श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- लङ्काकाण्ड *
८४५
जों प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि । नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि ॥ सुनि रघुपति अतिसय सुख माना । बोले अंगदादि कपि नाना ॥
हे प्रभो! यदि वह यज्ञ सिद्ध हो पायेगा तो हे नाथ! फिर मेघनाद जल्दी जीता न जा सकेगा। यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने बहुत सुख माना और अंगदादि बहुत-से वानरोंको बुलाया [और कहा—] ॥ ३ ॥
लछिमन संग जाहु सब भाई । करहु बिधंस जग्य कर जाई ॥ तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही । देखि सभय सुर दुख अति मोही ॥
हे भाइयो! सब लोग लक्ष्मणके साथ जाओ और जाकर यज्ञको विध्वंस करो। हे लक्ष्मण! संग्राममें तुम उसे मारना। देवताओंको भयभीत देखकर मुझे बड़ा दुःख है ॥ ४ ॥
मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई । जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई ॥ जामवंत सुग्रीव विभीषण । सेन समेत रहेहु तीनिउ जन ॥
हे भाई! सुनो, उसको ऐसे बल और बुद्धिके उपायसे मारना, जिससे निशाचरका नाश हो। हे जाम्बवान्, सुग्रीव और विभीषण! तुम तीनों जने सेनासमेत [इनके] साथ रहना ॥ ५ ॥
जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन । कटि निषंग कसि साजि सरासन ॥ प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा । बोले घन इव गिरा गँभीरा ॥
[इस प्रकार] जब श्रीरघुवीरने आज्ञा दी, तब कमरमें तरकस कसकर और धनुष सजाकर (चढ़ाकर) रणधीर श्रीलक्ष्मणजी प्रभुके प्रतापको हृदयमें धारण करके मेघके समान गम्भीर वाणी बोले— ॥ ६ ॥
जों तेहि आजु बधें बिनु आवौं । तौ रघुपति सेवक न कहावौं ॥ जों सत संकर करहिं सहाई । तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई ॥
यदि मैं आज उसे बिना मारे आऊँ, तो श्रीरघुनाथजीका सेवक न कहलाऊँ। यदि सैकड़ों शङ्कर भी उसकी सहायता करें तो भी श्रीरघुवीरकी दुहाई है; आज मैं उसे मार ही डालूँगा ॥ ७ ॥
दो०— रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत । अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत ॥ ७५ ॥
श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें सिर नवाकर शेषावतार श्रीलक्ष्मणजी तुरंत चले। उनके साथ अंगद, नील, मयंद, नल और हनुमान् आदि उत्तम योद्धा थे ॥ ७५ ॥
जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा । आहुति देत रुधिर अरु भैंसा ॥ कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा । जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा ॥
८४६
- रामचरितमानस *
वानरोंने जाकर देखा कि वह बैठा हुआ खून और भैंसेकी आहुति दे रहा है। वानरोंने सब यज्ञ विध्वंस कर दिया। फिर भी जब वह नहीं उठा, तब वे उसकी प्रशंसा करने लगे ॥ १ ॥
तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई । लातन्हि हति हति चले पराई ॥ तै त्रिसूल धावा कपि भागे । आए जहाँ रामानुज आगे ॥
इतनेपर भी वह न उठा, [तब] उन्होंने जाकर उसके बाल पकड़े और लातोंसे मार-मारकर वे भाग चले। वह त्रिशूल लेकर दौड़ा, तब वानर भागे और वहाँ आ गये जहाँ आगे लक्ष्मणजी खड़े थे ॥ २ ॥
आवा परम क्रोध कर मारा । गर्ज घोर रव बारहिं बारा ॥ कोपि मरुतसुत अंगद धाए । हति त्रिसूल उर धरनि गिराए ॥
वह अत्यन्त क्रोधका मारा हुआ आया और बार-बार भयंकर शब्द करके गरजने लगा। मारुति (हनुमान्) और अंगद क्रोध करके दौड़े। उसने छातीमें त्रिशूल मारकर दोनोंको धरतीपर गिरा दिया ॥ ३ ॥
प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा । सर हति कृत अनंत जुग खंडा ॥ उठि बहोरि मारुति जुबराजा । हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा ॥
फिर उसने प्रभु श्रीलक्ष्मणजीपर प्रचण्ड त्रिशूल छोड़ा। अनन्त (श्रीलक्ष्मणजी) ने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये। हनुमान्जी और युवराज अंगद फिर उठकर क्रोध करके उसे मारने लगे, पर उसे चोट न लगी ॥ ४ ॥
फिरे बीर रिपु मरइ न मारा । तब धावा करि घोर चिकारा ॥ आवत देखि क्रुद्ध जनु काला । लछिमन छाड़े बिसिख कराला ॥
शत्रु (मेघनाद) मारे नहीं मरता, यह देखकर जब वीर लौटे, तब वह घोर चिम्घाड़ करके दौड़ा। उसे क्रुद्ध कालकी तरह आता देखकर लक्ष्मणजीने भयानक बाण छोड़े ॥ ५ ॥
देखेसि आवत पबि सम बाना । तुरत भयउ खल अंतरधाना ॥ बिबिध बेष धरि करइ लराई । कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई ॥
वज्रके समान बाणोंको आते देखकर वह दुष्ट तुरंत अन्तर्धान हो गया और फिर भाँति-भाँतिके रूप धारण करके युद्ध करने लगा। वह कभी प्रकट होता था और कभी छिप जाता था ॥ ६ ॥
देखि अजय रिपु डरपे कीसा । परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा ॥ लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा । एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा ॥
- लङ्काकाण्ड *
८४७
शत्रुको पराजित न होता देखकर वानर डरे। तब सर्पराज शेषजी (लक्ष्मणजी) बहुत ही क्रोधित हुए। लक्ष्मणजीने मनमें यह विचार दृढ़ किया कि इस पापीको मैं बहुत खेला चुका [अब और अधिक खेलाना अच्छा नहीं, अब तो इसे समाप्त ही कर देना चाहिये।] ॥७॥
सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा । सर संधान कीन्ह करि दापा ॥ छाड़ा बान माझ उर लागा । मरती बार कपटु सब त्यागा ॥
कोसलपति श्रीरामजीके प्रतापका स्मरण करके लक्ष्मणजीने वीरोचित दर्प करके बाणका सन्धान किया। बाण छोड़ते ही उसकी छातीके बीचमें लगा। मरते समय उसने सब कपट त्याग दिया ॥८॥
दो०—रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छोंड़ेसि प्रान ।
धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान ॥७६॥
