श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 863, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
८६१
जोगिनि भरि भरि खप्पर संचर्हि । भूत पिसाच बधू नभ नंचर्हि ॥ भट कपाल करताल बजावर्हि । चामुंडा नाना बिधि गावर्हि ॥
योगिनियाँ खप्परोंमें भर-भरकर खून जमा कर रही हैं । भूत-पिशाचोंकी स्त्रियाँ आकाशमें नाच रही हैं । चामुण्डाएँ योद्धाओंकी खोपड़ियोंका करताल बजा रही हैं और नाना प्रकारसे गा रही हैं ॥ ४ ॥
जंबुक निकर कटक्कट कट्टर्हि । खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टर्हि ॥ कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लर्हि । सीस परे महि जय जय बोल्लर्हि ॥
गीदड़ोंके समूह कट-कट शब्द करते हुए मुरदोंको काटते, खाते, हुआँ-हुआँ करते और पेट भर जानेपर एक दूसरेको डोँटते हैं । करोड़ों थंड बिना सिरके घूम रहे हैं और सिर पृथ्वीपर पड़े जय-जय बोल रहे हैं ॥ ५ ॥
छं०—बोल्लर्हि जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावर्ही । खप्परिन्ह खग अलुज्झि जुज्झर्हि सुभट भटन्ह ढहावर्ही ॥ बानर निसाचर निकर मर्दर्हि राम बल दर्पित भए । संग्राम अंगन सुभट सोवर्हि राम सर निकरन्हि हए ॥
मुण्ड (कटे सिर) जय-जय बोलते हैं और प्रचण्ड रुण्ड (थंड) बिना सिरके दौड़ते हैं । पक्षी खोपड़ियोंमें उलझ-उलझकर परस्पर लड़े मरते हैं; उत्तम योद्धा दूसरे योद्धाओंको ढहा रहे हैं । श्रीरामचन्द्रजीके बलसे दर्पित हुए वानर राक्षसोंके झुण्डोंको मसले डालते हैं । श्रीरामजीके बाणसमूहोंसे मरे हुए योद्धा लड़ाईके मैदानमें सो रहे हैं ।
दो०—रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संधार । मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार ॥ ८८ ॥
रावणने हृदयमें विचारा कि राक्षसोंका नाश हो गया है । मैं अकेला हूँ और वानर-भालू बहुत हैं, इसलिये मैं अब अपार माया रचूँ ॥ ८८ ॥
देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा । उपजा उर अति छोभ बिसेषा ॥ सुरपति निज रथ तुरत पठावा । हरष सहित मातलि लै आवा ॥
देवताओंने प्रभुको पैदल (बिना सवारीके युद्ध करते) देखा, तो उनके हृदयमें बड़ा भारी शोभ (दुःख) उत्पन्न हुआ । [फिर क्या था] इन्द्रने तुरंत अपना रथ भेज दिया । [उसका सारथि] मातलि हर्षके साथ उसे ले आया ॥ १ ॥
तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा । हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा ॥ चंचल तुरग मनोहर चारी । अजर अमर मन सम गतिकारी ॥