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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

८६०

  • रामचरितमानस *

छं०—कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी । दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी ॥ जलजंतु गज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने । सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने ॥

डरपोकोंको भय उपजानेवाली अत्यन्त अपवित्र रक्तकी नदी बह चली। दोनों दल उसके दोनों किनारे हैं। रथ रेत है और पहिये भँवर हैं। वह नदी बहुत भयावनी बह रही है। हाथी, पैदल, घोड़े, गढ़े तथा अनेकों सवारियाँ ही, जिनकी गिनती कौन करे, नदीके जलजन्तु हैं। बाण, शक्ति और तोमर सर्प हैं; धनुष तरंगें हैं और ढाल बहुत-से कछुवे हैं।

दो०—बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन । कादर देखि डरहिं तहाँ सुभटन्ह के मन चैन ॥ ८७ ॥

वीर पृथ्वीपर इस तरह गिर रहे हैं, मानो नदी-किनारेके वृक्ष ढह रहे हों। बहुत-सी मज्जा बह रही है, वही फेन है। डरपोक जहाँ इसे देखकर डरते हैं, वहाँ उत्तम योद्धाओंके मनमें सुख होता है ॥ ८७ ॥

मज्जहिं भूत पिसाच बेताला । प्रमथ महा झोटिंग कराला ॥ काक कंक लै भुजा उड़ाहीं । एक ते छीनि एक लै खाहीं ॥

भूत, पिशाच और बैताल, बड़े-बड़े झोटोंवाले महान् भयङ्कर झोटिंग और प्रमथ (शिवगण) उस नदीमें स्नान करते हैं। कौए और चील भुजाएँ लेकर उड़ते हैं और एक दूसरेसे छीनकर खा जाते हैं ॥ १ ॥

एक कहहिं ऐसिउ सौँघाई । सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई ॥ कहँरत भट घायल तट गिरे । जहाँ तहाँ मनहुँ अर्धजल परे ॥

एक (कोई) कहते हैं, अरे मूर्खों! ऐसी सस्ती (बहुतायत) है, फिर भी तुम्हारी दरिद्रता नहीं जाती? घायल योद्धा तटपर पड़े कराह रहे हैं, मानो जहाँ-तहाँ अर्धजल (वे व्यक्ति जो मरनेके समय आधे जलमें रखे जाते हैं) पड़े हों ॥ २ ॥

खैँचहिं गीध आँत तट भए । जनु बंसी खेलत चित दए ॥ बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं । जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं ॥

गीध आँतें खींच रहे हैं, मानो मछलीमार नदी-तटपरसे चित लगाये हुए (ध्यानस्थ होकर) बंसी खेल रहे हों (बंसीसे मछली पकड़ रहे हों)। बहुत-से योद्धा बहे जा रहे हैं और पक्षी उनपर चढ़े चले जा रहे हैं। मानो वे नदीमें नावरि (नौकाक्रीड़ा) खेल रहे हों ॥ ३ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८६१

जोगिनि भरि भरि खप्पर संचर्हि । भूत पिसाच बधू नभ नंचर्हि ॥ भट कपाल करताल बजावर्हि । चामुंडा नाना बिधि गावर्हि ॥

योगिनियाँ खप्परोंमें भर-भरकर खून जमा कर रही हैं । भूत-पिशाचोंकी स्त्रियाँ आकाशमें नाच रही हैं । चामुण्डाएँ योद्धाओंकी खोपड़ियोंका करताल बजा रही हैं और नाना प्रकारसे गा रही हैं ॥ ४ ॥

जंबुक निकर कटक्कट कट्टर्हि । खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टर्हि ॥ कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लर्हि । सीस परे महि जय जय बोल्लर्हि ॥

गीदड़ोंके समूह कट-कट शब्द करते हुए मुरदोंको काटते, खाते, हुआँ-हुआँ करते और पेट भर जानेपर एक दूसरेको डोँटते हैं । करोड़ों थंड बिना सिरके घूम रहे हैं और सिर पृथ्वीपर पड़े जय-जय बोल रहे हैं ॥ ५ ॥

छं०—बोल्लर्हि जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावर्ही । खप्परिन्ह खग अलुज्झि जुज्झर्हि सुभट भटन्ह ढहावर्ही ॥ बानर निसाचर निकर मर्दर्हि राम बल दर्पित भए । संग्राम अंगन सुभट सोवर्हि राम सर निकरन्हि हए ॥

मुण्ड (कटे सिर) जय-जय बोलते हैं और प्रचण्ड रुण्ड (थंड) बिना सिरके दौड़ते हैं । पक्षी खोपड़ियोंमें उलझ-उलझकर परस्पर लड़े मरते हैं; उत्तम योद्धा दूसरे योद्धाओंको ढहा रहे हैं । श्रीरामचन्द्रजीके बलसे दर्पित हुए वानर राक्षसोंके झुण्डोंको मसले डालते हैं । श्रीरामजीके बाणसमूहोंसे मरे हुए योद्धा लड़ाईके मैदानमें सो रहे हैं ।

दो०—रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संधार । मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार ॥ ८८ ॥

रावणने हृदयमें विचारा कि राक्षसोंका नाश हो गया है । मैं अकेला हूँ और वानर-भालू बहुत हैं, इसलिये मैं अब अपार माया रचूँ ॥ ८८ ॥

देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा । उपजा उर अति छोभ बिसेषा ॥ सुरपति निज रथ तुरत पठावा । हरष सहित मातलि लै आवा ॥

देवताओंने प्रभुको पैदल (बिना सवारीके युद्ध करते) देखा, तो उनके हृदयमें बड़ा भारी शोभ (दुःख) उत्पन्न हुआ । [फिर क्या था] इन्द्रने तुरंत अपना रथ भेज दिया । [उसका सारथि] मातलि हर्षके साथ उसे ले आया ॥ १ ॥

तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा । हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा ॥ चंचल तुरग मनोहर चारी । अजर अमर मन सम गतिकारी ॥