रामके छोटे भाई लक्ष्मण कहाँ हैं? राम कहाँ हैं? ऐसा कहकर उसने प्राण छोड़ दिये। अंगद और हनुमान् कहने लगे—तेरी माता धन्य है, धन्य है, [जो तू लक्ष्मणजीके हाथों मरा और मरते समय श्रीराम-लक्ष्मणको स्मरण करके तूने उनके नामोंका उच्चारण किया।] ॥७६॥
बिनु प्रयास हनुमान उठायो । लंका द्वार राखि पुनि आयो ॥ तासु मरन सुनि सुर गंधर्बा । चढ़ि बिमान आए नभ सर्बा ॥
हनुमान्जीने उसको बिना ही परिश्रमके उठा लिया और लङ्काके दरवाजेपर रखकर वे लौट आये। उसका मरना सुनकर देवता और गन्धर्व आदि सब विमानोंपर चढ़कर आकाशमें आये ॥१॥
बरषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं । श्रीरघुनाथ बिमल जसु गावहिं ॥ जय अनंत जय जगदाधारा । तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा ॥
वे फूल बरसाकर नगाड़े बजाते हैं और श्रीरघुनाथजीका निर्मल यश गाते हैं। हे अनन्त! आपकी जय हो, हे जगदाधार! आपकी जय हो। हे प्रभो! आपने सब देवताओंका [महान् विपत्तिसे] उद्धार किया ॥२॥
अस्तुति करि सुर सिद्ध सिधाए । लछिमन कृपासिंधु पहिं आए ॥ सुत बध सुना दसानन जबहीं । मुरुछित भयउ परेउ महि तबहीं ॥
देवता और सिद्ध स्तुति करके चले गये, तब लक्ष्मणजी कृपाके समुद्र श्रीरामजीके पास आये। रावणने ज्यों ही पुत्रवधका समाचार सुना, त्यों ही वह मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥३॥
मंदोदरी रुदन कर भारी । उर ताड़न बहु भाँति पुकारी ॥ नगर लोग सब व्याकुल सोचा । सकल कहहिं दसकंधर पोचा ॥
मन्दोदरी छाती पीट-पीटकर और बहुत प्रकारसे पुकार-पुकारकर बड़ा भारी विलाप करने लगी। नगरके सब लोग शोकसे व्याकुल हो गये। सभी रावणको नीच कहने लगे ॥४॥
८४८
- रामचरितमानस *
दो०—तब दसकंठ बिबिधि बिधि समुझाई सब नारि। नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि ॥ ७७ ॥
तब रावणने सब स्त्रियोंको अनेकों प्रकारसे समझाया कि समस्त जगत्का यह (दृश्य) रूप नाशवान् है, हृदयमें विचारकर देखो ॥ ७७ ॥
तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन ॥ पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनरे ॥
रावणने उनको ज्ञानका उपदेश किया। वह स्वयं तो नीच है, पर उसकी कथा (बातें) शुभ और पवित्र है। दूसरोंको उपदेश देनेमें तो बहुत लोग निपुण होते हैं। पर ऐसे लोग अधिक नहीं हैं जो उपदेशके अनुसार आचरण भी करते हैं ॥ १ ॥
निसा सिरानि भयउ भिनुसारा। लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा ॥ सुभट बोलाइ दसानन बोला। रन सन्मुख जा कर मन डोला ॥
रात बीत गयी, सबेरा हुआ। रीछ-वानर [फिर] चारों दरवाजोंपर जा डटे। योद्धाओंको बुलाकर दशमुख रावणने कहा—लड़ाईमें शत्रुके सम्मुख जिसका मन डाँवाडोल हो, ॥ २ ॥
सो अबहीं बरु जाउ पराई। संजुग बिमुख भएँ न भलाई ॥ निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा। देहउँ उत्तरु जो रिपु चढ़ि आवा ॥
अच्छा है वह अभी भाग जाय। युद्धमें जाकर विमुख होने (भागने) में भलाई नहीं है। मैंने अपनी भुजाओंके बलपर वैर बढ़ाया है। जो शत्रु चढ़ आया है, उसको मैं [अपने ही] उत्तर दे लूँगा ॥ ३ ॥
अस कहि मरुत बेग रथ साजा। बाजे सकल जुझाऊ बाजा ॥ चले बीर सब अतुलित बली। जनु कज्जल कै आँधी चली ॥
ऐसा कहकर उसने पवनके समान तेज चलनेवाला रथ सजाया। सारे जुझाऊ (लड़ाईके) बाजे बजने लगे। सब अतुलनीय बलवान् वीर ऐसे चले मानो काजलकी आँधी चली हो ॥ ४ ॥
असगुन अमित होहिं तेहि काला। गनइ न भुज बल गर्ब बिसाला ॥
उस समय असंख्य अशकुन होने लगे। पर अपनी भुजाओंके बलका बड़ा गर्व होनेसे रावण उन्हें गिनता नहीं है ॥ ५ ॥
छं०—अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्वरहिं आयुध हाथ ते। भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते ॥ गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने। जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने ॥
- लङ्काकाण्ड *
८४९
अत्यन्त गर्वके कारण वह शकुन-अशकुनका विचार नहीं करता। हथियार हाथोंसे गिर रहे हैं। योद्धा रथसे गिर पड़ते हैं। घोड़े, हाथी साथ छोड़कर चिघाड़ते हुए भाग जाते हैं। स्यार, गीध, कौए और गदहे शब्द कर रहे हैं। बहुत अधिक कुत्ते बोल रहे हैं। उल्लू ऐसे अत्यन्त भयानक शब्द कर रहे हैं, मानो कालके दूत हों (मृत्युका सँदेश सुना रहे हों)।
दो०—ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहूँ मन बिश्राम।
भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम ॥ ७८ ॥
जो जीवोंके द्रोहमें रत है, मोहके वश हो रहा है, रामविमुख है और कामासक्त है, उसको क्या कभी स्वप्नमें भी सम्पत्ति, शुभ शकुन और चित्तकी शान्ति हो सकती है ? ॥ ७८ ॥
चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बहु धारा ॥
बिबिधि भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल बरन पताक ध्वज नाना ॥
राक्षसोंकी अपार सेना चली। चतुरंगिनी सेनाकी बहुत-सी टुकड़ियाँ हैं। अनेकों प्रकारके वाहन, रथ और सवारियाँ हैं तथा बहुत-से रंगोंकी अनेकों पताकाएँ और ध्वजाएँ हैं ॥ १ ॥
चले मत्त गज जूथ घनेरे। प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे ॥
बरन बरन बिरदैत निकाया। समर सूर जानहिं बहु माया ॥
मतवाले हाथियोंके बहुत-से झुंड चले। मानो पवनसे प्रेरित हुए वर्षा-ऋतुके बादल हों। रंग-बिरंगे बाना धारण करनेवाले वीरोंके समूह हैं, जो युद्धमें बड़े शूरवीर हैं और बहुत प्रकारकी माया जानते हैं ॥ २ ॥
अति बिचित्र बाहिनी बिराजी। बीर बसंत सेन जनु साजी ॥
चलत कटक दिगसिंधुर डगहीं। छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं ॥
अत्यन्त विचित्र फौज शोभित है। मानो वीर वसन्तने सेना सजायी हो। सेनाके चलनेसे दिशाओंके हाथी डिगने लगे, समुद्र क्षुभित हो गये और पर्वत डगमगाने लगे ॥ ३ ॥
उठी रेनु रबि गयउ छपाई। मरुत शक्ति बसुधा अकुलाई ॥
