श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
८३२
- रामचरितमानस *
यह ब्रूतांत दसानन सुनेऊ । अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ ॥ व्याकुल कुंभकरण पहिं आवा । बिबिध जतन करि ताहि जगावा ॥
यह समाचार जब रावणने सुना, तब उसने अत्यन्त विषादसे बार-बार सिर पीटा । वह व्याकुल होकर कुम्भकर्णके पास गया और बहुत-से उपाय करके उसने उसको जगाया ॥ ३ ॥
जागा निसिचर देखिअ कैसा । मानहुँ कालु देह धरि बैसा ॥ कुंभकरण बूझा कहु भाई । काहे तव मुख रहे सुखाई ॥
कुम्भकर्ण जगा (उठ बैठा) । वह कैसा दिखायी देता है मानो स्वयं काल ही शरीर धारण करके बैठा हो । कुम्भकर्णने पूछा—हे भाई ! कहो तो, तुम्हारे मुख सूख क्यों रहे हैं ? ॥ ४ ॥
कथा कही सब तेहिं अभिमानी । जेहि प्रकार सीता हरि आनी ॥ तात कपिन्ह सब निसिचर मारे । महा महा जोधा संघारे ॥
उस अभिमानी (रावण) —ने उससे जिस प्रकारसे वह सीताको हर लाया था [तबसे अबतककी] सारी कथा कही । [फिर कहा—] हे तात ! वानरोने सब राक्षस मार डाले । बड़े-बड़े योद्धाओंका भी संहार कर डाला ॥ ५ ॥
दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी । भट अतिकाय अकंपन भारी ॥ अपर महोदर आदिक बीरा । परे समर महि सब रनधीरा ॥
दुर्मुख, देवशत्रु (देवान्तक), मनुष्यभक्षक (नरान्तक), भारी योद्धा अतिकाय और अकम्पन तथा महोदर आदि दूसरे सभी रणधीर वीर रणभूमिमें मारे गये ॥ ६ ॥
दो०— सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरण बिलखान । जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान ॥ ६२ ॥
तब रावणके वचन सुनकर कुम्भकर्ण बिलखकर (दुखी होकर) बोला—अरे मूर्ख ! जगज्जननी जानकीको हर लाकर अब तू कल्याण चाहता है ? ॥ ६२ ॥
भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा । अब मोहि आइ जगाएहि काहा ॥ अजहुँ तात त्यागि अभिमाना । भजहु राम होइहि कल्याना ॥
हे राक्षसराज ! तूने अच्छा नहीं किया । अब आकर मुझे क्या जगाया ? हे तात ! अब भी अभिमान छोड़कर श्रीरामजीको भजो तो कल्याण होगा ॥ १ ॥
हैं दससीस मनुज रघुनायक । जाके हनुमान से पायक ॥ अहह बंधु तैं कीन्हि खोटार्ई । प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई ॥
हे रावण ! जिनके हनुमान्-सरीखे सेवक हैं, वे श्रीरघुनाथजी क्या मनुष्य हैं ? हाय भाई ! तूने बुरा किया, जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया ॥ २ ॥
- लङ्काकाण्ड *
८३३
कीन्हेहु प्रभु विरोध तेहि देवक । सिव बिरंचि सुर जाके सेवक ॥ नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा । कहतेउँ तोहि समय निरबहा ॥
हे स्वामी! तुमने उस परम देवताका विरोध किया, जिसके शिव, ब्रह्मा आदि देवता सेवक हैं। नारद मुनिने मुझे जो ज्ञान कहा था, वह मैं तुझसे कहता; पर अब तो समय जाता रहा ॥ ३ ॥
अब भरि अंक भेटु मोहि भाई । लोचन सुफल करौं मैं जाई ॥ स्याम गात सरसीरुह लोचन । देखौं जाइ ताप त्रय मोचन ॥
हे भाई! अब तो [अन्तिम बार] अँकवार भरकर मुझसे मिल ले। मैं जाकर अपने नेत्र सफल करूँ। तीनों तापोंको छुड़ानेवाले श्यामशरीर, कमलनेत्र श्रीरामजीके जाकर दर्शन करूँ ॥ ४ ॥
दो०— राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक । रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक ॥ ६३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके रूप और गुणोंको स्मरण करके वह एक क्षणके लिये प्रेममें मग्न हो गया। फिर रावणने करोड़ों घड़े मदिरा और अनेकों भैंसे मँगावाये ॥ ६३ ॥
महिष खाइ करि मदिरा पाना । गर्जा बज्राघात समाना ॥ कुंभकरण दुर्मद रन रंगा । चला दुर्ग तजि सेन न संगा ॥
भैंसे खाकर और मदिरा पीकर वह वज्राघात (बिजली गिरने) के समान गरजा। मदसे चूर, रणके उत्साहसे पूर्ण कुम्भकर्ण किला छोड़कर चला। सेना भी साथ नहीं ली ॥ १ ॥
देखि बिभीषनु आगें आयउ । परेउ चरन निज नाम सुनायउ ॥ अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो । रघुपति भक्त जानि मन भायो ॥
उसे देखकर विभीषण आगे आये और उसके चरणोंपर गिरकर अपना नाम सुनाया। छोटे भाईको उठाकर उसने हृदयसे लगा लिया और श्रीरघुनाथजीका भक्त जानकर वे उसके मनको प्रिय लगे ॥ २ ॥
तात लात रावन मोहि मारा । कहत परम हित मंत्र बिचारा ॥ तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ । देखि दीन प्रभु के मन भायउँ ॥
[विभीषणने कहा—] हे तात! परम हितकर सलाह एवं विचार कहनेपर रावणने मुझे लात मारी। उसी ग्लानिके मारे मैं श्रीरघुनाथजीके पास चला आया। दीन देखकर प्रभुके मनको मैं [बहुत] प्रिय लगा ॥ ३ ॥
८३४
- रामचरितमानस *
सुनु सुत भयउ कालबस रावन । सो कि मान अब परम सिखावन ॥ धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन । भयहु तात निसिचर कुल भूषन ॥
[कुम्भकर्णने कहा—] हे पुत्र! सुन, रावण तो कालके वश हो गया है (उसके सिरपर मृत्यु नाच रही है)। वह क्या अब उत्तम शिक्षा मान सकता है? हे विभीषण! तू धन्य है, धन्य है, धन्य है। हे तात! तू राक्षसकुलका भूषण हो गया ॥४॥
बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर । भजेहु राम सोभा सुख सागर ॥
हे भाई! तूने अपने कुलको देदीप्यमान कर दिया, जो शोभा और सुखके समुद्र श्रीरामजीको भजा ॥५॥
दो०—बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर ।
जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर ॥६४॥
मन, वचन और कर्मसे कपट छोड़कर रणधीर श्रीरामजीका भजन करना। हे भाई! मैं काल (मृत्यु)-के वश हो गया हूँ, मुझे अपना-पराया नहीं सूझता; इसलिये अब तुम जाओ ॥६४॥
बंधु बचन सुनि चला बिभीषन । आयउ जहैं त्रैलोक बिभूषन ॥
नाथ भूधराकार सरीरा । कुंभकरन आवत रनधीरा ॥
भाईके वचन सुनकर विभीषण लौट गये और वहाँ आये जहाँ त्रिलोकीके भूषण श्रीरामजी थे। [विभीषणने कहा—] हे नाथ! पर्वतके समान [विशाल] देहवाला रणधीर कुम्भकर्ण आ रहा है ॥१॥
एतना कपिन्ह सुना जब काना । किलकिलाइ धाए बलवाना ॥