८६२

  • रामचरितमानस *

उस दिव्य अनुपम और तेजके पुञ्ज (तेजोमय) रथपर कोसलपुरीके राजा श्रीरामचन्द्रजी हर्षित होकर चढ़े। उसमें चार चञ्चल, मनोहर, अजर, अमर और मनकी गतिके समान शीघ्र चलनेवाले (देवलोकके) घोड़े जुते थे ॥ २ ॥

रथारूढ़ रघुनाथहि देखी । धाए कपि बलु पाइ बिसेषी ॥ सही न जाइ कपिन्ह कै मारी । तब रावन माया बिस्तारी ॥

श्रीरघुनाथजीको रथपर चढ़े देखकर वानर विशेष बल पाकर दौड़े। वानरोंकी मार सही नहीं जाती। तब रावणने माया फैलाई ॥ ३ ॥

सो माया रघुबीरहि बाँची । लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची ॥ देखी कपिन्ह निसाचर अनी । अनुज सहित बहु कोसलधनी ॥

एक श्रीरघुवीरके ही वह माया नहीं लगी। सब वानरोंने और लक्ष्मणजीने भी उस मायाको सच मान लिया। वानरोंने राक्षसी सेनामें भाई लक्ष्मणजीसहित बहुत-से रामोंको देखा ॥ ४ ॥

छं०—बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे । जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहाँ सो तहाँ चितवहिं खरे ॥ निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसलधनी । माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी ॥

बहुत-से राम-लक्ष्मण देखकर वानर-भालू मनमें मिथ्या डरसे बहुत ही डर गये। लक्ष्मणजीसहित वे मानो चित्रलिखे-से जहाँ-के-तहाँ खड़े देखने लगे। अपनी सेनाको आश्चर्यचकित देखकर कोसलपति भगवान् हरि (दुःखोंके हरनेवाले श्रीरामजी) ने हँसकर धनुषपर बाण चढ़ाकर, पलभरमें सारी माया हर ली। वानरोंकी सारी सेना हर्षित हो गयी।

दो०—बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गँभीर । द्रुन्दयुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर ॥ ८९ ॥

फिर श्रीरामजी सबकी ओर देखकर गम्भीर वचन बोले—हे वीरो! तुम सब बहुत ही थक गये हो, इसलिये अब [मेरा और रावणका] द्रुन्दयुद्ध देखो ॥ ८९ ॥

अस कहि रथ रघुनाथ चलावा । बिप्र चरन पंकज सिरु नावा ॥ तब लंकेस क्रोध उर छावा । गर्जत तर्जत सन्मुख धावा ॥

ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने ब्राह्मणोंके चरणकमलोंमें सिर नवाया और फिर रथ चलाया। तब रावणके हृदयमें क्रोध छा गया और वह गरजता तथा ललकारता हुआ सामने दौड़ा ॥ १ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८६३

जीतेहु जे भट संजुग माहीं। सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं॥ रावन नाम जगत जस जाना। लोकप जाकें बंदीखाना॥

[उसने कहा—] अरे तपस्वी! सुनो, तुमने युद्धमें जिन योद्धाओंको जीता है, मैं उनके समान नहीं हूँ। मेरा नाम रावण है, मेरा यश सारा जगत् जानता है, लोकपालतक जिसके कैदखानेमें पड़े हैं ॥ २ ॥

खर दूषण बिराध तुम्ह मारा। बधेहु व्याध इव बालि बिचारा॥ निसिचर निकर सुभट संघारेहु। कुंभकरन घननादहि मारेहु॥

तुमने खर, दूषण और विराधको मारा। बेचारे बालिका व्याधकी तरह बध किया। बड़े-बड़े राक्षस योद्धाओंके समूहका संहार किया और कुम्भकर्ण तथा मेघनादको भी मारा॥ ३ ॥

आजु बयरु सबु लेउँ निबाही। जौँ रन भूप भाजि नहिं जाही॥ आजु करउँ खलु काल हवाले। परेहु कठिन रावन के पाले॥

अरे राजा! यदि तुम रणसे भाग न गये तो आज मैं [वह] सारा वैर निकाल लूँगा। आज मैं तुम्हें निश्चय ही कालके हवाले कर दूँगा। तुम कठिन रावणके पाले पड़े हो ॥ ४ ॥

सुनि दुर्बचन कालबस जाना। बिहँसि बचन कह कृपानिधाना॥ सत्य सत्य सब तव प्रभुताई। जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई॥

रावणके दुर्बचन सुनकर और उसे कालवश जान कृपानिधान श्रीरामजीने हँसकर यह बचन कहा—तुम्हारी सारी प्रभुता, जैसा तुम कहते हो, बिल्कुल सच है। पर अब व्यर्थ बकवाद न करो, अपना पुरुषार्थ दिखलाओ ॥ ५ ॥

छं०—जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा। संसार महँ पुरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा॥ एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं। एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं॥

व्यर्थ बकवाद करके अपने सुन्दर यशका नाश न करो। क्षमा करना, तुम्हें नीति सुनाता हूँ, सुनो! संसारमें तीन प्रकारके पुरुष होते हैं—पाटल (गुलाब), आम और कटहलके समान। एक (पाटल) फूल देते हैं, एक (आम) फूल और फल दोनों देते हैं और एक (कटहल) में केवल फल ही लगते हैं। इसी प्रकार [पुरुषोंमें] एक कहते हैं [करते नहीं], दूसरे कहते और करते भी हैं और एक (तीसरे) केवल करते हैं, पर वाणीसे कहते नहीं।

दो०—राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान। बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान॥ ९० ॥

८६४

  • रामचरितमानस *

श्रीरामजीके वचन सुनकर वह खूब हँसा (और बोला—) मुझे ज्ञान सिखाते हो? उस समय वैर करते तो नहीं डरे, अब प्राण प्यारे लग रहे हैं ॥ १० ॥

कहि दुर्बचन कृद्ध दसकंधर । कुलिस समान लाग छाँड़ै सर ॥ नानाकार सिलीमुख धाए । दिसि अरु बिदिसि गगन महि छाए ॥