पनव निसान घोर रव बाजहिं। प्रलय समय के घन जनु गाजहिं ॥
इतनी धूल उड़ी कि सूर्य छिप गये। [फिर सहसा] पवन रुक गया और पृथ्वी अकुला उठी। ढोल और नगाड़े भीषण ध्वनिसे बज रहे हैं; जैसे प्रलयकालके बादल गरज रहे हों ॥ ४ ॥
भेरि नफीरि बाज सहनाई। मारु राग सुभट सुखदाई ॥
केहरि नाद बीर सब करहीं। निज निज बल पौरुष उच्चरहीं ॥
भेरी, नफीरी (तुरही) और शहनाईमें योद्धाओंको सुख देनेवाला मारु राग बज रहा है। सब वीर सिंहनाद करते हैं और अपने-अपने बल-पौरुषका बखान कर रहे हैं ॥ ५ ॥
८५०
- रामचरितमानस *
कहइ दसानन सुनुहु सुभट्टा । मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा ॥ हौं मारिहुउँ भूप द्वौ भाई । अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई ॥
रावणने कहा—हे उत्तम योद्धाओ! सुनो। तुम रीछ-वानरोंके ठट्टको मसल डालो। और मैं दोनों राजकुमार भाइयोंको मारूँगा। ऐसा कहकर उसने अपनी सेना सामने चलायी ॥ ६ ॥
यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई । धाए करि रघुबीर दोहाई ॥
जब सब वानरोंने यह खबर पायी, तब वे श्रीरघुवीरकी दुहाई देते हुए दौड़े ॥ ७ ॥
छं०—धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते । मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बृंद नाना बान ते ॥ नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं । जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं ॥
वे विशाल और कालके समान कराल वानर-भालू दौड़े। मानो पंखवाले पर्वतोंके समूह उड़ रहे हों। वे अनेक वर्णोंके हैं। नख, दाँत, पर्वत और बड़े-बड़े वृक्ष ही उनके हथियार हैं। वे बड़े बलवान् हैं और किसीका भी डर नहीं मानते। रावणरूपी मतवाले हाथीके लिये सिंहरूप श्रीरामजीका जय-जयकार करके वे उनके सुन्दर यशका बखान करते हैं।
दो०—दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि ।
भिरे बीर इत रामहि उत्त रावनहि बखानि ॥ ७९ ॥
दोनों ओरके योद्धा जय-जयकार करके अपनी-अपनी जोड़ी जान (चुन)-कर इधर श्रीरघुनाथजीका और उधर रावणका बखान करके परस्पर भिड़ गये ॥ ७९ ॥
रावनु रथी बिरथ रघुबीरा । देखि विभीषण भयउ अधीरा ॥ अधिक प्रीति मन भा संदेहा । बंदि चरन कह सहित सनेहा ॥
रावणको रथपर और श्रीरघुवीरको बिना रथके देखकर विभीषण अधीर हो गये। प्रेम अधिक होनेसे उनके मनमें सन्देह हो गया [कि वे बिना रथके रावणको कैसे जीत सकेंगे]। श्रीरामजीके चरणोंकी वन्दना करके वे स्नेहपूर्वक कहने लगे ॥ १ ॥
नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना । केहि बिधि जितब बीर बलवाना ॥ सुनुहु सखा कह कृपानिधाना । जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना ॥
हे नाथ! आपके न रथ है, न तनकी रक्षा करनेवाला कवच है और न जूते ही हैं। वह बलवान् वीर रावण किस प्रकार जीता जायगा? कृपानिधान श्रीरामजीने कहा—हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है ॥ २ ॥
- लङ्काकाण्ड *
८५१
सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ॥ बल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे ॥
शौर्य और धैर्य उस रथके पहिये हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इन्द्रियोंका वशमें होना) और परोपकार—ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समतारूपी डोरीसे रथमें जोड़े हुए हैं ॥३॥
ईस भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना ॥ दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा । बर बिग्यान कठिन कोदंडा ॥
ईश्वरका भजन ही [उस रथको चलानेवाला] चतुर सारथि है। वैराग्य ढाल है और सन्तोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है ॥४॥
अमल अचल मन त्रोन समाना । सम जम नियम सिलीमुख नाना ॥ कवच अभेद बिप्र गुर पूजा । एहि सम बिजय उपाय न दूजा ॥
निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकसके समान है। शम (मनका वशमें होना), [अहिंसादि] यम और [शौचादि] नियम—ये बहुत-से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरुका पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजयका दूसरा उपाय नहीं है ॥५॥
सखा धर्ममय अस रथ जाकें । जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें ॥
हे सखे! ऐसा धर्ममय रथ जिसके हो उसके लिये जीतनेको कहीं शत्रु ही नहीं है ॥६॥
दो०— महा अजय संसार रिपु जीति सकड़ सो बीर ।
जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनुह सखा मतिधीर ॥ ८० ( क ) ॥
हे धीरबुद्धिवाले सखा! सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार (जन्म-मृत्यु)-रूपी महान् दुर्जय शत्रुको भी जीत सकता है [रावणकी तो बात ही क्या है] ॥८० (क)॥
सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज ।
एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज ॥ ८० (ख) ॥
प्रभुके वचन सुनकर विभीषणजीने हर्षित होकर उनके चरणकमल पकड़ लिये [और कहा—] हे कृपा और सुखके समूह श्रीरामजी! आपने इसी बहाने मुझे [महान्] उपदेश दिया ॥८० (ख)॥
उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान ।
लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन ॥ ८० (ग) ॥
उधरसे रावण ललकार रहा है और इधरसे अंगद और हनुमान्। राक्षस और रीछ-बानर अपने-अपने स्वामीकी दुहाई देकर लड़ रहे हैं ॥८० (ग)॥
८५२
- रामचरितमानस *
सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना । देखत रन नभ चढ़े बिमाना ॥ हमहू उमा रहे तेहि संग। देखत राम चरित रन रंगा ॥
ब्रह्मा आदि देवता और अनेकों सिद्ध तथा मुनि विमानोंपर चढ़े हुए आकाशसे युद्ध देख रहे हैं। [शिवजी कहते हैं—] हे उमा! मैं भी उस समाजमें था और श्रीरामजीके रण-रंग (रणोत्साह)की लीला देख रहा था ॥ १ ॥
सुभट समर रस दुहु दिसि माते । कपि जयसील राम बल ताते ॥ एक एक सन भिरहिं पचारहिं । एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं ॥