लिए उठाइ बिटप अरु भूधर । कटकटाइ डारहिं ता ऊपर ॥
वानरोंने जब कानोंसे इतना सुना, तब वे बलवान् किलकिलाकर (हर्षध्वनि करके) दौड़े। वृक्ष और पर्वत [उखाड़कर] उठा लिये और [क्रोधसे] दाँत कटकटाकर उन्हें उसके ऊपर डालने लगे ॥२॥
कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा । करहिं भालु कपि एक एक बारा ॥
मुर्यो न मनु तनु टर्यो न टार्यो । जिमि गज अर्क फलनि को मार्यो ॥
रीछ-वानर एक-एक बारमें ही करोड़ों पहाड़ोंके शिखरोंसे उसपर प्रहार करते हैं; परन्तु इससे न तो उसका मन ही मुड़ा (विचलित हुआ) और न शरीर ही टाले टला, जैसे मदारके फलोंकी मारसे हाथीपर कुछ भी असर नहीं होता! ॥३॥
तब मारुतसुत मुठिका हन्यो । पर्यो धरनि व्याकुल सिर धुन्यो ॥
पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता । घुर्मित भूतल परेउ तुरंता ॥
- लङ्काकाण्ड *
८३५
तब हनुमान्जीने उसे एक घूँसा मारा; जिससे वह व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और सिर पीटने लगा। फिर उसने उठकर हनुमान्जीको मारा! वे चक्कर खाकर तुरंत ही पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४ ॥
पुनि नल नीलहि अवनि पछोरसि । जहँ तहँ पटक पटक भट डोरसि ॥ चली बलीमुख सेन पराई । अति भय त्रसित न कोउ समुहाई ॥
फिर उसने नल-नीलको पृथ्वीपर पछाड़ दिया और दूसरे योद्धाओंको भी जहाँ-तहाँ पटक-पटककर डाल दिया। वानरसेना भाग चली। सब अत्यन्त भयभीत हो गये, कोई सामने नहीं आता ॥ ५ ॥
दो०—अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव । काँख दाबि कपिराज कहँ चला अमित बल सीव ॥ ६५ ॥
सुग्रीवसमेत अंगदादि वानरोंको मूर्च्छित करके फिर वह अपरिमित बलकी सीमा कुम्भकर्ण वानरराज सुग्रीवको काँखमें दाबकर चला ॥ ६५ ॥
उमा करत रघुपति नरलीला । खेल गुरुड़ जिमि अहिगन मीला ॥ भूकृटि भंग जो कालहि खाई । ताहि कि सोहड़ ऐसि लराई ॥
(शिवजी कहते हैं—) हे उमा! श्रीरघुनाथजी वैसे ही नरलीला कर रहे हैं जैसे गुरुड़ सर्पोंके समूहमें मिलकर खेलता हो। जो भीहके इशारेमात्रसे (बिना परिश्रमके) कालको भी खा जाता है, उसे कहीं ऐसी लड़ाई शोभा देती है ? ॥ १ ॥
जग पावनि कीरति बिस्तरिहँहि । गाड़ गाड़ भवनधि नर तरिहँहि ॥ मुरुछा गड़ मारुतसुत जागा । सुग्रीवहि तब खोजन लागा ॥
भगवान् [इसके द्वारा] जगत्को पवित्र करनेवाली वह कीर्ति फैलायेंगे जिसे गा-गाकर मनुष्य भवसागरसे तर जायेंगे। मूर्च्छा जाती रही, तब मारुति हनुमान्जी जागे और फिर वे सुग्रीवको खोजने लगे ॥ २ ॥
सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती । निबुकि गयउ तेहि मृतक प्रतीती ॥ काटेसि दसन नासिका काना । गरजि अकास चलेउ तेहि जाना ॥
सुग्रीवकी भी मूर्च्छा दूर हुई, तब वे [मुर्दे-से होकर] खिसक गये (काँखसे नीचे गिर पड़े)। कुम्भकर्णने उनको मृतक जाना। उन्होंने कुम्भकर्णके नाक-कान दाँतोंसे काट लिये और फिर गरजकर आकाशकी ओर चले, तब कुम्भकर्णने जाना ॥ ३ ॥
गहेउ चरन गहि भूमि पछारा । अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा ॥ पुनि आयउ प्रभु पहँ बलवाना । जयति जयति जय कृपानिधाना ॥
उसने सुग्रीवका पैर पकड़कर उनको पृथ्वीपर पछाड़ दिया। फिर सुग्रीवने बड़ी फुर्तीसे उठकर उसको मारा। और तब बलवान् सुग्रीव प्रभुके पास आये और बोले—कृपानिधान प्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो ॥ ४ ॥
८३६
- रामचरितमानस *
नाक कान काटे जियँ जानी । फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी ॥ सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा । देखत कपि दल उपजी त्रासा ॥
नाक-कान काटे गये, ऐसा मनमें जानकर बड़ी ग्लानि हुई; और वह क्रोध करके लौटा। एक तो वह स्वभाव (आकृति)-से ही भयंकर था और फिर बिना नाक-कानका होनेसे और भी भयानक हो गया। उसे देखते ही वानरोंकी सेनामें भय उत्पन्न हो गया ॥ ५ ॥
दो०—जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह।
एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह ॥ ६६ ॥
‘रघुवंशमणिकी जय हो, जय हो, जय हो’ ऐसा पुकारकर वानर हूह करके दौड़े और सबने एक ही साथ उसपर पहाड़ और वृक्षोंके समूह छोड़े ॥ ६६ ॥
कुंभकरण रन रंग बिरुद्धा । सन्मुख चला काल जनु कुद्धा ॥ कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई । जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई ॥
रणके उत्साहमें कुम्भकर्ण विरुद्ध होकर [उनके] सामने ऐसा चला मानो क्रोधित होकर काल ही आ रहा हो। वह करोड़-करोड़ वानरोंको एक साथ पकड़-पकड़कर खाने लगा। [ वे उसके मुँहमें इस तरह घुसने लगे] मानो पर्वतकी गुफामें टिड़ियाँ समा रही हों ॥ १ ॥
कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा । कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा ॥ मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा । निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा ॥
करोड़ों (वानरों)-को पकड़कर उसने शरीरसे मसल डाला। करोड़ोंको हाथोंसे मलकर पृथ्वीकी धूलमें मिला दिया। [पेटमें गये हुए] भालू और वानरोंके ठट्ट-के-ठट्ट उसके मुख, नाक और कानोंकी राहसे निकल-निकलकर भाग रहे हैं ॥ २ ॥
रन मद मत्त निसाचर दर्पा । बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अपर्पा ॥ मुरे सुभट सब फिरिहिं न फेरे । सूझ न नयन सुनिहिं नहिं टेरे ॥
रणके मदमें मत्त राक्षस कुम्भकर्ण इस प्रकार गर्वित हुआ, मानो विधाताने उसको सारा विश्व अपर्ण कर दिया हो, और उसे वह ग्रास कर जायगा। सब योद्धा भाग खड़े हुए, वे लौटाये भी नहीं लौटते। आँखोंसे उन्हें सूझ नहीं पड़ता और पुकारनेसे सुनते नहीं ॥ ३ ॥
कुंभकरण कपि फौज बिडारी । सुनि धाई रजनीचर धारी ॥ देखी राम बिकल कटकाई । रिपु अनीक नाना बिधि आई ॥
- लङ्काकाण्ड *
८३७
कुम्भकर्णने वानर-सेनाको तितर-बितर कर दिया। यह सुनकर राक्षस-सेना भी दौड़ी। श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि अपनी सेना व्याकुल है और शत्रुकी नाना प्रकारकी सेना आ गयी है ॥ ४ ॥