दुर्बचन कहकर रावण कृद्ध होकर वज्रके समान बाण छोड़ने लगा। अनेकों आकारके बाण दौड़े और दिशा, विदिशा तथा आकाश और पृथ्वीमें, सब जगह छा गये ॥ १ ॥

पावक सर छाँड़ेउ रघुबीरा । छन महुँ जरे निसाचर तीरा ॥ छाड़िसि तीब्र सक्ति खिसिआई । बान संग प्रभु फेरि चलाई ॥

श्रीरघुवीरने अग्निबाण छोड़ा, [जिससे] रावणके सब बाण क्षणभरमें भस्म हो गये। तब उसने खिसियाकर तीक्ष्ण शक्ति छोड़ी। [किन्तु] श्रीरामचन्द्रजीने उसको बाणके साथ वापस भेज दिया ॥ २ ॥

कोटिन्ह चक्र त्रिसूल पबारे । बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारे ॥ निफल होहिं रावन सर कैसें । खल के सकल मनोरथ जैसें ॥

वह करोड़ों चक्र और त्रिशूल चलाता है, परन्तु प्रभु उन्हें बिना ही परिश्रम काटकर हटा देते हैं। रावणके बाण किस प्रकार निष्फल होते हैं जैसे दुष्ट मनुष्यके सब मनोरथ ॥ ३ ॥

तब सत बान सारथी मारेसि । परेउ भूमि जय राम पुकारेसि ॥ राम कृपा करि सूत उठावा । तब प्रभु परम क्रोध कहूँ पावा ॥

तब उसने श्रीरामजीके सारथिको सौ बाण मारे। वह श्रीरामजीकी जय पुकारकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। श्रीरामजीने कृपा करके सारथिको उठाया। तब प्रभु अत्यन्त क्रोधको प्राप्त हुए ॥ ४ ॥

छं०—भए कृद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे । कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे ॥ मन्दोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे । चिवकरहिं दिगज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे ॥

युद्धमें शत्रुके विरुद्ध श्रीरघुनाथजी क्रोधित हुए, तब तरकसमें बाण कसमसाने लगे (बाहर निकलनेको आतुर होने लगे)। उनके धनुषका अत्यन्त प्रचण्ड शब्द (टङ्कार) सुनकर मनुष्यभक्षी सब राक्षस वातग्रस्त हो गये (अत्यन्त भयभीत हो गये)। मन्दोदरीका हृदय काँप उठा; समुद्र, कच्छप, पृथ्वी और पर्वत डर गये। दिशाओंके हाथी पृथ्वीको दाँतोसे पकड़कर चिघाड़ने लगे। यह कौतुक देखकर देवता हँसे।

  • लङ्काकाण्ड *

८६५

दो०—तानेउ चाप श्रवन लगि छोंड़े बिसिख कराल।

राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याल ॥ ११ ॥

धनुषको कानतक तानकर श्रीरामचन्द्रजीने भयानक बाण छोड़े। श्रीरामजीके बाणसमूह ऐसे चले मानो सर्प लहलहाते (लहराते) हुए जा रहे हों ॥ ११ ॥

चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा ॥

रथ बिभंजि हति केतु पताका। गर्जा अति अंतर बल थाका ॥

बाण ऐसे चले मानो पंखवाले सर्प उड़ रहे हों। उन्होंने पहले सारथि और घोड़ोंको मार डाला। फिर रथको चूर-चूर करके ध्वजा और पताकाओंको गिरा दिया। तब रावण बड़े जोरसे गरजा, पर भीतरसे उसका बल थक गया था ॥ ११ ॥

तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना। अस्त्र सस्त्र छोंड़ेसि बिधि नाना ॥

बिफल होहिं सब उद्यम ताके। जिमि परद्रोह निरत मनसा के ॥

तुरंत दूसरे रथपर चढ़कर खिसियाकर उसने नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र छोड़े। उसके सब उद्योग वैसे ही निष्फल हो रहे हैं जैसे परद्रोहमें लगे हुए चित्तवाले मनुष्यके होते हैं ॥ १२ ॥

तब रावन दस सूल चलावा। बाजि चारि महि मारि गिरावा ॥

तुरग उठाइ कोपि रघुनायक। खैँचि सरासन छोंड़े सायक ॥

तब रावणने दस त्रिशूल चलाये और श्रीरामजीके चारों घोड़ोंको मारकर पृथ्वीपर गिरा दिया। घोड़ोंको उठाकर श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके धनुष खींचकर बाण छोड़े ॥ १३ ॥

रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी ॥

दस दस बान भाल दस मारे। निसरि गए चले रुधिर पनारे ॥

रावणके सिररूपी कमलवनमें विचरण करनेवाले श्रीरघुवीरके बाणरूपी भ्रमरोंकी पंक्ति चली। श्रीरामचन्द्रजीने उसके दसों सिरोंमें दस-दस बाण मारे, जो आर-पार हो गये और सिरोंसे रक्तके पनाले बह चले ॥ १४ ॥

स्वत रुधिर धायउ बलवाना। प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना ॥

तीस तीर रघुबीर पबारे। भुजन्हि समेत सीस महि पारे ॥

रुधिर बहते हुए ही बलवान् रावण दौड़ा। प्रभुने फिर धनुषपर बाण सन्धान किया। श्रीरघुवीरने तीस बाण मारे और बीसों भुजाओंसमेत दसों सिर काटकर पृथ्वीपर गिरा दिये ॥ १५ ॥

काटतहीं पुनि भए नबीने। राम बहोरि भुजा सिर छीने ॥

प्रभु बहु बार बाहु सिर हए। कटत झटिति पुनि नूतन भए ॥

८६६

  • रामचरितमानस *

[सिर और हाथ] काटते ही फिर नये हो गये। श्रीरामजीने फिर भुजाओं और सिरोंको काट गिराया। इस तरह प्रभुने बहुत बार भुजाएँ और सिर काटे। परन्तु काटते ही वे तुरन्त फिर नये हो गये ॥ ६ ॥

पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा । अति कौतुकी कोसलाधीसा ॥ रहे छाड़ नभ सिर अरु बाहु । मानहुँ अमित केतु अरु राहु ॥

