श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 845, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषण । सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन ॥ पुनि रघुपति सैं जूझै लागा । सर छोड़इ होइ लागहिं नागा ॥
फिर उसने लक्ष्मणजी, सुग्रीव और विभीषणको बाणोंसे मारकर उनके शरीरोंको चलनी कर दिया। फिर वह श्रीरघुनाथजीसे लड़ने लगा। वह जो बाण छोड़ता है, वे साँप होकर लगते हैं ॥ ५ ॥
व्याल पास बस भए खरारी । स्वबस अनंत एक अबिकारी ॥ नट इव कपट चरित कर नाना । सदा स्वतंत्र एक भगवाना ॥
जो स्वतन्त्र, अनन्त, एक (अखण्ड) और निर्विकार हैं, वे खरके शत्रु श्रीरामजी [लीलासे] नागपाशके वशमें हो गये (उससे बँध गये)। श्रीरामचन्द्रजी सदा स्वतन्त्र, एक, (अद्वितीय) भगवान् हैं। वे नटकी तरह अनेकों प्रकारके दिखावटी चरित्र करते हैं ॥ ६ ॥
रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो । नागपास देवन्ह भय पायो ॥
रणकी शोभाके लिये प्रभुने अपनेको नागपाशमें बँधा लिया; किन्तु उससे देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥ ७ ॥
दो०— गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास ।
सो कि बंध तर आवड़ व्यापक बिस्व निवास ॥ ७३ ॥
[शिवजी कहते हैं—] हे गिरिजे! जिनका नाम जपकर मुनि भव (जन्म-मृत्यु) की फाँसीको काट डालते हैं, वे सर्वव्यापक और विश्वनिवास (विश्वके आधार) प्रभु कहीं बन्धनमें आ सकते हैं ? ॥ ७३ ॥
चरित राम के सगुन भवानी । तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी ॥ अस बिचारि जे तग्य बिरागी । रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी ॥
हे भवानी! श्रीरामजीकी इन सगुण लीलाओंके विषयमें बुद्धि और वाणीके बलसे तर्क (निर्णय) नहीं किया जा सकता। ऐसा विचारकर जो तत्त्वज्ञानी और विरक्त पुरुष हैं वे सब तर्क (शंका) छोड़कर श्रीरामजीका भजन ही करते हैं ॥ १ ॥
व्याकुल कटकु कीन्ह घननादा । पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा ॥ जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा । सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा ॥
मेघनादने सेनाको व्याकुल कर दिया। फिर वह प्रकट हो गया और दुर्वचन कहने लगा। इसपर जाम्बवान्ने कहा—अरे दुष्ट! खड़ा रह। यह सुनकर उसे बड़ा क्रोध बढ़ा ॥ २ ॥
बूढ़ जानि सठ छोड़ैउँ तोही । लागेसि अधम पचौरै मोही ॥ अस कहि तरल त्रिसूल चलायो । जामवंत कर गहि सोड़ धायो ॥