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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 850, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 850

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  • रामचरितमानस *

दो०—तब दसकंठ बिबिधि बिधि समुझाई सब नारि। नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि ॥ ७७ ॥

तब रावणने सब स्त्रियोंको अनेकों प्रकारसे समझाया कि समस्त जगत्का यह (दृश्य) रूप नाशवान् है, हृदयमें विचारकर देखो ॥ ७७ ॥

तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन ॥ पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनरे ॥

रावणने उनको ज्ञानका उपदेश किया। वह स्वयं तो नीच है, पर उसकी कथा (बातें) शुभ और पवित्र है। दूसरोंको उपदेश देनेमें तो बहुत लोग निपुण होते हैं। पर ऐसे लोग अधिक नहीं हैं जो उपदेशके अनुसार आचरण भी करते हैं ॥ १ ॥

निसा सिरानि भयउ भिनुसारा। लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा ॥ सुभट बोलाइ दसानन बोला। रन सन्मुख जा कर मन डोला ॥

रात बीत गयी, सबेरा हुआ। रीछ-वानर [फिर] चारों दरवाजोंपर जा डटे। योद्धाओंको बुलाकर दशमुख रावणने कहा—लड़ाईमें शत्रुके सम्मुख जिसका मन डाँवाडोल हो, ॥ २ ॥

सो अबहीं बरु जाउ पराई। संजुग बिमुख भएँ न भलाई ॥ निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा। देहउँ उत्तरु जो रिपु चढ़ि आवा ॥

अच्छा है वह अभी भाग जाय। युद्धमें जाकर विमुख होने (भागने) में भलाई नहीं है। मैंने अपनी भुजाओंके बलपर वैर बढ़ाया है। जो शत्रु चढ़ आया है, उसको मैं [अपने ही] उत्तर दे लूँगा ॥ ३ ॥

अस कहि मरुत बेग रथ साजा। बाजे सकल जुझाऊ बाजा ॥ चले बीर सब अतुलित बली। जनु कज्जल कै आँधी चली ॥

ऐसा कहकर उसने पवनके समान तेज चलनेवाला रथ सजाया। सारे जुझाऊ (लड़ाईके) बाजे बजने लगे। सब अतुलनीय बलवान् वीर ऐसे चले मानो काजलकी आँधी चली हो ॥ ४ ॥

असगुन अमित होहिं तेहि काला। गनइ न भुज बल गर्ब बिसाला ॥

उस समय असंख्य अशकुन होने लगे। पर अपनी भुजाओंके बलका बड़ा गर्व होनेसे रावण उन्हें गिनता नहीं है ॥ ५ ॥

छं०—अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्वरहिं आयुध हाथ ते। भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते ॥ गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने। जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने ॥