दो०—सुनु सुग्रीव बिभीषण अनुज सँभारेहु सैन। मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन ॥ ६७ ॥
तब कमलनयन श्रीरामजी बोले—हे सुग्रीव! हे विभीषण! और हे लक्ष्मण! सुनो, तुम सेनाको सँभालना। मैं इस दुष्टके बल और सेनाको देखता हूँ ॥ ६७ ॥
कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा ॥ प्रथम कीन्हि प्रभु धनुष टँकोरा। रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा ॥
हाथमें शाईधनुष और कमरमें तरकस सजकर श्रीरघुनाथजी शत्रुसेनाको दलन करने चले। प्रभुने पहले तो धनुषका टँकार किया जिसकी भयानक आवाज सुनते ही शत्रुदल बहरा हो गया ॥ १ ॥
सत्यसंध छौड़े सर लच्छा। कालसर्प जनु चले सपच्छा ॥ जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा। लगे कटन भट बिकट पिसाचा ॥
फिर सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामजीने एक लाख बाण छोड़े। वे ऐसे चले मानो पंखवाले काल-सर्प चले हों। जहाँ-तहाँ बहुत-से बाण चले, जिनसे भयंकर राक्षस योद्धा कटने लगे ॥ २ ॥
कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा। बहुतक बीर होहिं सत खंडा ॥ घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं। उठि सँभारि सुभट पुनि लरहीं ॥
उनके चरण, छाती, सिर और भुजदण्ड कट रहे हैं। बहुत-से बीरोंके सौ-सौ टुकड़े हो जाते हैं। घायल चक्कर खा-खाकर पृथ्वीपर पड़ रहे हैं। उत्तम योद्धा फिर सँभलकर उठते और लड़ते हैं ॥ ३ ॥
लागत बान जलद जिमि गाजहिं। बहुतक देखि कठिन सर भाजहिं ॥ रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं। धरु धरु मारु मारु धुनि गावहिं ॥
बाण लगते ही वे मेघकी तरह गरजते हैं। बहुत-से तो कठिन बाणको देखकर ही भाग जाते हैं। बिना मुण्ड (सिर) के प्रचण्ड रुण्ड (धड़) दौड़ रहे हैं और 'पकड़ो, पकड़ो, मारो, मारो' का शब्द करते हुए गा (चिल्ला) रहे हैं ॥ ४ ॥
दो०—छन महँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच। पुनि रघुबीर निषंग महँ प्रबिसे सब नाराच ॥ ६८ ॥
प्रभुके बाणोंने क्षणमात्रमें भयानक राक्षसोंको काटकर रख दिया। फिर वे सब बाण लौटकर श्रीरघुनाथजीके तरकसमें घुस गये ॥ ६८ ॥
८३८
- रामचरितमानस *
कुंभकरण मन दीख बिचारी । हति छन माझ निसाचर धारी ॥ भा अति कुब्द महाबल बीरा । कियो मृगनायक नाद गँभीरा ॥
कुम्भकर्णने मनमें विचारकर देखा कि श्रीरामजीने क्षणमात्रमें राक्षसी सेनाका संहार कर डाला। तब वह महाबली वीर अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसने गम्भीर सिंहनाद किया ॥ १ ॥
कोपि महीधर लेड़ उपारी । डारड़ जहाँ मर्कट भट भारी ॥ आवत देखि सैल प्रभु भारे । सरन्हि काटि रज सम करि डारे ॥
वह क्रोध करके पर्वत उखाड़ लेता है और जहाँ भारी-भारी वानर योद्धा होते हैं, वहाँ डाल देता है। बड़े-बड़े पर्वतोंको आते देखकर प्रभुने उनको बाणोंसे काटकर धूलके समान (चूर-चूर) कर डाला ॥ २ ॥
पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक । छाँड़े अति कराल बहु सायक ॥ तनु महँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं । जिमि दामिनि घन माझ समाहीं ॥
फिर श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके धनुषको तानकर बहुत-से अत्यन्त भयानक बाण छोड़े। वे बाण कुम्भकर्णके शरीरमें घुसकर [पीछेसे इस प्रकार] निकल जाते हैं [कि उनका पता नहीं चलता], जैसे बिजलियाँ बादलमें समा जाती हैं ॥ ३ ॥
सोनित स्वत सोह तन कारे । जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे ॥ बिकल बिलोकि भालु कपि धाए । बिहँसा जबहिं निकट कपि आए ॥
उसके काले शरीरसे रुधिर बहता हुआ ऐसी शोभा देता है, मानो काजलके पर्वतसे गेरूके पनाले बह रहे हों। उसे व्याकुल देखकर रीछ-वानर दौड़े। वे ज्यों ही निकट आये, त्यों ही वह हँसा ॥ ४ ॥
दो०—महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस।
महि पटकड़ गजराज इव सपथ करड़ दससीस ॥ ६९ ॥
और बड़ा घोर शब्द करके गरजा। तथा करोड़-करोड़ वानरोंको पकड़कर वह गजराजकी तरह उन्हें पृथ्वीपर पटकने लगा और रावणकी दुहाई देने लगा ॥ ६९ ॥
भागे भालु बलीमुख जूथा । बूकु बिलोकि जिमि मेघ बरूथा ॥ चले भागि कपि भालु भवानी । बिकल पुकारत आरत बानी ॥
यह देखकर रीछ-वानरोंके झुंड ऐसे भागे जैसे भेंड़ियेको देखकर भेंड़ोंके झुंड। [शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! वानर-भालू व्याकुल होकर आर्तवाणीसे पुकारते हुए भाग चले ॥ १ ॥
यह निसिचर दुकाल सम अहई । कपिकुल देस परन अब चहई ॥ कृपा बारिधर राम खरारी । पाहि पाहि प्रनतारति हारी ॥
- लङ्काकाण्ड *
८३१
[वे कहने लगे—] यह राक्षस दुर्भिक्षके समान है, जो अब वानरकुलरूपी देशमें पड़ना चाहता है। हे कृपारूपी जलके धारण करनेवाले मेघरूप श्रीराम! हे खरके शत्रु! हे शरणागतके दुःख हरनेवाले! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये!! २ ॥
सकरुन बचन सुनत भगवाना। चले सुधारि सरासन बाना ॥ राम सेन निज पाछें घाली। चले सकोप महा बलसाली ॥
करुणाभरे वचन सुनते ही भगवान् धनुष-बाण सुधारकर चले। महाबलशाली श्रीरामजीने सेनाको अपने पीछे कर लिया और वे [अकेले] क्रोधपूर्वक चले (आगे बढ़े) ॥ ३ ॥
खैँचि धनुष सर सत संधाने। छूटे तीर सरीर समाने ॥ लागत सर धावा रिस भरा। कुधर डगमगत डोलति धरा ॥
उन्होंने धनुषको खींचकर सौ बाण सन्धान किये। बाण छूटे और उसके शरीरमें समा गये। बाणोंके लगते ही वह क्रोधमें भरकर दौड़ा। उसके दौड़नेसे पर्वत डगमगाने लगे और पृथ्वी हिलने लगी ॥ ४ ॥
लीन्ह एक तेहिँ सैल उपाटी। रघुकुलतिलक भुजा सोड़ काटी ॥ धावा बाम बाहु गिरि धारी। प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी ॥
उसने एक पर्वत उखाड़ लिया। रघुकुलतिलक श्रीरामजीने उसकी वह भुजा ही काट दी। तब वह बायें हाथमें पर्वतको लेकर दौड़ा। प्रभुने उसकी वह भुजा भी काटकर पृथ्वीपर गिरा दी ॥ ५ ॥