प्रभु बार-बार उसकी भुजा और सिरोंको काट रहे हैं; क्योंकि कोसलपति श्रीरामजी बड़े कौतुकी हैं। आकाशमें सिर और बाहु ऐसे छा गये हैं, मानो असंख्य केतु और राहु हों ॥ ७ ॥

छं०—जनु राहु केतु अनेक नभ पथ स्वत सोनित थावहीं । रघुवीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरन न पावहीं ॥ एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं । जनु कोपि दिनकर कर निकर जहँ तहँ बिधंतुद पोहहीं ॥

मानो अनेकों राहु और केतु रुधिर बहाते हुए आकाशमार्गसे दौड़ रहे हों। श्रीरघुवीरके प्रचण्ड बाणोंके [बार-बार] लगनेसे वे पृथ्वीपर गिरने नहीं पाते। एक-एक बाणसे समूह-के-समूह सिर छिदे हुए आकाशमें उड़ते ऐसे शोभा दे रहे हैं मानो सूर्यकी किरणें क्रोध करके जहाँ-तहाँ राहुओंको पिरों रही हों।

दो०—जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार । सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार ॥ १२ ॥

जैसे-जैसे प्रभु उसके सिरोंको काटते हैं, वैसे-ही-वैसे वे अपार होते जाते हैं। जैसे विषयोंका सेवन करनेसे काम (उन्हें भोगनेकी इच्छा) दिन-प्रति-दिन नया-नया बढ़ता जाता है ॥ १२ ॥

दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी । बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी ॥ गर्जैउ मूढ़ महा अभिमानी । धायउ दसहु सरासन तानी ॥

सिरोंकी बाढ़ देखकर रावणको अपना मरण भूल गया और बड़ा गहरा क्रोध हुआ। वह महान् अभिमानी मूर्ख गरजा और दसों धनुषोंको तानकर दौड़ा ॥ १ ॥

समर भूमि दसकंधर कोप्यो । बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो ॥ दंड एक रथ देखि न परेऊ । जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ ॥

रणभूमिमें रावणने क्रोध किया और बाण बरसाकर श्रीरघुनाथजीके रथको ढक दिया। एक दण्ड (घड़ी) तक रथ दिखलायी न पड़ा, मानो कुहरेमें सूर्य छिप गया हो ॥ २ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८६७

हाहाकार सुरन्ह जब कीन्हा । तब प्रभु कोपि कारमुक लीन्हा ॥ सर निवारि रिपु के सिर काटे । ते दिसि बिदिसि गगन महि पाटे ॥

जब देवताओंने हाहाकार किया, तब प्रभुने क्रोध करके धनुष उठाया । और शत्रुके बाणोंको हटाकर उन्होंने शत्रुके सिर काटे और उनसे दिशा-विदिशा, आकाश और पृथ्वी सबको पाट दिया ॥ ३ ॥

काटे सिर नभ मारग धावहिं । जय जय धुनि करि भय उपजावहिं ॥ कहैं लछिमन सुग्रीव कपीसा । कहैं रघुबीर कोसलाधीसा ॥

काटे हुए सिर आकाशमार्गसे दौड़ते हैं और जय-जयकी ध्वनि करके भय उत्पन्न करते हैं। 'लक्ष्मण और वानरराज सुग्रीव कहाँ हैं ? कोसलपति रघुवीर कहाँ हैं ?' ॥ ४ ॥

छं०—कहैं रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले । संधानि धनु रघुबंसमनि हँसि सरन्हि सिर बेधे भले ॥ सिर मालिका कर कालिका गहि बृंद बृंदन्हि बहु मिलीं । करि रुधिर सरि मज्जनु मनहुँ संग्राम बट पूजन चलीं ॥

'राम कहाँ हैं ?' यह कहकर सिरोंके समूह दौड़े, उन्हें देखकर वानर भाग चले । तब धनुष सन्धान करके रघुकुलमणि श्रीरामजीने हँसकर बाणोंसे उन सिरोंको भलीभाँति बेध डाला। हाथोंमें मुण्डोंकी मालाएँ लेकर बहुत-सी कालिकाएँ झुंड-की-झुंड मिलकर इकट्ठी हुई और वे रुधिरकी नदीमें स्नान करके चलीं, मानो संग्रामरूपी वटवृक्षकी पूजा करने जा रही हों।

दो०—पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड । चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड ॥ १३ ॥

फिर रावणने क्रोधित होकर प्रचण्ड शक्ति छोड़ी । वह विभीषणके सामने ऐसी चली जैसे काल (यमराज) का दण्ड हो ॥ १३ ॥

आवत देखि सक्ति अति घोरा । प्रनतारति भंजन पन मोरा ॥ तुरत बिभीषन पाछें मेला । सन्मुख राम सहेउ सोड़ सेला ॥

अत्यन्त भयानक शक्तिको आती देख और यह विचारकर कि मेरा प्रण शरणागतके दुःखका नाश करना है, श्रीरामजीने तुरंत ही विभीषणको पीछे कर लिया और सामने होकर वह शक्ति स्वयं सह ली ॥ १ ॥

लागि सक्ति मुरुछा कछु भई । प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई ॥ देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो । गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो ॥

८६८

  • रामचरितमानस *

शक्ति लगनेसे उन्हें कुछ मूर्च्छा हो गयी। प्रभुने तो यह लीला की, पर देवताओंको व्याकुलता हुई। प्रभुको श्रम (शारीरिक कष्ट) प्राप्त हुआ देखकर विभीषण क्रोधित हो हाथमें गदा लेकर दौड़े ॥ २ ॥

रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे । तैं सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे ॥ सादर सिव कहूँ सीस चढ़ाए । एक एक के कोटिन्ह पाए ॥

[और बोले—] अरे अभागे! मूर्ख, नीच, दुर्बुद्धि! तूने देवता, मनुष्य, मुनि, नाग सभीसे विरोध किया। तूने आदरसहित शिवजीको सिर चढ़ाये। इसीसे एक-एकके बदलेमें करोड़ों पाये ॥ ३ ॥