दोनों ओरके योद्धा रण-रसमें मतवाले हो रहे हैं। वानरोंको श्रीरामजीका बल है, इससे वे जयशील हैं (जीत रहे हैं)। एक दूसरेसे भिड़ते और ललकारते हैं और एक दूसरेको मसल-मसलकर पृथ्वीपर डाल देते हैं ॥ २ ॥
मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं । सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं ॥ उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं । गहि पद अवनि पटक भट डारहिं ॥
वे मारते, काटते, पकड़ते और पछाड़ देते हैं और सिर तोड़कर उन्हीं सिरोंसे दूसरोंको मारते हैं। पेट फाड़ते हैं, भुजाएँ उखाड़ते हैं और योद्धाओंको पैर पकड़कर पृथ्वीपर पटक देते हैं ॥ ३ ॥
निसिचर भट महि गाड़हिं भालू । ऊपर ढारि देहिं बहु बालू ॥ बीर बलीमुख जुद्ध बिरुद्धे । देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे ॥
राक्षस योद्धाओंको भालू पृथ्वीमें गाड़ देते हैं और ऊपरसे बहुत-सी बालू डाल देते हैं। युद्धमें शत्रुओंसे विरुद्ध हुए वीर वानर ऐसे दिखायी पड़ते हैं मानो बहुत-से क्रोधित काल हों ॥ ४ ॥
छं० — क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्वत सोनित राजहीं । मर्दिहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं ॥ मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं । चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं ॥
क्रोधित हुए कालके समान वे वानर खून बहते हुए शरीरोंसे शोभित हो रहे हैं। वे बलवान् वीर राक्षसोंको सेनाके योद्धाओंको मसलते और मेघकी तरह गरजते हैं। डाँटकर चपेटोंसे मारते, दाँतोंसे काटकर लातोंसे पीस डालते हैं। वानर-भालू चिघाड़ते और ऐसा छल-बल करते हैं जिससे दुष्ट राक्षस नष्ट हो जायें ॥ १ ॥
- लङ्काकाण्ड *
८५३
धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं । प्रह्लादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं ॥ धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही । जय राम जो तून ते कुलिस कर कुलिस ते कर तून सही ॥
वे राक्षसोंके गाल पकड़कर फाड़ डालते हैं, छाती चीर डालते हैं और उनकी अँतड़ियाँ निकालकर गलेमें डाल लेते हैं। वे वानर ऐसे देख पड़ते हैं मानो प्रह्लादके स्वामी श्रीनृसिंहभगवान् अनेकों शरीर धारण करके युद्धके मैदानमें क्रीड़ा कर रहे हों। पकड़ो, मारो, काटो, पछाड़ो आदि घोर शब्द आकाश और पृथ्वीमें भर (छा) गये हैं। श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जो सचमुच तृणसे वज्र और वज्रसे तृण कर देते हैं (निर्बलको सबल और सबलको निर्बल कर देते हैं) ॥ २ ॥
दो०— निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप।
रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप ॥ ८१ ॥
अपनी सेनाको विचलित होते हुए देखा, तब बीस भुजाओंमें दस धनुष लेकर रावण रथपर चढ़कर गर्व करके 'लौटो', 'लौटो' कहता हुआ चला ॥ ८१ ॥
धायउ परम कृच्छ्र दसकंधर। सन्मुख चले हूह दै बंदर ॥ गहि कर पादप उपल पहारा। डारेन्हि ता पर एकहिं बारा ॥
रावण अत्यन्त क्रोधित होकर दौड़ा। वानर हुंकार करते हुए [लड़नेके लिये] उसके सामने चले। उन्होंने हाथोंमें वृक्ष, पत्थर और पहाड़ लेकर रावणपर एक ही साथ डाले ॥ १ ॥
लागहिं सैल बज्र तन तासू। खंड खंड होइ फूटहिं आसू ॥ चला न अचल रहा रथ रोपी। रन दुर्मद रावन अति कोपी ॥
पर्वत उसके वज्रतुल्य शरीरमें लगते ही तुरंत टुकड़े-टुकड़े होकर फूट जाते हैं। अत्यन्त क्रोधी रणोन्मत्त रावण रथ रोककर अचल खड़ा रहा, [अपने स्थानसे] जरा भी नहीं हिला ॥ २ ॥
इत उत झपटि दपटि कपि जोधा। मदैं लाग भयउ अति क्रोधा ॥ चले पराइ भालु कपि नाना। त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना ॥
उसे बहुत ही क्रोध हुआ। वह इधर-उधर झपटकर और डपटकर वानर योद्धाओंको मसलने लगा। अनेकों वानर-भालू 'हे अंगद! हे हनुमान्! रक्षा करो, रक्षा करो' [पुकारते हुए] भाग चले ॥ ३ ॥
पाहि पाहि रघुबीर गोसाई। यह खल खाड़ काल की नाई ॥ तेहिं देखे कपि सकल पराने। दसहुँ चाप सायक संधाने ॥
८५४
- रामचरितमानस *
हे रघुवीर! हे गोसाई! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। यह दुष्ट कालकी भाँति हमें खा रहा है। उसने देखा कि सब वानर भाग छूटे। तब [रावणने] दसों धनुषोंपर बाण सन्धान किये ॥ ४ ॥
छं०—संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं। रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदिसि कहँ कपि भागहीं ॥ भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे। रघुवीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे ॥
उसने धनुषपर सन्धान करके बाणोंके समूह छोड़े। वे बाण सर्पकी तरह उड़कर जा लगते थे। पृथ्वी-आकाश और दिशा-विदिशा सर्वत्र बाण भर रहे हैं। वानर भागें तो कहाँ? अत्यन्त कोलाहल मच गया। वानर-भालुओंकी सेना व्याकुल होकर आर्त पुकार करने लगी—हे रघुवीर! हे करुणासागर! हे पीड़ितोंके बन्धु! हे सेवकोंकी रक्षा करके उनके दुःख हरनेवाले हरि!
दो०—निज दल बिकल देखि कटि किसि निषंग धनु हाथ। लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ ॥ ८२ ॥
अपनी सेनाको व्याकुल देखकर कमरमें तरकस कसकर और हाथमें धनुष लेकर श्रीरघुनाथजीके चरणोंपर मस्तक नवाकर लक्ष्मणजी क्रोधित होकर चले ॥ ८२ ॥
रे खल का मारसि कपि भालू। मोहि बिलोकु तोर मैं कालू ॥ खोजत रहेउँ तोहि सुतधाती। आजु निपाति जुड़ावउँ छाती ॥
[लक्ष्मणजीने पास जाकर कहा—] अरे दुष्ट! वानर-भालुओंको क्या मार रहा है? मुझे देख, मैं तेरा काल हूँ? [रावणने कहा—] अरे मेरे पुत्रके घातक! मैं तुझीको दूँद रहा था। आज तुझे मारकर [अपनी] छाती ठंडी करूँगा ॥ १ ॥
अस कहि छाड़ेसि बान प्रचंडा। लछिमन किए सकल सत खंडा ॥ कोटिन्ह आयुध रावन डारे। तिल प्रवान करि काटि निवारे ॥