काटें भुजा सोह खल कैसा। पच्छहीन मंदर गिरि जैसा ॥ उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका। ग्रसन चहत मानहुँ त्रैलोका ॥
भुजाओंके कट जानेपर वह दुष्ट कैसी शोभा पाने लगा, जैसे बिना पंखका मन्दराचल पहाड़ हो। उसने उग्र दृष्टिसे प्रभुको देखा। मानो तीनों लोकोंको निगल जाना चाहता हो ॥ ६ ॥
दो०— करि चिवकार घोर अति धावा बदनु पसारि।
गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि ॥ ७० ॥
वह बड़े जोरसे चिघाड़ करके मुँह फैलाकर दौड़ा। आकाशमें सिद्ध और देवता डरकर हा! हा! इस प्रकार पुकारने लगे ॥ ७० ॥
सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो ॥ बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ ॥
करुणानिधान भगवान्ने देवताओंको भयभीत जाना। तब उन्होंने धनुषको कानतक तानकर राक्षसके मुखको बाणोंके समूहसे भर दिया। तो भी वह महाबली पृथ्वीपर न गिरा ॥ १ ॥
८४०
- रामचरितमानस *
सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा । काल त्रोन सजीव जनु आवा ॥ तब प्रभु कोपि तीव्र सर लीन्हा । धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा ॥
मुखमें बाण भरे हुए वह [प्रभुके] सामने दौड़ा। मानो कालरूपी सजीव तरकस ही आ रहा हो। तब प्रभुने क्रोध करके तीक्ष्ण बाण लिया और उसके सिरको धड़से अलग कर दिया ॥ २ ॥
सो सिर परेउ दसानन आगें । बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें ॥ धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा । तब प्रभु काटि कीन्ह दुड़ खंडा ॥
वह सिर रावणके आगे जा गिरा। उसे देखकर रावण ऐसा व्याकुल हुआ जैसे मणिके छूट जानेपर सर्प। कुम्भकर्णका प्रचण्ड धड़ दौड़ा, जिससे पृथ्वी धँसी जाती थी। तब प्रभुने काटकर उसके दो टुकड़े कर दिये ॥ ३ ॥
परे भूमि जिमि नभ तें भूधर । हेठ दाबि कपि भालु निसाचर ॥ तासु तेज प्रभु बदन समाना । सुर मुनि सबहिं अचंभव माना ॥
वानर-भालू और निशाचरोंको अपने नीचे दबाते हुए वे दोनों टुकड़े पृथ्वीपर ऐसे पड़े जैसे आकाशसे दो पहाड़ गिरे हों। उसका तेज प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके मुखमें समा गया। [यह देखकर] देवता और मुनि सभीने आश्चर्य माना ॥ ४ ॥
सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं । अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं ॥ करि बिनती सुर सकल सिधाए । तेही समय देवरिषि आए ॥
देवता नगाड़े बजाते, हर्षित होते और स्तुति करते हुए बहुत-से फूल बरसा रहे हैं। विनती करके सब देवता चले गये। उसी समय देवर्षि नारद आये ॥ ५ ॥
गगनोपरि हरि गुन गन गाए । रुचिर बीररस प्रभु मन भाए ॥ बेगि हतहु खल कहि मुनि गए । राम समर महि सोभत भए ॥
आकाशके ऊपरसे उन्होंने श्रीहरिके सुन्दर वीररसयुक्त गुणसमूहका गान किया, जो प्रभुके मनको बहुत ही भाया। मुनि यह कहकर चले गये कि अब दुष्ट रावणको शीघ्र मारिये। [उस समय] श्रीरामचन्द्रजी रणभूमिमें आकर [अत्यन्त] सुशोभित हुए ॥ ६ ॥
छं०—संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी । श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी ॥ भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने । कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने ॥
- लङ्काकाण्ड *
८४१
अतुलनीय बलवाले कोसलपति श्रीरघुनाथजी रणभूमिमें सुशोभित हैं। मुखपर पसीनेकी बूँदें हैं, कमलके समान नेत्र कुछ लाल हो रहे हैं। शरीरपर रक्तके कण हैं, दोनों हाथोंसे धनुष-बाण फिरा रहे हैं। चारों ओर रीछ-वानर सुशोभित हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभुकी इस छबिका वर्णन शेषजी भी नहीं कर सकते जिनके बहुत-से (हजार) मुख हैं।
दो०— निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम।
गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम ॥ ७१ ॥
[शिवजी कहते हैं—] हे गिरिजे! कुम्भकर्ण, जो नीच राक्षस और पापकी खान था, उसे भी श्रीरामजीने अपना परमधाम दे दिया! अतः वे मनुष्य [निश्चय ही] मन्दबुद्धि हैं जो उन श्रीरामजीको नहीं भजते ॥ ७१ ॥
दिन के अंत फिरीं द्वौ अनी । समर भई सुभटन्ह श्रम घनी ॥ राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा । जिमि तून पाइ लाग अति डाढ़ा ॥
दिनका अन्त होनेपर दोनों सेनाएँ लौट पड़ीं। [आजके युद्धमें] योद्धाओंको बड़ी थकावट हुई; परन्तु श्रीरामजीकी कृपासे वानरसेनाका बल उसी प्रकार बढ़ गया जैसे घास पाकर अग्नि बहुत बढ़ जाती है ॥ १ ॥
छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती । निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती ॥ बहु बिलाप दसकंधर करई । बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई ॥
उधर राक्षस दिन-रात इस प्रकार घटते जा रहे हैं जिस प्रकार अपने ही मुखसे कहनेपर पुण्य घट जाते हैं। रावण बहुत विलाप कर रहा है। बार-बार भाई (कुम्भकर्ण) का सिर कलेजेसे लगाता है ॥ २ ॥
रोवहिं नारि हृदय हति पानी । तासु तेज बल बिपुल बखानी ॥ मेघनाद तेहि अवसर आयउ । कहि बहु कथा पिता समुझायउ ॥
स्त्रियाँ उसके बड़े भारी तेज और बलको बखान करके हाथोंसे छाती पीट-पीटकर रो रही हैं। उसी समय मेघनाद आया और उसने बहुत-सी कथाएँ कहकर पिताको समझाया ॥ ३ ॥
देखेहु कालि मोरि मनुसाई । अबहिं बहुत का करौं बड़ाई ॥ इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ । सो बल तात न तोहि देखायउँ ॥
[और कहा—] कल मेरा पुरुषार्थ देखियेगा। अभी बहुत बड़ाई क्या करूँ? हे तात! मैंने अपने इष्टदेवसे जो बल और रथ पाया था वह बल [और रथ] अबतक आपको नहीं दिखलाया था ॥ ४ ॥
एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना । चहुँ दुआर लागे कपि नाना ॥ इत कपि भालु काल सम बीरा । उत रजनीचर अति रनधीरा ॥
८४२
- रामचरितमानस *
इस प्रकार डींग मारते हुए सबेरा हो गया। लंकाके चारों दरवाजोंपर बहुत-से वानर आ डटे। इधर कालके समान वीर वानर-भालू हैं और उधर अत्यन्त रणधीर राक्षस ॥ ५ ॥