तेहि कारन खल अब लंगि बाँच्यो । अब तव कालु सीस पर नाच्यो ॥ राम बिमुख सठ चहसि संपदा । अस कहि हनेसि माझ उर गदा ॥

उसी कारणसे अरे दुष्ट! तू अबतक बचा है। [किन्तु] अब काल तेरे सिरपर नाच रहा है। अरे मूर्ख! तू रामविमुख होकर सम्पत्ति (सुख) चाहता है? ऐसा कहकर विभीषणने रावणकी छातीके बीचो-बीच गदा मारी ॥ ४ ॥

छं०—उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पख्यो । दस बदन सोनित स्वत पुनि संभारि धायो रिस भख्यो ॥ द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै । रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहूँ गनै ॥

बीच छातीमें कठोर गदाकी घोर और कठिन चोट लगते ही वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके दसों मुखोंसे रुधिर बहने लगा; वह अपनेको फिर सँभालकर क्रोधमें भरा हुआ दौड़ा। दोनों अत्यन्त बलवान् योद्धा भिड़ गये और मल्लयुद्धमें एक दूसरेके विरुद्ध होकर मारने लगे। श्रीरघुवीरके बलसे गर्वित विभीषण उसको (रावण-जैसे जगद्विजयी योद्धाको) पासंगके बराबर भी नहीं समझते।

दो०—उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ । सो अब भिरत काल ज्यों श्रीरघुबीर प्रभाउ ॥ १४ ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! विभीषण क्या कभी रावणके सामने आँख उठाकर भी देख सकता था? परन्तु अब वही कालके समान उससे भिड़ रहा है। यह श्रीरघुवीरका ही प्रभाव है ॥ १४ ॥

देखा श्रमित बिभीषनु भारी । धायउ हनूमान गिरि धारी ॥ रथ तुरंग सारथी निपाता । हृदय माझ तेहि मारेसि लाता ॥

विभीषणको बहुत ही थका हुआ देखकर हनुमान्जी पर्वत धारण किये हुए दौड़े। उन्होंने उस पर्वतसे रावणके रथ, घोड़े और सारथिका संहार कर डाला और उसके सीनेपर लात मारी ॥ १ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८६१

ठाढ़ रहा अति कंपित गाता । गयड बिभीषनु जहँ जनत्राता ॥ पुनि रावन कपि हतेउ पचारी । चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी ॥

रावण खड़ा रहा, पर उसका शरीर अत्यन्त काँपने लगा। विभीषण वहाँ गये जहाँ सेवकोंके रक्षक श्रीरामजी थे। फिर रावणने ललकारकर हनुमान्जीको मारा। वे पूँछ फैलाकर आकाशमें चले गये ॥ २ ॥

गहिंसि पूँछ कपि सहित उड़ाना । पुनि फिरि भिरेउ प्रबल हनुमाना ॥ लरत अकास जुगल सम जोधा । एकहि एकु हनत करि क्रोधा ॥

रावणने पूँछ पकड़ ली, हनुमान्जी उसको साथ लिये हुए ऊपर उड़े। फिर लौटकर महाबलवान् हनुमान्जी उससे भिड़ गये। दोनों समान योद्धा आकाशमें लड़ते हुए एक-दूसरेको क्रोध करके मारने लगे ॥ ३ ॥

सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं । कज्जलगिरि सुमेरु जनु लरहीं ॥ बुधि बल निसिचर परड़ न पार्यो । तब मारुतसुत प्रभु संभार्यो ॥

दोनों बहुत-से छल-बल करते हुए आकाशमें ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो कज्जलगिरि और सुमेरु पर्वत लड़ रहे हों। जब बुद्धि और बलसे राक्षस गिराये न गिरा तब मारुति श्रीहनुमान्जीने प्रभुको स्मरण किया ॥ ४ ॥

छं०—संभारि श्रीरघुवीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो । महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहँ जय जय भन्यो ॥ हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले । रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले ॥

श्रीरघुवीरका स्मरण करके धीर हनुमान्जीने ललकारकर रावणको मारा। वे दोनों पृथ्वीपर गिरते और फिर उठकर लड़ते हैं; देवताओंने दोनोंकी 'जय-जय' पुकारी। हनुमान्जीपर सङ्कट देखकर वानर-भालू क्रोधातुर होकर दौड़े। किन्तु रण-मद-माते रावणने सब योद्धाओंको अपने प्रचण्ड भुजाओंके बलसे कुचल और मसल डाला।

दो०—तब रघुवीर पचारि धाए कीस प्रचंड । कपि बल प्रबल देखि तेहिं कीन्ह प्रगट पाषंड ॥ १५ ॥

तब श्रीरघुवीरके ललकारनेपर प्रचण्ड वीर वानर दौड़े। वानरोंके प्रबल दलको देखकर रावणने माया प्रकट की ॥ १५ ॥

अंतरधान भयउ छन एका । पुनि प्रगटे खल रूप अनेका ॥ रघुपति कटक भालु कपि जेते । जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते ॥

८७०

  • रामचरितमानस *

क्षण भरके लिये वह अदृश्य हो गया। फिर उस दुष्टने अनेकों रूप प्रकट किये। श्रीरघुनाथजीकी सेनामें जितने रीछ-वानर थे, उतने ही रावण जहाँ-तहाँ (चारों ओर) प्रकट हो गये ॥ १ ॥

देखे कपिन्ह अमित दससीसा । जहाँ तहाँ भजे भालु अरु कीसा ॥ भागे बानर धरहिं न धीरा । त्राहि त्राहि लछिमन रघुबीरा ॥

वानरोंने अपरिमित रावण देखे। भालू और वानर सब जहाँ-तहाँ (इधर-उधर) भाग चले। वानर धीरज नहीं धरते। हे लक्ष्मणजी! हे रघुवीर! बचाइये, बचाइये, यों पुकारते हुए वे भागे जा रहे हैं ॥ २ ॥

दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन । गर्जीहिं घोर कठोर भयावन ॥ डरे सकल सुर चले पराई । जय कै आस तजहु अब भाई ॥