ऐसा कहकर उसने प्रचण्ड बाण छोड़े। लक्ष्मणजीने सबके सैकड़ों टुकड़े कर डाले। रावणने करोड़ों अस्त्र-शस्त्र चलाये। लक्ष्मणजीने उनको तिलके बराबर करके काटकर हटा दिया ॥ २ ॥
पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा। स्यंदनु भंजि सारथी मारा ॥ सत सत सर मारे दस भाला। गिरि सृंगन्ह जनु प्रबिसहिं ब्याला ॥
फिर अपने बाणोंसे [उसपर] प्रहार किया और [उसके] रथको तोड़कर सारथिको मार डाला। [रावणके] दसों मस्तकोंमें सौ-सौ बाण मारे। वे सिरोंमें ऐसे पैठ गये मानो पहाड़के शिखरोंमें सर्प प्रवेश कर रहे हों ॥ ३ ॥
- लङ्काकाण्ड *
८५५
पुनि सत सर मारा उर माहीं। परेउ धरनि तल सुधि कछु नाहीं॥ उठा प्रबल पुनि मुरुछा जागी। छाड़िसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी॥
फिर सौ बाण उसकी छातीमें मारे। वह पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसे कुछ भी होश न रहा। फिर मूर्च्छा छूटनेपर वह प्रबल रावण उठा और उसने वह शक्ति चलायी जो ब्रह्माजीने उसे दी थी॥ ४ ॥
छं०—सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही। पर्यो बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही॥ ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी। तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी॥
वह ब्रह्माकी दी हुई प्रचण्ड शक्ति लक्ष्मणजीकी ठीक छातीमें लगी। वीर लक्ष्मणजी व्याकुल होकर गिर पड़े। तब रावण उन्हें उठाने लगा, पर उसके अतुलित बलकी महिमा यों ही रह गयी (व्यर्थ हो गयी, वह उन्हें उठा न सका)। जिनके एक ही सिरपर ब्रह्माण्डरूपी भवन धूलके एक कणके समान विराजता है, उन्हें मूर्ख रावण उठाना चाहता है! वह तीनों भुवनोंके स्वामी लक्ष्मणजीको नहीं जानता।
दो०—देखि पवनसुत धायउ बोलत बचन कठोर। आवत कपिहि हन्यो तेहिं मुष्टि प्रहार प्रघोर॥ ८३ ॥
यह देखकर पवनपुत्र हनुमान्जी कठोर वचन बोलते हुए दौड़े। हनुमान्जीके आते ही रावणने उनपर अत्यन्त भयङ्कर घूँसेका प्रहार किया॥ ८३ ॥
जानु टेकि कपि भूमि न गिरा। उठा सँभारि बहुत रिस भरा॥ मुठिका एक ताहि कपि मारा। परेउ सैल जनु बज्र प्रहारा॥
हनुमान्जी घुटने टेककर रह गये, पृथ्वीपर गिरे नहीं। और फिर क्रोधसे भरे हुए सँभालकर उठे। हनुमान्जीने रावणको एक घूँसा मारा। वह ऐसा गिर पड़ा जैसे वज्रकी मारसे पर्वत गिरा हो॥ १ ॥
मुरुछा गै बहोरि सो जागा। कपि बल बिपुल सराहन लागा॥ धिग धिग मम पौरुष धिग मोही। जौँ तैं जितत रहेसि सुरद्वोही॥
मूर्च्छा भंग होनेपर फिर वह जगा और हनुमान्जीके बड़े भारी बलको सराहने लगा। [हनुमान्जीने कहा—] मेरे पौरुषको धिक्कार है, धिक्कार है और मुझे भी धिक्कार है, जो हे देवद्वोही! तू अब भी जीता रह गया॥ २ ॥
८५६
- रामचरितमानस *
अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो । देखि दसानन बिसमय पायो ॥ कह रघुबीर समुझु जियैँ भ्राता । तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता ॥
ऐसा कहकर और लक्ष्मणजीको उठाकर हनुमान्जी श्रीरघुनाथजीके पास ले आये। यह देखकर रावणको आश्चर्य हुआ। श्रीरघुवीरने [लक्ष्मणजीसे] कहा—हे भाई! हृदयमें समझो, तुम कालके भी भक्षक और देवताओंके रक्षक हो ॥ ३ ॥
सुनत बचन उठि बैठ कृपाला । गई गगन सो सकति कराला ॥ पुनि कोदंड बान गहि धाए । रिपु सन्मुख अति आतुर आए ॥
ये वचन सुनते ही कृपालु लक्ष्मणजी उठ बैठे। वह कराल शक्ति आकाशको चली गयी। लक्ष्मणजी फिर धनुष-बाण लेकर दौड़े और बड़ी शीघ्रतासे शत्रुके सामने आ पहुँचे ॥ ४ ॥
छं०— आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति व्याकुल कियो । गिर्यो धरनि दसकंधर बिकलतर बान सत बेध्यो हियो ॥ सारथी दूसर घालि रथ तेहि तुरत लंका लै गयो । रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरि प्रभु चरनन्हि नयो ॥
फिर उन्होंने बड़ी ही शीघ्रतासे रावणके रथको चूर-चूरकर और सारथिको मारकर उसे (रावणको) व्याकुल कर दिया। सौ बाणोंसे उसका हृदय बेध दिया, जिससे रावण अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। तब दूसरा सारथि उसे रथमें डालकर तुरंत ही लंकाको ले गया। प्रतापके समूह श्रीरघुवीरके भाई लक्ष्मणजीने फिर आकर प्रभुके चरणोंमें प्रणाम किया।
दो०— उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य । राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य ॥ ८४ ॥
वहाँ (लंकामें) रावण मूर्च्छासे जागकर कुछ यज्ञ करने लगा। वह मूर्ख और अत्यन्त अज्ञानी हठवश श्रीरघुनाथजीसे विरोध करके विजय चाहता है ॥ ८४ ॥
इहाँ विभीषण सब सुधि पाई । सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई ॥ नाथ करइ रावन एक जागा । सिद्ध भएँ नहिं मरिहि अभागा ॥
यहाँ विभीषणजीने सब खबर पायी और तुरंत जाकर श्रीरघुनाथजीको कह सुनायी कि हे नाथ! रावण एक यज्ञ कर रहा है। उसके सिद्ध होनेपर वह अभागा सहज ही नहीं मरेगा ॥ १ ॥
- लङ्काकाण्ड *
८५७
पठवहु नाथ बेगि भट बंदर । करहिं बिधंस आव दसकंधर ॥ प्रात होत प्रभु सुभट पठाए । हनुमदादि अंगद सब धाए ॥
हे नाथ! तुरंत वानर योद्धाओंको भेजिये; जो यज्ञका विध्वंस करें, जिससे रावण युद्धमें आवे। प्रातःकाल होते ही प्रभुने वीर योद्धाओंको भेजा। हनुमान् और अंगद आदि सब [प्रधान वीर] दौड़े ॥ २ ॥
कौतुक कूदि चढ़े कपि लंका । पैठे रावन भवन असंका ॥ जग्य करत जबहीं सो देखा । सकल कपिन्ह भा क्रोध बिसेषा ॥
वानर खेलसे ही कूदकर लंकापर जा चढ़े और निभंय रावणके महलमें जा घुसे। ज्यों ही उसको यज्ञ करते देखा, त्यों ही सब वानरोंको बहुत क्रोध हुआ ॥ ३ ॥
रन ते निलज भाजि गृह आवा । इहाँ आइ बक ध्यान लगावा ॥ अस कहि अंगद मारा लाता । चितव न सठ स्वार्थ मन राता ॥
[उन्होंने कहा—] अरे ओ निर्लज्ज! रणभूमिसे घर भाग आया और यहाँ आकर बगुलेका-सा ध्यान लगाकर बैठा है? ऐसा कहकर अंगदने लात मारी। पर उसने इनकी ओर देखा भी नहीं, उस दुष्टका मन स्वार्थमें अनुरक्त था ॥ ४ ॥