लरहिं सुभट निज निज जय हेतू । बरनि न जाइ समर खगकेतू ॥
दोनों ओरके योद्धा अपनी-अपनी जयके लिये लड़ रहे हैं। हे गरुड़! उनके युद्धका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ६ ॥
दो०—मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास ।
गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास ॥ ७२ ॥
मेघनाद उसी (पूर्वोक्त) मायामय रथपर चढ़कर आकाशमें चला गया और अट्टहास करके गरजा, जिससे वानरोंकी सेनामें भय छा गया ॥ ७२ ॥
सक्ति सूल तरवारि कृपाना । अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना ॥ डारइ परसु परिघ पाषाना । लागेउ बृष्टि करै बहु बाना ॥
वह शक्ति, शूल, तलवार, कृपाण आदि अस्त्र, सस्त्र एवं वज्र आदि बहुत-से आयुध चलाने तथा फरसे, परिघ, पत्थर आदि डालने और बहुत-से बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥ १ ॥
दस दिसि रहे बान नभ छाई । मानहुँ मघा मेघ झरि लाई ॥ धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना । जो मारइ तेहि कोउ न जाना ॥
आकाशमें दसों दिशाओंमें बाण छा गये, मानो मघा नक्षत्रके बादलोंने झड़ी लगा दी हो। 'पकड़ो, पकड़ो, मारो' ये शब्द कानोंसे सुनायी पड़ते हैं। पर जो मार रहा है उसे कोई नहीं जान पाता ॥ २ ॥
गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं । देखहिं तेहि न दुखित फिरि आवहिं ॥ अवघट घाट बाट गिरि कंदर । माया बल कीन्हेसि सर पंजर ॥
पर्वत और वृक्षोंको लेकर वानर आकाशमें दौड़कर जाते हैं। पर उसे देख नहीं पाते, इससे दुखी होकर लौट आते हैं—मेघनादने मायाके बलसे अटपटी घाटियों, रास्तों और पर्वत-कन्दराओंको बाणोंके पिंजरे बना दिये (बाणोंसे छा दिया) ॥ ३ ॥
जाहिं कहाँ व्याकुल भए बंदर । सुरपति बंदि परे जनु मंदर ॥ मारुतसुत अंगद नल नीला । कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला ॥
अब कहाँ जायँ, यह सोचकर (रास्ता न पाकर) वानर व्याकुल हो गये। मानो पर्वत इन्द्रकी कैदमें पड़े हों। मेघनादने मारुति हनुमान्, अंगद, नल और नील आदि सभी बलवानोंको व्याकुल कर दिया ॥ ४ ॥
- लङ्काकाण्ड *
८४३
पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषण । सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन ॥ पुनि रघुपति सैं जूझै लागा । सर छोड़इ होइ लागहिं नागा ॥
फिर उसने लक्ष्मणजी, सुग्रीव और विभीषणको बाणोंसे मारकर उनके शरीरोंको चलनी कर दिया। फिर वह श्रीरघुनाथजीसे लड़ने लगा। वह जो बाण छोड़ता है, वे साँप होकर लगते हैं ॥ ५ ॥
व्याल पास बस भए खरारी । स्वबस अनंत एक अबिकारी ॥ नट इव कपट चरित कर नाना । सदा स्वतंत्र एक भगवाना ॥
जो स्वतन्त्र, अनन्त, एक (अखण्ड) और निर्विकार हैं, वे खरके शत्रु श्रीरामजी [लीलासे] नागपाशके वशमें हो गये (उससे बँध गये)। श्रीरामचन्द्रजी सदा स्वतन्त्र, एक, (अद्वितीय) भगवान् हैं। वे नटकी तरह अनेकों प्रकारके दिखावटी चरित्र करते हैं ॥ ६ ॥
रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो । नागपास देवन्ह भय पायो ॥
रणकी शोभाके लिये प्रभुने अपनेको नागपाशमें बँधा लिया; किन्तु उससे देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥ ७ ॥
दो०— गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास ।
सो कि बंध तर आवड़ व्यापक बिस्व निवास ॥ ७३ ॥
[शिवजी कहते हैं—] हे गिरिजे! जिनका नाम जपकर मुनि भव (जन्म-मृत्यु) की फाँसीको काट डालते हैं, वे सर्वव्यापक और विश्वनिवास (विश्वके आधार) प्रभु कहीं बन्धनमें आ सकते हैं ? ॥ ७३ ॥
चरित राम के सगुन भवानी । तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी ॥ अस बिचारि जे तग्य बिरागी । रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी ॥
हे भवानी! श्रीरामजीकी इन सगुण लीलाओंके विषयमें बुद्धि और वाणीके बलसे तर्क (निर्णय) नहीं किया जा सकता। ऐसा विचारकर जो तत्त्वज्ञानी और विरक्त पुरुष हैं वे सब तर्क (शंका) छोड़कर श्रीरामजीका भजन ही करते हैं ॥ १ ॥
व्याकुल कटकु कीन्ह घननादा । पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा ॥ जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा । सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा ॥
मेघनादने सेनाको व्याकुल कर दिया। फिर वह प्रकट हो गया और दुर्वचन कहने लगा। इसपर जाम्बवान्ने कहा—अरे दुष्ट! खड़ा रह। यह सुनकर उसे बड़ा क्रोध बढ़ा ॥ २ ॥
बूढ़ जानि सठ छोड़ैउँ तोही । लागेसि अधम पचौरै मोही ॥ अस कहि तरल त्रिसूल चलायो । जामवंत कर गहि सोड़ धायो ॥
८४४
- रामचरितमानस *
अरे मूर्ख! मैंने बूढ़ा जानकर तुझको छोड़ दिया था। अरे अधम! अब तू मुझीको ललकारने लगा है? ऐसा कहकर उसने चमकता हुआ त्रिशूल चलाया। जाम्बवान् उसी त्रिशूलको हाथसे पकड़कर दौड़ा ॥ ३ ॥
मारिसि मेघनाद कै छाती । परा भूमि घुर्मित सुरघाती ॥ पुनि रिसान गहि चरन फिरायो । महि पछारि निज बल देखरायो ॥
और उसे मेघनादकी छातीपर दे मारा। वह देवताओंका शत्रु चक्कर खाकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। जाम्बवान्ने फिर क्रोधमें भरकर पैर पकड़कर उसको घुमाया और पृथ्वीपर पटककर उसे अपना बल दिखलाया ॥ ४ ॥
बर प्रसाद सो मरड़ न मारा । तब गहि पद लंका पर डारा ॥ इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो । राम समीप सपदि सो आयो ॥
[किन्तु] वरदानके प्रतापसे वह मारे नहीं मरता। तब जाम्बवान्ने उसका पैर पकड़कर उसे लंकापर फेंक दिया। इधर देवरिषि नारदजीने गरुड़को भेजा। वे तुरंत ही श्रीरामजीके पास आ पहुँचे ॥ ५ ॥
दो०— खगपति सब धरि खाए माया नाग बरुथ ।
माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ ॥ ७४ (क) ॥
पक्षिराज गरुड़जी सब माया-सर्पोंके समूहोंको पकड़कर खा गये। तब सब वानरोंके झुंड मायासे रहित होकर हर्षित हुए ॥ ७४ (क) ॥
गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ ।
चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ ॥ ७४ (ख) ॥
पर्वत, वृक्ष, पत्थर और नख धारण किये वानर क्रोधित होकर दौड़े। निशाचर विशेष व्याकुल होकर भाग चले और भागकर किलेपर चढ़ गये ॥ ७४ (ख) ॥
मेघनाद कै मुरछा जागी । पितहि बिलोकि लाज अति लागी ॥
तुरत गयउ गिरिबर कंदरा । करौं अजय मख अस मन धरा ॥
मेघनादकी मूर्च्छा छूटी, [तब] पिताको देखकर उसे बड़ी शर्म लगी। मैं अजय (अजेय होनेको) यज्ञ करूँ, ऐसा मनमें निश्चय करके वह तुरंत श्रेष्ठ पर्वतकी गुफामें चला गया ॥ १ ॥
इहाँ बिभीषण मंत्र बिचारा । सुनहु नाथ बल अतुल उदारा ॥
मेघनाद मख करड़ अपावन । खल मायावी देव सतावन ॥
यहाँ विभीषणने यह सलाह विचारी [और श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—] हे अतुलनीय बलवान् उदार प्रभो! देवताओंको सतानेवाला दुष्ट, मायावी मेघनाद अपवित्र यज्ञ कर रहा है ॥ २ ॥
- लङ्काकाण्ड *
८४५
जों प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि । नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि ॥ सुनि रघुपति अतिसय सुख माना । बोले अंगदादि कपि नाना ॥
हे प्रभो! यदि वह यज्ञ सिद्ध हो पायेगा तो हे नाथ! फिर मेघनाद जल्दी जीता न जा सकेगा। यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने बहुत सुख माना और अंगदादि बहुत-से वानरोंको बुलाया [और कहा—] ॥ ३ ॥
लछिमन संग जाहु सब भाई । करहु बिधंस जग्य कर जाई ॥ तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही । देखि सभय सुर दुख अति मोही ॥
हे भाइयो! सब लोग लक्ष्मणके साथ जाओ और जाकर यज्ञको विध्वंस करो। हे लक्ष्मण! संग्राममें तुम उसे मारना। देवताओंको भयभीत देखकर मुझे बड़ा दुःख है ॥ ४ ॥
मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई । जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई ॥ जामवंत सुग्रीव विभीषण । सेन समेत रहेहु तीनिउ जन ॥
हे भाई! सुनो, उसको ऐसे बल और बुद्धिके उपायसे मारना, जिससे निशाचरका नाश हो। हे जाम्बवान्, सुग्रीव और विभीषण! तुम तीनों जने सेनासमेत [इनके] साथ रहना ॥ ५ ॥
जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन । कटि निषंग कसि साजि सरासन ॥ प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा । बोले घन इव गिरा गँभीरा ॥
[इस प्रकार] जब श्रीरघुवीरने आज्ञा दी, तब कमरमें तरकस कसकर और धनुष सजाकर (चढ़ाकर) रणधीर श्रीलक्ष्मणजी प्रभुके प्रतापको हृदयमें धारण करके मेघके समान गम्भीर वाणी बोले— ॥ ६ ॥
जों तेहि आजु बधें बिनु आवौं । तौ रघुपति सेवक न कहावौं ॥ जों सत संकर करहिं सहाई । तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई ॥
यदि मैं आज उसे बिना मारे आऊँ, तो श्रीरघुनाथजीका सेवक न कहलाऊँ। यदि सैकड़ों शङ्कर भी उसकी सहायता करें तो भी श्रीरघुवीरकी दुहाई है; आज मैं उसे मार ही डालूँगा ॥ ७ ॥
दो०— रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत । अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत ॥ ७५ ॥
श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें सिर नवाकर शेषावतार श्रीलक्ष्मणजी तुरंत चले। उनके साथ अंगद, नील, मयंद, नल और हनुमान् आदि उत्तम योद्धा थे ॥ ७५ ॥
जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा । आहुति देत रुधिर अरु भैंसा ॥ कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा । जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा ॥
८४६
- रामचरितमानस *
वानरोंने जाकर देखा कि वह बैठा हुआ खून और भैंसेकी आहुति दे रहा है। वानरोंने सब यज्ञ विध्वंस कर दिया। फिर भी जब वह नहीं उठा, तब वे उसकी प्रशंसा करने लगे ॥ १ ॥
तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई । लातन्हि हति हति चले पराई ॥ तै त्रिसूल धावा कपि भागे । आए जहाँ रामानुज आगे ॥
इतनेपर भी वह न उठा, [तब] उन्होंने जाकर उसके बाल पकड़े और लातोंसे मार-मारकर वे भाग चले। वह त्रिशूल लेकर दौड़ा, तब वानर भागे और वहाँ आ गये जहाँ आगे लक्ष्मणजी खड़े थे ॥ २ ॥
आवा परम क्रोध कर मारा । गर्ज घोर रव बारहिं बारा ॥ कोपि मरुतसुत अंगद धाए । हति त्रिसूल उर धरनि गिराए ॥
वह अत्यन्त क्रोधका मारा हुआ आया और बार-बार भयंकर शब्द करके गरजने लगा। मारुति (हनुमान्) और अंगद क्रोध करके दौड़े। उसने छातीमें त्रिशूल मारकर दोनोंको धरतीपर गिरा दिया ॥ ३ ॥
प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा । सर हति कृत अनंत जुग खंडा ॥ उठि बहोरि मारुति जुबराजा । हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा ॥
फिर उसने प्रभु श्रीलक्ष्मणजीपर प्रचण्ड त्रिशूल छोड़ा। अनन्त (श्रीलक्ष्मणजी) ने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये। हनुमान्जी और युवराज अंगद फिर उठकर क्रोध करके उसे मारने लगे, पर उसे चोट न लगी ॥ ४ ॥
फिरे बीर रिपु मरइ न मारा । तब धावा करि घोर चिकारा ॥ आवत देखि क्रुद्ध जनु काला । लछिमन छाड़े बिसिख कराला ॥
शत्रु (मेघनाद) मारे नहीं मरता, यह देखकर जब वीर लौटे, तब वह घोर चिम्घाड़ करके दौड़ा। उसे क्रुद्ध कालकी तरह आता देखकर लक्ष्मणजीने भयानक बाण छोड़े ॥ ५ ॥
देखेसि आवत पबि सम बाना । तुरत भयउ खल अंतरधाना ॥ बिबिध बेष धरि करइ लराई । कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई ॥
वज्रके समान बाणोंको आते देखकर वह दुष्ट तुरंत अन्तर्धान हो गया और फिर भाँति-भाँतिके रूप धारण करके युद्ध करने लगा। वह कभी प्रकट होता था और कभी छिप जाता था ॥ ६ ॥
देखि अजय रिपु डरपे कीसा । परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा ॥ लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा । एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा ॥
- लङ्काकाण्ड *
८४७