दसों दिशाओंमें करोड़ों रावण दौड़ते हैं और घोर, कठोर भयानक गर्जन कर रहे हैं। सब देवता डर गये और ऐसा कहते हुए भाग चले कि हे भाई! अब जयकी आशा छोड़ दो! ॥ ३ ॥

सब सुर जिते एक दसकंधर । अब बहु भए तकहु गिरि कंदर ॥ रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी । जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी ॥

एक ही रावणने सब देवताओंको जीत लिया था, अब तो बहुत-से रावण हो गये हैं। इससे अब पहाड़की गुफाओंका आश्रय लो (अर्थात् उनमें छिप रहो)। वहाँ ब्रह्मा, शम्भु और ज्ञानी मुनि ही डटे रहे, जिन्होंने प्रभुकी कुछ महिमा जानी थी ॥ ४ ॥

छं०—जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे । चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे ॥ हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे । मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे ॥

जो प्रभुका प्रताप जानते थे, वे निर्भय डटे रहे। वानरोंने शत्रुओं (बहुत-से रावणों) को सच्चा ही मान लिया। [इससे] सब वानर-भालू विचलित होकर 'हे कृपालु! रक्षा कीजिये' [यों पुकारते हुए] भयसे व्याकुल होकर भाग चले। अत्यन्त बलवान् रणबाँकुरे हनुमान्जी, अंगद, नील और नल लड़ते हैं और कपटरूपी भूमिसे अड़ुरकी भाँति उपजे हुए कोटि-कोटि योद्धा रावणोंको मसलते हैं।

दो०—सुर बानर देखे बिकल हँस्यो कोसलाधीस । सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस ॥ १६ ॥

देवताओं और वानरोंको विकल देखकर कोसलपति श्रीरामजी हँसे और शाङ्कधनुषपर एक बाण चढ़ाकर [मायाके बने हुए] सब रावणोंको मार डाला ॥ १६ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८७१

प्रभु छन महुँ माया सब काटी । जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी ॥ रावनु एकु देखि सुर हरषे । फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरषे ॥

प्रभुने क्षणभरमें सब माया काट डाली। जैसे सूर्यके उदय होते ही अन्धकारकी राशि फट जाती है (नष्ट हो जाती है)। अब एक ही रावणको देखकर देवता हर्षित हुए और उन्होंने लौटकर प्रभुपर बहुत-से पुष्प बरसाये ॥ १ ॥

भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे । फिरे एक एकन्ह तब टेरे ॥ प्रभु बलु पाइ भालु कपि धाए । तरल तमकि संजुग महि आए ॥

श्रीरघुनाथजीने भुजा उठाकर सब वानरोंको लौटाया। तब वे एक दूसरेको पुकार-पुकारकर लौट आये। प्रभुका बल पाकर रीछ-वानर दौड़ पड़े। जल्दीसे कूदकर वे रणभूमिमें आ गये ॥ २ ॥

अस्तुति करत देवतन्हि देखें । भयउँ एक मैं इन्ह के लेखें ॥ सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल । अस कहि कोपि गगन पर धायल ॥

देवताओंको श्रीरामजीकी स्तुति करते देखकर रावणने सोचा, मैं इनकी समझमें एक हो गया। [परन्तु इन्हें यह पता नहीं कि इनके लिये मैं एक ही बहुत हूँ ] और कहा—अरे मूर्खों! तुम तो सदाके ही मेरे मरैल (मेरी मार खानेवाले) हो। ऐसा कहकर वह क्रोध करके आकाशपर [देवताओंकी ओर] दौड़ा ॥ ३ ॥

हाहाकार करत सुर भागे । खलहु जाहु कहैं मोरें आगे ॥ देखि बिकल सुर अंगद धायो । कूदि चरन गहि भूमि गिरायो ॥

देवता हाहाकार करते हुए भागे। [रावणने कहा—] दुष्टो! मेरे आगेसे कहाँ जा सकोगे? देवताओंको व्याकुल देखकर अंगद दौड़े और उछलकर रावणका पैर पकड़कर [उन्होंने] उसको पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ४ ॥

छं०—गहि भूमि पार्यो लात मार्यो बालिसुत प्रभु पहिं गयो । संभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो ॥ करि दाप चाप चढ़ाइ दस संधानि सर बहु बरषई । किए सकल भट घायल भयाकुल देखि निज बल हरषई ॥

उसे पकड़कर पृथ्वीपर गिराकर लात मारकर बालिपुत्र अंगद प्रभुके पास चले गये। रावण सँभलकर उठा और बड़े भयङ्कर कठोर शब्दसे गरजने लगा। वह दर्प करके दसों धनुष चढ़ाकर उनपर बहुत-से बाण सन्धान करके बरसाने लगा। उसने सब योद्धाओंको घायल और भयसे व्याकुल कर दिया और अपना बल देखकर वह हर्षित होने लगा।

८७२

  • रामचरितमानस *

दो०—तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप। काटे बहुत बड़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप ॥ १७ ॥

तब श्रीरघुनाथजीने रावणके सिर, भुजाएँ, बाण और धनुष काट डाले। पर वे फिर बहुत बढ़ गये, जैसे तीर्थमें किये हुए पाप बढ़ जाते हैं (कई गुना अधिक भयानक फल उत्पन्न करते हैं) ! ॥ १७ ॥

सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी । भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी ॥ मरत न मूढ़ कटेहुँ भुज सीसा । धाए कोपि भालु भट कीसा ॥

शत्रुके सिर और भुजाओंकी बढ़ती देखकर रीछ-वानरोंको बहुत ही क्रोध हुआ। यह मूर्ख भुजाओंके और सिरोंके कटनेपर भी नहीं मरता, [ऐसा कहते हुए] भालू और वानर योद्धा क्रोध करके दौड़े ॥ १ ॥

बालितनय मारुति नल नीला । बानरराज दुबिद बलसीला ॥ बिटप महीधर करहिं प्रहारा । सोड़ गिरि तरु गहि कपिन्ह सो मारा ॥

