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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 851, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 851
  • लङ्काकाण्ड *

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अत्यन्त गर्वके कारण वह शकुन-अशकुनका विचार नहीं करता। हथियार हाथोंसे गिर रहे हैं। योद्धा रथसे गिर पड़ते हैं। घोड़े, हाथी साथ छोड़कर चिघाड़ते हुए भाग जाते हैं। स्यार, गीध, कौए और गदहे शब्द कर रहे हैं। बहुत अधिक कुत्ते बोल रहे हैं। उल्लू ऐसे अत्यन्त भयानक शब्द कर रहे हैं, मानो कालके दूत हों (मृत्युका सँदेश सुना रहे हों)।

दो०—ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहूँ मन बिश्राम।

भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम ॥ ७८ ॥

जो जीवोंके द्रोहमें रत है, मोहके वश हो रहा है, रामविमुख है और कामासक्त है, उसको क्या कभी स्वप्नमें भी सम्पत्ति, शुभ शकुन और चित्तकी शान्ति हो सकती है ? ॥ ७८ ॥

चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बहु धारा ॥

बिबिधि भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल बरन पताक ध्वज नाना ॥

राक्षसोंकी अपार सेना चली। चतुरंगिनी सेनाकी बहुत-सी टुकड़ियाँ हैं। अनेकों प्रकारके वाहन, रथ और सवारियाँ हैं तथा बहुत-से रंगोंकी अनेकों पताकाएँ और ध्वजाएँ हैं ॥ १ ॥

चले मत्त गज जूथ घनेरे। प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे ॥

बरन बरन बिरदैत निकाया। समर सूर जानहिं बहु माया ॥

मतवाले हाथियोंके बहुत-से झुंड चले। मानो पवनसे प्रेरित हुए वर्षा-ऋतुके बादल हों। रंग-बिरंगे बाना धारण करनेवाले वीरोंके समूह हैं, जो युद्धमें बड़े शूरवीर हैं और बहुत प्रकारकी माया जानते हैं ॥ २ ॥

अति बिचित्र बाहिनी बिराजी। बीर बसंत सेन जनु साजी ॥

चलत कटक दिगसिंधुर डगहीं। छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं ॥

अत्यन्त विचित्र फौज शोभित है। मानो वीर वसन्तने सेना सजायी हो। सेनाके चलनेसे दिशाओंके हाथी डिगने लगे, समुद्र क्षुभित हो गये और पर्वत डगमगाने लगे ॥ ३ ॥

उठी रेनु रबि गयउ छपाई। मरुत शक्ति बसुधा अकुलाई ॥

पनव निसान घोर रव बाजहिं। प्रलय समय के घन जनु गाजहिं ॥

इतनी धूल उड़ी कि सूर्य छिप गये। [फिर सहसा] पवन रुक गया और पृथ्वी अकुला उठी। ढोल और नगाड़े भीषण ध्वनिसे बज रहे हैं; जैसे प्रलयकालके बादल गरज रहे हों ॥ ४ ॥

भेरि नफीरि बाज सहनाई। मारु राग सुभट सुखदाई ॥

केहरि नाद बीर सब करहीं। निज निज बल पौरुष उच्चरहीं ॥

भेरी, नफीरी (तुरही) और शहनाईमें योद्धाओंको सुख देनेवाला मारु राग बज रहा है। सब वीर सिंहनाद करते हैं और अपने-अपने बल-पौरुषका बखान कर रहे हैं ॥ ५ ॥