शत्रुको पराजित न होता देखकर वानर डरे। तब सर्पराज शेषजी (लक्ष्मणजी) बहुत ही क्रोधित हुए। लक्ष्मणजीने मनमें यह विचार दृढ़ किया कि इस पापीको मैं बहुत खेला चुका [अब और अधिक खेलाना अच्छा नहीं, अब तो इसे समाप्त ही कर देना चाहिये।] ॥७॥
सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा । सर संधान कीन्ह करि दापा ॥ छाड़ा बान माझ उर लागा । मरती बार कपटु सब त्यागा ॥
कोसलपति श्रीरामजीके प्रतापका स्मरण करके लक्ष्मणजीने वीरोचित दर्प करके बाणका सन्धान किया। बाण छोड़ते ही उसकी छातीके बीचमें लगा। मरते समय उसने सब कपट त्याग दिया ॥८॥
दो०—रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छोंड़ेसि प्रान ।
धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान ॥७६॥
रामके छोटे भाई लक्ष्मण कहाँ हैं? राम कहाँ हैं? ऐसा कहकर उसने प्राण छोड़ दिये। अंगद और हनुमान् कहने लगे—तेरी माता धन्य है, धन्य है, [जो तू लक्ष्मणजीके हाथों मरा और मरते समय श्रीराम-लक्ष्मणको स्मरण करके तूने उनके नामोंका उच्चारण किया।] ॥७६॥
बिनु प्रयास हनुमान उठायो । लंका द्वार राखि पुनि आयो ॥ तासु मरन सुनि सुर गंधर्बा । चढ़ि बिमान आए नभ सर्बा ॥
हनुमान्जीने उसको बिना ही परिश्रमके उठा लिया और लङ्काके दरवाजेपर रखकर वे लौट आये। उसका मरना सुनकर देवता और गन्धर्व आदि सब विमानोंपर चढ़कर आकाशमें आये ॥१॥
बरषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं । श्रीरघुनाथ बिमल जसु गावहिं ॥ जय अनंत जय जगदाधारा । तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा ॥
वे फूल बरसाकर नगाड़े बजाते हैं और श्रीरघुनाथजीका निर्मल यश गाते हैं। हे अनन्त! आपकी जय हो, हे जगदाधार! आपकी जय हो। हे प्रभो! आपने सब देवताओंका [महान् विपत्तिसे] उद्धार किया ॥२॥
अस्तुति करि सुर सिद्ध सिधाए । लछिमन कृपासिंधु पहिं आए ॥ सुत बध सुना दसानन जबहीं । मुरुछित भयउ परेउ महि तबहीं ॥
देवता और सिद्ध स्तुति करके चले गये, तब लक्ष्मणजी कृपाके समुद्र श्रीरामजीके पास आये। रावणने ज्यों ही पुत्रवधका समाचार सुना, त्यों ही वह मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥३॥
मंदोदरी रुदन कर भारी । उर ताड़न बहु भाँति पुकारी ॥ नगर लोग सब व्याकुल सोचा । सकल कहहिं दसकंधर पोचा ॥
मन्दोदरी छाती पीट-पीटकर और बहुत प्रकारसे पुकार-पुकारकर बड़ा भारी विलाप करने लगी। नगरके सब लोग शोकसे व्याकुल हो गये। सभी रावणको नीच कहने लगे ॥४॥
८४८
- रामचरितमानस *
दो०—तब दसकंठ बिबिधि बिधि समुझाई सब नारि। नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि ॥ ७७ ॥
तब रावणने सब स्त्रियोंको अनेकों प्रकारसे समझाया कि समस्त जगत्का यह (दृश्य) रूप नाशवान् है, हृदयमें विचारकर देखो ॥ ७७ ॥
तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन ॥ पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनरे ॥
रावणने उनको ज्ञानका उपदेश किया। वह स्वयं तो नीच है, पर उसकी कथा (बातें) शुभ और पवित्र है। दूसरोंको उपदेश देनेमें तो बहुत लोग निपुण होते हैं। पर ऐसे लोग अधिक नहीं हैं जो उपदेशके अनुसार आचरण भी करते हैं ॥ १ ॥
निसा सिरानि भयउ भिनुसारा। लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा ॥ सुभट बोलाइ दसानन बोला। रन सन्मुख जा कर मन डोला ॥
रात बीत गयी, सबेरा हुआ। रीछ-वानर [फिर] चारों दरवाजोंपर जा डटे। योद्धाओंको बुलाकर दशमुख रावणने कहा—लड़ाईमें शत्रुके सम्मुख जिसका मन डाँवाडोल हो, ॥ २ ॥
सो अबहीं बरु जाउ पराई। संजुग बिमुख भएँ न भलाई ॥ निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा। देहउँ उत्तरु जो रिपु चढ़ि आवा ॥
अच्छा है वह अभी भाग जाय। युद्धमें जाकर विमुख होने (भागने) में भलाई नहीं है। मैंने अपनी भुजाओंके बलपर वैर बढ़ाया है। जो शत्रु चढ़ आया है, उसको मैं [अपने ही] उत्तर दे लूँगा ॥ ३ ॥
अस कहि मरुत बेग रथ साजा। बाजे सकल जुझाऊ बाजा ॥ चले बीर सब अतुलित बली। जनु कज्जल कै आँधी चली ॥
ऐसा कहकर उसने पवनके समान तेज चलनेवाला रथ सजाया। सारे जुझाऊ (लड़ाईके) बाजे बजने लगे। सब अतुलनीय बलवान् वीर ऐसे चले मानो काजलकी आँधी चली हो ॥ ४ ॥
असगुन अमित होहिं तेहि काला। गनइ न भुज बल गर्ब बिसाला ॥
उस समय असंख्य अशकुन होने लगे। पर अपनी भुजाओंके बलका बड़ा गर्व होनेसे रावण उन्हें गिनता नहीं है ॥ ५ ॥
छं०—अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्वरहिं आयुध हाथ ते। भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते ॥ गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने। जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने ॥
- लङ्काकाण्ड *
८४९
अत्यन्त गर्वके कारण वह शकुन-अशकुनका विचार नहीं करता। हथियार हाथोंसे गिर रहे हैं। योद्धा रथसे गिर पड़ते हैं। घोड़े, हाथी साथ छोड़कर चिघाड़ते हुए भाग जाते हैं। स्यार, गीध, कौए और गदहे शब्द कर रहे हैं। बहुत अधिक कुत्ते बोल रहे हैं। उल्लू ऐसे अत्यन्त भयानक शब्द कर रहे हैं, मानो कालके दूत हों (मृत्युका सँदेश सुना रहे हों)।
दो०—ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहूँ मन बिश्राम।
भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम ॥ ७८ ॥
जो जीवोंके द्रोहमें रत है, मोहके वश हो रहा है, रामविमुख है और कामासक्त है, उसको क्या कभी स्वप्नमें भी सम्पत्ति, शुभ शकुन और चित्तकी शान्ति हो सकती है ? ॥ ७८ ॥
चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बहु धारा ॥
बिबिधि भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल बरन पताक ध्वज नाना ॥
राक्षसोंकी अपार सेना चली। चतुरंगिनी सेनाकी बहुत-सी टुकड़ियाँ हैं। अनेकों प्रकारके वाहन, रथ और सवारियाँ हैं तथा बहुत-से रंगोंकी अनेकों पताकाएँ और ध्वजाएँ हैं ॥ १ ॥
चले मत्त गज जूथ घनेरे। प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे ॥
बरन बरन बिरदैत निकाया। समर सूर जानहिं बहु माया ॥