बालिपुत्र अंगद, मारुति हनुमान्जी, नल, नील, वानरराज सुग्रीव और द्विविद आदि बलवान् उसपर वृक्ष और पर्वतोंका प्रहार करते हैं। वह उन्हीं पर्वतों और वृक्षोंको पकड़कर वानरोंको मारता है ॥ २ ॥

एक नखन्हि रिपु बपुष बिदारी । भागि चलहिं एक लातन्ह मारी ॥ तब नल नील सिरन्हि चढ़ि गयऊ । नखन्हि लिलार बिदारत भयऊ ॥

कोई एक वानर नखोंसे शत्रुके शरीरको फाड़कर भाग जाते हैं, तो कोई उसे लातोंसे मारकर। तब नल और नील रावणके सिरोंपर चढ़ गये और नखोंसे उसके ललाटको फाड़ने लगे ॥ ३ ॥

रुधिर देखि बिषाद उर भारी । तिन्हहि धरन कहँ भुजा पसारी ॥ गहे न जाहिं करन्हि पर फिरहीं । जनु जुग मधुप कमल बन चरहीं ॥

खून देखकर उसे हृदयमें बड़ा दुःख हुआ। उसने उनको पकड़नेके लिये हाथ फैलाये, पर वे पकड़में नहीं आते, हाथोंके ऊपर-ऊपर ही फिरते हैं मानो दो भौर कमलोंके वनमें विचरण कर रहे हों ॥ ४ ॥

कोपि कूदि द्वौ धरेसि बहोरी । महि पटकत भजे भुजा मरोरी ॥ पुनि सकोप दस धनु कर लीन्हे । सरन्हि मारि घायल कपि कीन्हे ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८७३

तब उसने क्रोध करके उछलकर दोनोंको पकड़ लिया। पृथ्वीपर पटकते समय वे उसकी भुजाओंको मरोड़कर भाग छूटे। उसने क्रोध करके हाथोंमें दसों धनुष लिये और वानरोंको बाणोंसे मारकर घायल कर दिया ॥ ५ ॥

हनुमदादि मुरुछित करि बंदर । पाड़ प्रदोष हरष दसकंधर ॥ मुरुछित देखि सकल कपि बीरा । जामवंत धायउ रनधीरा ॥

हनुमान्जी आदि सब वानरोंको मूर्च्छित करके और सन्ध्याका समय पाकर रावण हर्षित हुआ। समस्त वानर-वीरोंको मूर्च्छित देखकर रणधीर जाम्बवान् दौड़े ॥ ६ ॥

संग भालु भूधर तरु धारी । मारन लगे पचारि पचारी ॥ भयउ क्रुब्ध रावन बलवाना । गहि पद महि पटकड़ भट नाना ॥

जाम्बवान्के साथ जो भालू थे, वे पर्वत और वृक्ष धारण किये रावणको ललकार-ललकारकर मारने लगे। बलवान् रावण क्रोधित हुआ और पैर पकड़-पकड़कर वह अनेकों योद्धाओंको पृथ्वीपर पटकने लगा ॥ ७ ॥

देखि भालुपति निज दल घाता । कोपि माझ उर मारेसि लाता ॥

जाम्बवान्ने अपने दलका विध्वंस देखकर क्रोध करके रावणकी छातीमें लात मारी ॥ ८ ॥

छं०—उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा ।

गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा ॥

मुरुछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयो ।

निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतनु करत भयो ॥

छातीमें लातका प्रचण्ड आघात लगते ही रावण व्याकुल होकर रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसने बीसों हाथोंमें भालुओंको पकड़ रखा था। [ऐसा जान पड़ता था] मानो रात्रिके समय भौर कमलोंमें बसे हुए हों। उसे मूर्च्छित देखकर, फिर लात मारकर ऋक्षराज जाम्बवान् प्रभुके पास चले गये। रात्रि जानकर सारथि रावणको रथमें डालकर उसे होशमें लानेका उपाय करने लगा।

दो०—मुरुछा बिगत भालु कपि सब आए प्रभु पास ।

निसिचर सकल रावनहि घेरि रहे अति त्रास ॥ १८ ॥

मूर्च्छा दूर होनेपर सब रीछ-वानर प्रभुके पास आये। उधर सब राक्षसोंने बहुत ही भयभीत होकर रावणको घेर लिया ॥ १८ ॥

मासपारायण, छब्बीसवाँ विश्राम

तेही निसि सीता पहिं जाई । त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई ॥

सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी । सीता उर भड़ त्रास घनेरी ॥

८७४

  • रामचरितमानस *

उसी रात त्रिजटाने सीताजीके पास जाकर उन्हें सब कथा कह सुनायी। शत्रुके सिर और भुजाओंकी बढ़तीका संवाद सुनकर सीताजीके हृदयमें बड़ा भय हुआ ॥ १ ॥

मुख मलीन उपजी मन चिंता । त्रिजटा सन बोली तब सीता ॥ होइहि कहा कहसि किन माता । केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता ॥

[उनका] मुख उदास हो गया, मनमें चिन्ता उत्पन्न हो गयी। तब सीताजी त्रिजटासे बोली—हे माता! बताती क्यों नहीं? क्या होगा? सम्पूर्ण विश्वको दुःख देनेवाला यह किस प्रकार मरेगा? ॥ २ ॥

रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई । बिधि बिपरीत चरित सब करई ॥ मोर अभाग्य जिआवत ओही । जेहिँ हौँ हरि पद कमल बिछोही ॥

श्रीरघुनाथजीके बाणोंसे सिर कटनेपर भी नहीं मरता। विधाता सारे चरित्र विपरीत (उलटे) ही कर रहा है। [सच बात तो यह है कि] मेरा दुर्भाग्य ही उसे जिला रहा है, जिसने मुझे भगवान् के चरण-कमलोंसे अलग कर दिया है ॥ ३ ॥

जेहिँ कृत कपट कनक मृग झूठा । अजहुँ सो दैव मोहि पर रूठा ॥ जेहिँ बिधि मोहि दुख दुसह सहाए । लछिमन कहुँ कटु बचन कहाए ॥

