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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 846, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 846

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  • रामचरितमानस *

अरे मूर्ख! मैंने बूढ़ा जानकर तुझको छोड़ दिया था। अरे अधम! अब तू मुझीको ललकारने लगा है? ऐसा कहकर उसने चमकता हुआ त्रिशूल चलाया। जाम्बवान् उसी त्रिशूलको हाथसे पकड़कर दौड़ा ॥ ३ ॥

मारिसि मेघनाद कै छाती । परा भूमि घुर्मित सुरघाती ॥ पुनि रिसान गहि चरन फिरायो । महि पछारि निज बल देखरायो ॥

और उसे मेघनादकी छातीपर दे मारा। वह देवताओंका शत्रु चक्कर खाकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। जाम्बवान्ने फिर क्रोधमें भरकर पैर पकड़कर उसको घुमाया और पृथ्वीपर पटककर उसे अपना बल दिखलाया ॥ ४ ॥

बर प्रसाद सो मरड़ न मारा । तब गहि पद लंका पर डारा ॥ इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो । राम समीप सपदि सो आयो ॥

[किन्तु] वरदानके प्रतापसे वह मारे नहीं मरता। तब जाम्बवान्ने उसका पैर पकड़कर उसे लंकापर फेंक दिया। इधर देवरिषि नारदजीने गरुड़को भेजा। वे तुरंत ही श्रीरामजीके पास आ पहुँचे ॥ ५ ॥

दो०— खगपति सब धरि खाए माया नाग बरुथ ।

माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ ॥ ७४ (क) ॥

पक्षिराज गरुड़जी सब माया-सर्पोंके समूहोंको पकड़कर खा गये। तब सब वानरोंके झुंड मायासे रहित होकर हर्षित हुए ॥ ७४ (क) ॥

गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ ।

चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ ॥ ७४ (ख) ॥

पर्वत, वृक्ष, पत्थर और नख धारण किये वानर क्रोधित होकर दौड़े। निशाचर विशेष व्याकुल होकर भाग चले और भागकर किलेपर चढ़ गये ॥ ७४ (ख) ॥

मेघनाद कै मुरछा जागी । पितहि बिलोकि लाज अति लागी ॥

तुरत गयउ गिरिबर कंदरा । करौं अजय मख अस मन धरा ॥

मेघनादकी मूर्च्छा छूटी, [तब] पिताको देखकर उसे बड़ी शर्म लगी। मैं अजय (अजेय होनेको) यज्ञ करूँ, ऐसा मनमें निश्चय करके वह तुरंत श्रेष्ठ पर्वतकी गुफामें चला गया ॥ १ ॥

इहाँ बिभीषण मंत्र बिचारा । सुनहु नाथ बल अतुल उदारा ॥

मेघनाद मख करड़ अपावन । खल मायावी देव सतावन ॥

यहाँ विभीषणने यह सलाह विचारी [और श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—] हे अतुलनीय बलवान् उदार प्रभो! देवताओंको सतानेवाला दुष्ट, मायावी मेघनाद अपवित्र यज्ञ कर रहा है ॥ २ ॥