श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 847, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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जों प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि । नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि ॥ सुनि रघुपति अतिसय सुख माना । बोले अंगदादि कपि नाना ॥
हे प्रभो! यदि वह यज्ञ सिद्ध हो पायेगा तो हे नाथ! फिर मेघनाद जल्दी जीता न जा सकेगा। यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने बहुत सुख माना और अंगदादि बहुत-से वानरोंको बुलाया [और कहा—] ॥ ३ ॥
लछिमन संग जाहु सब भाई । करहु बिधंस जग्य कर जाई ॥ तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही । देखि सभय सुर दुख अति मोही ॥
हे भाइयो! सब लोग लक्ष्मणके साथ जाओ और जाकर यज्ञको विध्वंस करो। हे लक्ष्मण! संग्राममें तुम उसे मारना। देवताओंको भयभीत देखकर मुझे बड़ा दुःख है ॥ ४ ॥
मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई । जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई ॥ जामवंत सुग्रीव विभीषण । सेन समेत रहेहु तीनिउ जन ॥
हे भाई! सुनो, उसको ऐसे बल और बुद्धिके उपायसे मारना, जिससे निशाचरका नाश हो। हे जाम्बवान्, सुग्रीव और विभीषण! तुम तीनों जने सेनासमेत [इनके] साथ रहना ॥ ५ ॥
जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन । कटि निषंग कसि साजि सरासन ॥ प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा । बोले घन इव गिरा गँभीरा ॥
[इस प्रकार] जब श्रीरघुवीरने आज्ञा दी, तब कमरमें तरकस कसकर और धनुष सजाकर (चढ़ाकर) रणधीर श्रीलक्ष्मणजी प्रभुके प्रतापको हृदयमें धारण करके मेघके समान गम्भीर वाणी बोले— ॥ ६ ॥
जों तेहि आजु बधें बिनु आवौं । तौ रघुपति सेवक न कहावौं ॥ जों सत संकर करहिं सहाई । तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई ॥
यदि मैं आज उसे बिना मारे आऊँ, तो श्रीरघुनाथजीका सेवक न कहलाऊँ। यदि सैकड़ों शङ्कर भी उसकी सहायता करें तो भी श्रीरघुवीरकी दुहाई है; आज मैं उसे मार ही डालूँगा ॥ ७ ॥
दो०— रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत । अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत ॥ ७५ ॥
श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें सिर नवाकर शेषावतार श्रीलक्ष्मणजी तुरंत चले। उनके साथ अंगद, नील, मयंद, नल और हनुमान् आदि उत्तम योद्धा थे ॥ ७५ ॥
जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा । आहुति देत रुधिर अरु भैंसा ॥ कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा । जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा ॥