमान छोड़कर श्रीरामजीको भजो तो कल्याण होगा ॥ १ ॥
हैं दससीस मनुज रघुनायक । जाके हनुमान से पायक ॥ अहह बंधु तैं कीन्हि खोटार्ई । प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई ॥
हे रावण ! जिनके हनुमान्-सरीखे सेवक हैं, वे श्रीरघुनाथजी क्या मनुष्य हैं ? हाय भाई ! तूने बुरा किया, जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया ॥ २ ॥