छं०— नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि दसन लातन्ह मारहीं । धरि केस नारि निकारि बाहेर तेऽतिदीन पुकारहीं ॥ तब उठेउ क्रुद्ध कृतांत सम गहि चरन बानर डारई । एहि बीच कपिन्ह बिधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई ॥
जब उसने नहीं देखा, तब वानर क्रोध करके उसे दाँतोंसे पकड़कर [काटने और] लातोंसे मारने लगे। स्त्रियोंको बाल पकड़कर घरसे बाहर घसीट लाये, वे अत्यन्त ही दीन होकर पुकारने लगीं। तब रावण कालके समान क्रोधित होकर उठा और वानरोंको पैर पकड़कर पटकने लगा। इसी बीचमें वानरोंने यज्ञ विध्वंस कर डाला, यह देखकर वह मनमें हारने लगा (निराश होने लगा)।
दो०— जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास । चलेउ निसाचर क्रुद्ध होइ त्यागि जिवन कै आस ॥ ८५ ॥
यज्ञ विध्वंस करके सब चतुर वानर रघुनाथजीके पास आ गये। तब रावण जीनेकी आशा छोड़कर क्रोधित होकर चला ॥ ८५ ॥
चलत होहिं अति असुभ भयंकर । बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर ॥ भयउ कालबस काहु न माना । कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना ॥
८५८
- रामचरितमानस *
चलते समय अत्यन्त भयङ्कर अमङ्गल (अपशकुन) होने लगे। गीध उड़-उड़कर उसके सिरोंपर बैठने लगे। किन्तु वह कालके वश था, इससे किसी भी अपशकुनको नहीं मानता था। उसने कहा— युद्धका ढंका बजाओ ॥ १ ॥
चली तमीचर अनी अपारा। बहु गज रथ पदाति असवारा ॥ प्रभु सन्मुख धाए खल कैसें। सलभ समूह अनल कहैं जैसें ॥
निशाचरोंकी अपार सेना चली। उसमें बहुत-से हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल हैं। वे दृष्ट प्रभुके सामने कैसे दौड़े, जैसे पतंगोंके समूह अग्निकी ओर [जलनेके लिये] दौड़ते हैं ॥ २ ॥
इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही। दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही ॥ अब जनि राम खेलावहु एही। अतिसय दुखित होति बैदेही ॥
इधर देवताओंने स्तुति की कि हे श्रीरामजी! इसने हमको दारुण दुःख दिये हैं। अब आप इसे [अधिक] न खेलाइये। जानकीजी बहुत ही दुखी हो रही हैं ॥ ३ ॥
देव बचन सुनि प्रभु मुसुकाना। उठि रघुबीर सुधारे बाना ॥ जटा जूट दूढ़ बाँधें माथे। सोहहिं सुमन बीच बिच गाथे ॥
देवताओंके वचन सुनकर प्रभु मुसकराये। फिर श्रीरघुवीरने उठकर बाण सुधारे। मस्तकपर जटाओंके जूड़ेको कसकर बाँधे हुए हैं, उसके बीच-बीचमें पुष्प गूँथे हुए शोभित हो रहे हैं ॥ ४ ॥
अरुन नयन बारिद तनु स्यामा। अखिल लोक लोचनाभिरामा ॥ कटितट परिकर कस्यो निषंगा। कर कोदंड कठिन सारंगा ॥
लाल नेत्र और मेघके समान श्याम शरीरवाले और सम्पूर्ण लोकोंके नेत्रोंको आनन्द देनेवाले हैं। प्रभुने कमरमें फेंटा तथा तरकस कस लिया और हाथमें कठोर शार्ङ्गधनुष ले लिया ॥ ५ ॥
छं०—सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो। भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो ॥ कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे। ब्रह्मांड दिगज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे ॥
प्रभुने हाथमें शार्ङ्गधनुष लेकर कमरमें बाणोंकी खान (अक्षय) सुन्दर तरकस कस लिया। उनके भुजदण्ड पुष्ट हैं और मनोहर चौड़ी छातीपर ब्राह्मण (भृगुजी) के चरणका चिह्न शोभित है। तुलसीदासजी कहते हैं, ज्यों ही प्रभु धनुष-बाण हाथमें लेकर फिराने लगे, त्यों ही ब्रह्माण्ड, दिशाओंके हाथी, कच्छप, शेषजी, पृथ्वी, समुद्र और पर्वत सभी डगमगा उठे।
- लङ्काकाण्ड *
८५९
दो०—शोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार।
जय जय जय करुणानिधि छबि बल गुन आगार ॥ ८६ ॥
[भगवान्की] शोभा देखकर देवता हर्षित होकर फूलोंकी अपार वर्षा करने लगे। और शोभा, शक्ति और गुणोंके धाम करुणानिधान प्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो [ऐसा पुकारने लगे] ॥ ८६ ॥
एहीं बीच निसाचर अनी। कसमसात आई अति घनी ॥
देखि चले सन्मुख कपि भट्टा। प्रलयकाल के जनु घन घट्टा ॥
इसी बीचमें निशाचरोंकी अत्यन्त घनी सेना कसमसाती हुई (आपसमें टकराती हुई) आयी। उसे देखकर वानर योद्धा इस प्रकार [उसके] सामने चले जैसे प्रलयकालके बादलोंके समूह हों ॥ १ ॥
बहु कृपान तरवारि चमंकहिं। जनु दहँ दिसि दामिनीं दमंकहिं ॥
गज रथ तुरग चिकार कठोरा। गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा ॥
बहुत-से कृपाण और तलवारें चमक रही हैं। मानो दसों दिशाओंमें बिजलियाँ चमक रही हों। हाथी, रथ और घोड़ोंका कठोर चिम्पाड़ ऐसा लगता है मानो बादल भयंकर गर्जन कर रहे हों ॥ २ ॥
कपि लंगूर बिपुल नभ छाए। मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए ॥
उठइ धूरि मानहुँ जलधारा। बान बुंद भै बृष्टि अपारा ॥
वानरोंकी बहुत-सी पूँछें आकाशमें छायी हुई हैं। [वे ऐसी शोभा दे रही हैं] मानो सुन्दर इंद्रधनुष उदय हुए हों। धूल ऐसी उठ रही है मानो जलकी धारा हो। बाणरूपी बूँदोंकी अपार वृष्टि हुई ॥ ३ ॥
दुहुँ दिसि पर्वत करहिं प्रहारा। बज्रपात जनु बारहिं बारा ॥
रघुपति कोपि बान झरि लाई। घायल भै निसिचर समुदाई ॥
दोनों ओरसे योद्धा पर्वतोंका प्रहार करते हैं। मानो बारंबार वज्रपात हो रहा हो। श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके बाणोंकी झड़ी लगा दी, [जिससे] राक्षसोंकी सेना घायल हो गयी ॥ ४ ॥
लागत बान बीर चिक्करहीं। घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं ॥
स्ववहिं सैल जनु निर्झर भारी। सोनित सरि कादर भयकारी ॥
बाण लगते ही वीर चीत्कार कर उठते हैं और चक्कर खा-खाकर जहाँ-तहाँ पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं। उनके शरीरोंसे ऐसे खून बह रहा है मानो पर्वतके भारी झरनोंसे जल बह रहा हो। इस प्रकार डरपोकोंको भय उत्पन्न करनेवाली रुधिरकी नदी बह चली ॥ ५ ॥
