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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 862, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 862

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  • रामचरितमानस *

छं०—कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी । दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी ॥ जलजंतु गज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने । सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने ॥

डरपोकोंको भय उपजानेवाली अत्यन्त अपवित्र रक्तकी नदी बह चली। दोनों दल उसके दोनों किनारे हैं। रथ रेत है और पहिये भँवर हैं। वह नदी बहुत भयावनी बह रही है। हाथी, पैदल, घोड़े, गढ़े तथा अनेकों सवारियाँ ही, जिनकी गिनती कौन करे, नदीके जलजन्तु हैं। बाण, शक्ति और तोमर सर्प हैं; धनुष तरंगें हैं और ढाल बहुत-से कछुवे हैं।

दो०—बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन । कादर देखि डरहिं तहाँ सुभटन्ह के मन चैन ॥ ८७ ॥

वीर पृथ्वीपर इस तरह गिर रहे हैं, मानो नदी-किनारेके वृक्ष ढह रहे हों। बहुत-सी मज्जा बह रही है, वही फेन है। डरपोक जहाँ इसे देखकर डरते हैं, वहाँ उत्तम योद्धाओंके मनमें सुख होता है ॥ ८७ ॥

मज्जहिं भूत पिसाच बेताला । प्रमथ महा झोटिंग कराला ॥ काक कंक लै भुजा उड़ाहीं । एक ते छीनि एक लै खाहीं ॥

भूत, पिशाच और बैताल, बड़े-बड़े झोटोंवाले महान् भयङ्कर झोटिंग और प्रमथ (शिवगण) उस नदीमें स्नान करते हैं। कौए और चील भुजाएँ लेकर उड़ते हैं और एक दूसरेसे छीनकर खा जाते हैं ॥ १ ॥

एक कहहिं ऐसिउ सौँघाई । सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई ॥ कहँरत भट घायल तट गिरे । जहाँ तहाँ मनहुँ अर्धजल परे ॥

एक (कोई) कहते हैं, अरे मूर्खों! ऐसी सस्ती (बहुतायत) है, फिर भी तुम्हारी दरिद्रता नहीं जाती? घायल योद्धा तटपर पड़े कराह रहे हैं, मानो जहाँ-तहाँ अर्धजल (वे व्यक्ति जो मरनेके समय आधे जलमें रखे जाते हैं) पड़े हों ॥ २ ॥

खैँचहिं गीध आँत तट भए । जनु बंसी खेलत चित दए ॥ बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं । जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं ॥

गीध आँतें खींच रहे हैं, मानो मछलीमार नदी-तटपरसे चित लगाये हुए (ध्यानस्थ होकर) बंसी खेल रहे हों (बंसीसे मछली पकड़ रहे हों)। बहुत-से योद्धा बहे जा रहे हैं और पक्षी उनपर चढ़े चले जा रहे हैं। मानो वे नदीमें नावरि (नौकाक्रीड़ा) खेल रहे हों ॥ ३ ॥