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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 864, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 864

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  • रामचरितमानस *

उस दिव्य अनुपम और तेजके पुञ्ज (तेजोमय) रथपर कोसलपुरीके राजा श्रीरामचन्द्रजी हर्षित होकर चढ़े। उसमें चार चञ्चल, मनोहर, अजर, अमर और मनकी गतिके समान शीघ्र चलनेवाले (देवलोकके) घोड़े जुते थे ॥ २ ॥

रथारूढ़ रघुनाथहि देखी । धाए कपि बलु पाइ बिसेषी ॥ सही न जाइ कपिन्ह कै मारी । तब रावन माया बिस्तारी ॥

श्रीरघुनाथजीको रथपर चढ़े देखकर वानर विशेष बल पाकर दौड़े। वानरोंकी मार सही नहीं जाती। तब रावणने माया फैलाई ॥ ३ ॥

सो माया रघुबीरहि बाँची । लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची ॥ देखी कपिन्ह निसाचर अनी । अनुज सहित बहु कोसलधनी ॥

एक श्रीरघुवीरके ही वह माया नहीं लगी। सब वानरोंने और लक्ष्मणजीने भी उस मायाको सच मान लिया। वानरोंने राक्षसी सेनामें भाई लक्ष्मणजीसहित बहुत-से रामोंको देखा ॥ ४ ॥

छं०—बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे । जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहाँ सो तहाँ चितवहिं खरे ॥ निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसलधनी । माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी ॥

बहुत-से राम-लक्ष्मण देखकर वानर-भालू मनमें मिथ्या डरसे बहुत ही डर गये। लक्ष्मणजीसहित वे मानो चित्रलिखे-से जहाँ-के-तहाँ खड़े देखने लगे। अपनी सेनाको आश्चर्यचकित देखकर कोसलपति भगवान् हरि (दुःखोंके हरनेवाले श्रीरामजी) ने हँसकर धनुषपर बाण चढ़ाकर, पलभरमें सारी माया हर ली। वानरोंकी सारी सेना हर्षित हो गयी।

दो०—बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गँभीर । द्रुन्दयुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर ॥ ८९ ॥

फिर श्रीरामजी सबकी ओर देखकर गम्भीर वचन बोले—हे वीरो! तुम सब बहुत ही थक गये हो, इसलिये अब [मेरा और रावणका] द्रुन्दयुद्ध देखो ॥ ८९ ॥

अस कहि रथ रघुनाथ चलावा । बिप्र चरन पंकज सिरु नावा ॥ तब लंकेस क्रोध उर छावा । गर्जत तर्जत सन्मुख धावा ॥

ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने ब्राह्मणोंके चरणकमलोंमें सिर नवाया और फिर रथ चलाया। तब रावणके हृदयमें क्रोध छा गया और वह गरजता तथा ललकारता हुआ सामने दौड़ा ॥ १ ॥