८६०
- रामचरितमानस *
छं०—कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी । दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी ॥ जलजंतु गज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने । सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने ॥
डरपोकोंको भय उपजानेवाली अत्यन्त अपवित्र रक्तकी नदी बह चली। दोनों दल उसके दोनों किनारे हैं। रथ रेत है और पहिये भँवर हैं। वह नदी बहुत भयावनी बह रही है। हाथी, पैदल, घोड़े, गढ़े तथा अनेकों सवारियाँ ही, जिनकी गिनती कौन करे, नदीके जलजन्तु हैं। बाण, शक्ति और तोमर सर्प हैं; धनुष तरंगें हैं और ढाल बहुत-से कछुवे हैं।
दो०—बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन । कादर देखि डरहिं तहाँ सुभटन्ह के मन चैन ॥ ८७ ॥
वीर पृथ्वीपर इस तरह गिर रहे हैं, मानो नदी-किनारेके वृक्ष ढह रहे हों। बहुत-सी मज्जा बह रही है, वही फेन है। डरपोक जहाँ इसे देखकर डरते हैं, वहाँ उत्तम योद्धाओंके मनमें सुख होता है ॥ ८७ ॥
मज्जहिं भूत पिसाच बेताला । प्रमथ महा झोटिंग कराला ॥ काक कंक लै भुजा उड़ाहीं । एक ते छीनि एक लै खाहीं ॥
भूत, पिशाच और बैताल, बड़े-बड़े झोटोंवाले महान् भयङ्कर झोटिंग और प्रमथ (शिवगण) उस नदीमें स्नान करते हैं। कौए और चील भुजाएँ लेकर उड़ते हैं और एक दूसरेसे छीनकर खा जाते हैं ॥ १ ॥
एक कहहिं ऐसिउ सौँघाई । सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई ॥ कहँरत भट घायल तट गिरे । जहाँ तहाँ मनहुँ अर्धजल परे ॥
एक (कोई) कहते हैं, अरे मूर्खों! ऐसी सस्ती (बहुतायत) है, फिर भी तुम्हारी दरिद्रता नहीं जाती? घायल योद्धा तटपर पड़े कराह रहे हैं, मानो जहाँ-तहाँ अर्धजल (वे व्यक्ति जो मरनेके समय आधे जलमें रखे जाते हैं) पड़े हों ॥ २ ॥
खैँचहिं गीध आँत तट भए । जनु बंसी खेलत चित दए ॥ बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं । जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं ॥
गीध आँतें खींच रहे हैं, मानो मछलीमार नदी-तटपरसे चित लगाये हुए (ध्यानस्थ होकर) बंसी खेल रहे हों (बंसीसे मछली पकड़ रहे हों)। बहुत-से योद्धा बहे जा रहे हैं और पक्षी उनपर चढ़े चले जा रहे हैं। मानो वे नदीमें नावरि (नौकाक्रीड़ा) खेल रहे हों ॥ ३ ॥
- लङ्काकाण्ड *
८६१
जोगिनि भरि भरि खप्पर संचर्हि । भूत पिसाच बधू नभ नंचर्हि ॥ भट कपाल करताल बजावर्हि । चामुंडा नाना बिधि गावर्हि ॥
योगिनियाँ खप्परोंमें भर-भरकर खून जमा कर रही हैं । भूत-पिशाचोंकी स्त्रियाँ आकाशमें नाच रही हैं । चामुण्डाएँ योद्धाओंकी खोपड़ियोंका करताल बजा रही हैं और नाना प्रकारसे गा रही हैं ॥ ४ ॥
जंबुक निकर कटक्कट कट्टर्हि । खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टर्हि ॥ कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लर्हि । सीस परे महि जय जय बोल्लर्हि ॥
गीदड़ोंके समूह कट-कट शब्द करते हुए मुरदोंको काटते, खाते, हुआँ-हुआँ करते और पेट भर जानेपर एक दूसरेको डोँटते हैं । करोड़ों थंड बिना सिरके घूम रहे हैं और सिर पृथ्वीपर पड़े जय-जय बोल रहे हैं ॥ ५ ॥
छं०—बोल्लर्हि जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावर्ही । खप्परिन्ह खग अलुज्झि जुज्झर्हि सुभट भटन्ह ढहावर्ही ॥ बानर निसाचर निकर मर्दर्हि राम बल दर्पित भए । संग्राम अंगन सुभट सोवर्हि राम सर निकरन्हि हए ॥
मुण्ड (कटे सिर) जय-जय बोलते हैं और प्रचण्ड रुण्ड (थंड) बिना सिरके दौड़ते हैं । पक्षी खोपड़ियोंमें उलझ-उलझकर परस्पर लड़े मरते हैं; उत्तम योद्धा दूसरे योद्धाओंको ढहा रहे हैं । श्रीरामचन्द्रजीके बलसे दर्पित हुए वानर राक्षसोंके झुण्डोंको मसले डालते हैं । श्रीरामजीके बाणसमूहोंसे मरे हुए योद्धा लड़ाईके मैदानमें सो रहे हैं ।
दो०—रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संधार । मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार ॥ ८८ ॥
रावणने हृदयमें विचारा कि राक्षसोंका नाश हो गया है । मैं अकेला हूँ और वानर-भालू बहुत हैं, इसलिये मैं अब अपार माया रचूँ ॥ ८८ ॥
देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा । उपजा उर अति छोभ बिसेषा ॥ सुरपति निज रथ तुरत पठावा । हरष सहित मातलि लै आवा ॥
देवताओंने प्रभुको पैदल (बिना सवारीके युद्ध करते) देखा, तो उनके हृदयमें बड़ा भारी शोभ (दुःख) उत्पन्न हुआ । [फिर क्या था] इन्द्रने तुरंत अपना रथ भेज दिया । [उसका सारथि] मातलि हर्षके साथ उसे ले आया ॥ १ ॥
तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा । हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा ॥ चंचल तुरग मनोहर चारी । अजर अमर मन सम गतिकारी ॥
८६२
- रामचरितमानस *
उस दिव्य अनुपम और तेजके पुञ्ज (तेजोमय) रथपर कोसलपुरीके राजा श्रीरामचन्द्रजी हर्षित होकर चढ़े। उसमें चार चञ्चल, मनोहर, अजर, अमर और मनकी गतिके समान शीघ्र चलनेवाले (देवलोकके) घोड़े जुते थे ॥ २ ॥
रथारूढ़ रघुनाथहि देखी । धाए कपि बलु पाइ बिसेषी ॥ सही न जाइ कपिन्ह कै मारी । तब रावन माया बिस्तारी ॥
श्रीरघुनाथजीको रथपर चढ़े देखकर वानर विशेष बल पाकर दौड़े। वानरोंकी मार सही नहीं जाती। तब रावणने माया फैलाई ॥ ३ ॥
सो माया रघुबीरहि बाँची । लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची ॥ देखी कपिन्ह निसाचर अनी । अनुज सहित बहु कोसलधनी ॥
एक श्रीरघुवीरके ही वह माया नहीं लगी। सब वानरोंने और लक्ष्मणजीने भी उस मायाको सच मान लिया। वानरोंने राक्षसी सेनामें भाई लक्ष्मणजीसहित बहुत-से रामोंको देखा ॥ ४ ॥
छं०—बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे । जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहाँ सो तहाँ चितवहिं खरे ॥ निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसलधनी । माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी ॥