मतवाले हाथियोंके बहुत-से झुंड चले। मानो पवनसे प्रेरित हुए वर्षा-ऋतुके बादल हों। रंग-बिरंगे बाना धारण करनेवाले वीरोंके समूह हैं, जो युद्धमें बड़े शूरवीर हैं और बहुत प्रकारकी माया जानते हैं ॥ २ ॥
अति बिचित्र बाहिनी बिराजी। बीर बसंत सेन जनु साजी ॥
चलत कटक दिगसिंधुर डगहीं। छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं ॥
अत्यन्त विचित्र फौज शोभित है। मानो वीर वसन्तने सेना सजायी हो। सेनाके चलनेसे दिशाओंके हाथी डिगने लगे, समुद्र क्षुभित हो गये और पर्वत डगमगाने लगे ॥ ३ ॥
उठी रेनु रबि गयउ छपाई। मरुत शक्ति बसुधा अकुलाई ॥
पनव निसान घोर रव बाजहिं। प्रलय समय के घन जनु गाजहिं ॥
इतनी धूल उड़ी कि सूर्य छिप गये। [फिर सहसा] पवन रुक गया और पृथ्वी अकुला उठी। ढोल और नगाड़े भीषण ध्वनिसे बज रहे हैं; जैसे प्रलयकालके बादल गरज रहे हों ॥ ४ ॥
भेरि नफीरि बाज सहनाई। मारु राग सुभट सुखदाई ॥
केहरि नाद बीर सब करहीं। निज निज बल पौरुष उच्चरहीं ॥
भेरी, नफीरी (तुरही) और शहनाईमें योद्धाओंको सुख देनेवाला मारु राग बज रहा है। सब वीर सिंहनाद करते हैं और अपने-अपने बल-पौरुषका बखान कर रहे हैं ॥ ५ ॥
८५०
- रामचरितमानस *
कहइ दसानन सुनुहु सुभट्टा । मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा ॥ हौं मारिहुउँ भूप द्वौ भाई । अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई ॥
रावणने कहा—हे उत्तम योद्धाओ! सुनो। तुम रीछ-वानरोंके ठट्टको मसल डालो। और मैं दोनों राजकुमार भाइयोंको मारूँगा। ऐसा कहकर उसने अपनी सेना सामने चलायी ॥ ६ ॥
यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई । धाए करि रघुबीर दोहाई ॥
जब सब वानरोंने यह खबर पायी, तब वे श्रीरघुवीरकी दुहाई देते हुए दौड़े ॥ ७ ॥
छं०—धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते । मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बृंद नाना बान ते ॥ नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं । जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं ॥
वे विशाल और कालके समान कराल वानर-भालू दौड़े। मानो पंखवाले पर्वतोंके समूह उड़ रहे हों। वे अनेक वर्णोंके हैं। नख, दाँत, पर्वत और बड़े-बड़े वृक्ष ही उनके हथियार हैं। वे बड़े बलवान् हैं और किसीका भी डर नहीं मानते। रावणरूपी मतवाले हाथीके लिये सिंहरूप श्रीरामजीका जय-जयकार करके वे उनके सुन्दर यशका बखान करते हैं।
दो०—दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि ।
भिरे बीर इत रामहि उत्त रावनहि बखानि ॥ ७९ ॥
दोनों ओरके योद्धा जय-जयकार करके अपनी-अपनी जोड़ी जान (चुन)-कर इधर श्रीरघुनाथजीका और उधर रावणका बखान करके परस्पर भिड़ गये ॥ ७९ ॥
रावनु रथी बिरथ रघुबीरा । देखि विभीषण भयउ अधीरा ॥ अधिक प्रीति मन भा संदेहा । बंदि चरन कह सहित सनेहा ॥
रावणको रथपर और श्रीरघुवीरको बिना रथके देखकर विभीषण अधीर हो गये। प्रेम अधिक होनेसे उनके मनमें सन्देह हो गया [कि वे बिना रथके रावणको कैसे जीत सकेंगे]। श्रीरामजीके चरणोंकी वन्दना करके वे स्नेहपूर्वक कहने लगे ॥ १ ॥
नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना । केहि बिधि जितब बीर बलवाना ॥ सुनुहु सखा कह कृपानिधाना । जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना ॥
हे नाथ! आपके न रथ है, न तनकी रक्षा करनेवाला कवच है और न जूते ही हैं। वह बलवान् वीर रावण किस प्रकार जीता जायगा? कृपानिधान श्रीरामजीने कहा—हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है ॥ २ ॥
- लङ्काकाण्ड *
८५१
सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ॥ बल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे ॥
शौर्य और धैर्य उस रथके पहिये हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इन्द्रियोंका वशमें होना) और परोपकार—ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समतारूपी डोरीसे रथमें जोड़े हुए हैं ॥३॥
ईस भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना ॥ दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा । बर बिग्यान कठिन कोदंडा ॥
ईश्वरका भजन ही [उस रथको चलानेवाला] चतुर सारथि है। वैराग्य ढाल है और सन्तोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है ॥४॥
अमल अचल मन त्रोन समाना । सम जम नियम सिलीमुख नाना ॥ कवच अभेद बिप्र गुर पूजा । एहि सम बिजय उपाय न दूजा ॥
निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकसके समान है। शम (मनका वशमें होना), [अहिंसादि] यम और [शौचादि] नियम—ये बहुत-से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरुका पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजयका दूसरा उपाय नहीं है ॥५॥
सखा धर्ममय अस रथ जाकें । जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें ॥
हे सखे! ऐसा धर्ममय रथ जिसके हो उसके लिये जीतनेको कहीं शत्रु ही नहीं है ॥६॥
दो०— महा अजय संसार रिपु जीति सकड़ सो बीर ।
जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनुह सखा मतिधीर ॥ ८० ( क ) ॥
हे धीरबुद्धिवाले सखा! सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार (जन्म-मृत्यु)-रूपी महान् दुर्जय शत्रुको भी जीत सकता है [रावणकी तो बात ही क्या है] ॥८० (क)॥
सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज ।
एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज ॥ ८० (ख) ॥
प्रभुके वचन सुनकर विभीषणजीने हर्षित होकर उनके चरणकमल पकड़ लिये [और कहा—] हे कृपा और सुखके समूह श्रीरामजी! आपने इसी बहाने मुझे [महान्] उपदेश दिया ॥८० (ख)॥
उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान ।
लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन ॥ ८० (ग) ॥
उधरसे रावण ललकार रहा है और इधरसे अंगद और हनुमान्। राक्षस और रीछ-बानर अपने-अपने स्वामीकी दुहाई देकर लड़ रहे हैं ॥८० (ग)॥