बहुत-से राम-लक्ष्मण देखकर वानर-भालू मनमें मिथ्या डरसे बहुत ही डर गये। लक्ष्मणजीसहित वे मानो चित्रलिखे-से जहाँ-के-तहाँ खड़े देखने लगे। अपनी सेनाको आश्चर्यचकित देखकर कोसलपति भगवान् हरि (दुःखोंके हरनेवाले श्रीरामजी) ने हँसकर धनुषपर बाण चढ़ाकर, पलभरमें सारी माया हर ली। वानरोंकी सारी सेना हर्षित हो गयी।
दो०—बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गँभीर । द्रुन्दयुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर ॥ ८९ ॥
फिर श्रीरामजी सबकी ओर देखकर गम्भीर वचन बोले—हे वीरो! तुम सब बहुत ही थक गये हो, इसलिये अब [मेरा और रावणका] द्रुन्दयुद्ध देखो ॥ ८९ ॥
अस कहि रथ रघुनाथ चलावा । बिप्र चरन पंकज सिरु नावा ॥ तब लंकेस क्रोध उर छावा । गर्जत तर्जत सन्मुख धावा ॥
ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने ब्राह्मणोंके चरणकमलोंमें सिर नवाया और फिर रथ चलाया। तब रावणके हृदयमें क्रोध छा गया और वह गरजता तथा ललकारता हुआ सामने दौड़ा ॥ १ ॥
- लङ्काकाण्ड *
८६३
जीतेहु जे भट संजुग माहीं। सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं॥ रावन नाम जगत जस जाना। लोकप जाकें बंदीखाना॥
[उसने कहा—] अरे तपस्वी! सुनो, तुमने युद्धमें जिन योद्धाओंको जीता है, मैं उनके समान नहीं हूँ। मेरा नाम रावण है, मेरा यश सारा जगत् जानता है, लोकपालतक जिसके कैदखानेमें पड़े हैं ॥ २ ॥
खर दूषण बिराध तुम्ह मारा। बधेहु व्याध इव बालि बिचारा॥ निसिचर निकर सुभट संघारेहु। कुंभकरन घननादहि मारेहु॥
तुमने खर, दूषण और विराधको मारा। बेचारे बालिका व्याधकी तरह बध किया। बड़े-बड़े राक्षस योद्धाओंके समूहका संहार किया और कुम्भकर्ण तथा मेघनादको भी मारा॥ ३ ॥
आजु बयरु सबु लेउँ निबाही। जौँ रन भूप भाजि नहिं जाही॥ आजु करउँ खलु काल हवाले। परेहु कठिन रावन के पाले॥
अरे राजा! यदि तुम रणसे भाग न गये तो आज मैं [वह] सारा वैर निकाल लूँगा। आज मैं तुम्हें निश्चय ही कालके हवाले कर दूँगा। तुम कठिन रावणके पाले पड़े हो ॥ ४ ॥
सुनि दुर्बचन कालबस जाना। बिहँसि बचन कह कृपानिधाना॥ सत्य सत्य सब तव प्रभुताई। जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई॥
रावणके दुर्बचन सुनकर और उसे कालवश जान कृपानिधान श्रीरामजीने हँसकर यह बचन कहा—तुम्हारी सारी प्रभुता, जैसा तुम कहते हो, बिल्कुल सच है। पर अब व्यर्थ बकवाद न करो, अपना पुरुषार्थ दिखलाओ ॥ ५ ॥
छं०—जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा। संसार महँ पुरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा॥ एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं। एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं॥
व्यर्थ बकवाद करके अपने सुन्दर यशका नाश न करो। क्षमा करना, तुम्हें नीति सुनाता हूँ, सुनो! संसारमें तीन प्रकारके पुरुष होते हैं—पाटल (गुलाब), आम और कटहलके समान। एक (पाटल) फूल देते हैं, एक (आम) फूल और फल दोनों देते हैं और एक (कटहल) में केवल फल ही लगते हैं। इसी प्रकार [पुरुषोंमें] एक कहते हैं [करते नहीं], दूसरे कहते और करते भी हैं और एक (तीसरे) केवल करते हैं, पर वाणीसे कहते नहीं।
दो०—राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान। बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान॥ ९० ॥
८६४
- रामचरितमानस *
श्रीरामजीके वचन सुनकर वह खूब हँसा (और बोला—) मुझे ज्ञान सिखाते हो? उस समय वैर करते तो नहीं डरे, अब प्राण प्यारे लग रहे हैं ॥ १० ॥
कहि दुर्बचन कृद्ध दसकंधर । कुलिस समान लाग छाँड़ै सर ॥ नानाकार सिलीमुख धाए । दिसि अरु बिदिसि गगन महि छाए ॥
दुर्बचन कहकर रावण कृद्ध होकर वज्रके समान बाण छोड़ने लगा। अनेकों आकारके बाण दौड़े और दिशा, विदिशा तथा आकाश और पृथ्वीमें, सब जगह छा गये ॥ १ ॥
पावक सर छाँड़ेउ रघुबीरा । छन महुँ जरे निसाचर तीरा ॥ छाड़िसि तीब्र सक्ति खिसिआई । बान संग प्रभु फेरि चलाई ॥
श्रीरघुवीरने अग्निबाण छोड़ा, [जिससे] रावणके सब बाण क्षणभरमें भस्म हो गये। तब उसने खिसियाकर तीक्ष्ण शक्ति छोड़ी। [किन्तु] श्रीरामचन्द्रजीने उसको बाणके साथ वापस भेज दिया ॥ २ ॥
कोटिन्ह चक्र त्रिसूल पबारे । बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारे ॥ निफल होहिं रावन सर कैसें । खल के सकल मनोरथ जैसें ॥
वह करोड़ों चक्र और त्रिशूल चलाता है, परन्तु प्रभु उन्हें बिना ही परिश्रम काटकर हटा देते हैं। रावणके बाण किस प्रकार निष्फल होते हैं जैसे दुष्ट मनुष्यके सब मनोरथ ॥ ३ ॥
तब सत बान सारथी मारेसि । परेउ भूमि जय राम पुकारेसि ॥ राम कृपा करि सूत उठावा । तब प्रभु परम क्रोध कहूँ पावा ॥
तब उसने श्रीरामजीके सारथिको सौ बाण मारे। वह श्रीरामजीकी जय पुकारकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। श्रीरामजीने कृपा करके सारथिको उठाया। तब प्रभु अत्यन्त क्रोधको प्राप्त हुए ॥ ४ ॥
छं०—भए कृद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे । कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे ॥ मन्दोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे । चिवकरहिं दिगज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे ॥
युद्धमें शत्रुके विरुद्ध श्रीरघुनाथजी क्रोधित हुए, तब तरकसमें बाण कसमसाने लगे (बाहर निकलनेको आतुर होने लगे)। उनके धनुषका अत्यन्त प्रचण्ड शब्द (टङ्कार) सुनकर मनुष्यभक्षी सब राक्षस वातग्रस्त हो गये (अत्यन्त भयभीत हो गये)। मन्दोदरीका हृदय काँप उठा; समुद्र, कच्छप, पृथ्वी और पर्वत डर गये। दिशाओंके हाथी पृथ्वीको दाँतोसे पकड़कर चिघाड़ने लगे। यह कौतुक देखकर देवता हँसे।