जिसने कपटका झूठा स्वर्णमृग बनाया था, वही दैव अब भी मुझपर रूठा हुआ है। जिस विधाताने मुझसे दुःसह दुःख सहन कराये और लक्ष्मणको कटुवे वचन कहलाये, ॥ ४ ॥

रघुपति विरह सबिष सर भारी । तकि तकि मार बार बहु मारी ॥ ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना । सोड़ बिधि ताहि जिआव न आना ॥

जो श्रीरघुनाथजीके विरहरूपी बड़े विपैले बाणोंसे तक-तककर मुझे बहुत बार मारकर, अब भी मार रहा है और ऐसे दुःखमें भी जो मेरे प्राणोंको रख रहा है, वही विधाता उस (रावण) को जिला रहा है, दूसरा कोई नहीं ॥ ५ ॥

बहु बिधि कर बिलाप जानकी । करि करि सुरति कृपानिधान की ॥ कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी । उर सर लागत मरइ सुरारी ॥

कृपानिधान श्रीरामजीकी याद कर-करके जानकीजी बहुत प्रकारसे विलाप कर रही हैं। त्रिजटाने कहा—हे राजकुमारी! सुनो, देवताओंका शत्रु रावण हृदयमें बाण लगते ही मर जायगा ॥ ६ ॥

प्रभु ताते उर हतइ न तेही । एहि के हृदयँ बसति बैदेही ॥

परन्तु प्रभु उसके हृदयमें बाण इसलिये नहीं मारते कि इसके हृदयमें जानकीजी (आप) बसती हैं ॥ ७ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८७५

छं०—एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है। मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है ॥ सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटों कहा। अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा ॥

[वे यही सोचकर रह जाते हैं कि] इसके हृदयमें जानकीका निवास है, जानकीके हृदयमें मेरा निवास है और मेरे उदरमें अनेकों भुवन हैं। अतः रावणके हृदयमें बाण लगते ही सब भुवनोंका नाश हो जायगा। यह वचन सुनकर, सीताजीके मनमें अत्यन्त हर्ष और विषाद हुआ देखकर त्रिजटाने फिर कहा—हे सुन्दरी! महान् सन्देशका त्याग कर दो; अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा—

दो०—काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान। तब रावनहि हृदय महुँ मरिहहिं रामु सुजान ॥ ११ ॥

सिरोंके बार-बार काटे जानेसे जब वह व्याकुल हो जायगा और उसके हृदयसे तुम्हारा ध्यान छूट जायगा, तब सुजान (अन्तर्यामी) श्रीरामजी रावणके हृदयमें बाण मारेंगे ॥ ११ ॥

अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई ॥ राम सुभाउ सुमिरि बैदेही। उपजी बिरह बिथा अति तेही ॥

ऐसा कहकर और सीताजीको बहुत प्रकारसे समझाकर फिर त्रिजटा अपने घर चली गयी। श्रीरामचन्द्रजीके स्वभावका स्मरण करके जानकीजीको अत्यन्त विरहव्यथा उत्पन्न हुई ॥ १ ॥

निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती ॥ करति विलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी ॥

वे रात्रिकी और चन्द्रमाकी बहुत प्रकारसे निन्दा कर रही हैं [और कह रही हैं—] रात युगके समान बड़ी हो गयी, वह बीतती ही नहीं। जानकीजी श्रीरामजीके विरहमें दुःखी होकर मन-ही-मन भारी विलाप कर रही हैं ॥ २ ॥

जब अति भयउ बिरह उर दाहू। फरकेउ बाम नयन अरु बाहू ॥ सगुन बिचारि धरी मन धीरा। अब मिलिहहिं कृपाल रघुबीरा ॥

जब विरहेके मारे हृदयमें दारुण दाह हो गया, तब उनका बायाँ नेत्र और बाहू फड़क उठे। शकुन समझकर उन्होंने मनमें धैर्य धारण किया कि अब कृपालु श्रीरघुवीर अवश्य मिलेंगे ॥ ३ ॥

इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा। निज सारथि सन खीझन लागा ॥ सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही। धिग धिग अधम मंदमति तोही ॥

८७६

  • रामचरितमानस *

यहाँ आधी रातको रावण [मूच्छीसे] जगा और अपने सारथिपर रुष्ट होकर कहने लगा—अरे मूर्ख! तूने मुझे रणभूमिसे अलग कर दिया। अरे अधम! अरे मन्दबुद्धि! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है! ॥ ४ ॥ तेहिं पद गहि बहु बिधि समुद्गावा । भोरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा ॥ सुनि आगवनु दसानन केरा । कपि दल खरभर भयउ घनेरा ॥

सारथिने चरण पकड़कर रावणको बहुत प्रकारसे समझाया। सबेरा होते ही वह रथपर चढ़कर फिर दौड़ा। रावणका आना सुनकर वानरोंकी सेनामें बड़ी खलबली मच गयी ॥ ५ ॥

जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी । धाए कटकटाइ भट भारी ॥

वे भारी योद्धा जहाँ-तहाँसे पर्वत और वृक्ष उखाड़कर [क्रोधसे] दाँत कटकटाकर दौड़े ॥ ६ ॥

छं०—धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा । अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा ॥ बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो । चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु व्याकुल कियो ॥

विकट और विकराल वानर-भालू हाथोंमें पर्वत लिये दौड़े। वे अत्यन्त क्रोध करके प्रहार करते हैं। उनके मारनेसे राक्षस भाग चले। बलवान् वानरोंने शत्रुकी सेनाको विचलित करके फिर रावणको घेर लिया। चारों ओरसे चपेटे मारकर और नखोंसे शरीर विदीर्णकर वानरोंने उसको व्याकुल कर दिया।

दो०—देखि महा मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार । अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार ॥ १०० ॥

वानरोंको बड़ा ही प्रबल देखकर रावणने विचार किया और अन्तर्धान होकर क्षणभरमें उसने माया फैलायी ॥ १०० ॥

छं०—जब कीन्ह तेहिं पाषंड । भए प्रगट जंतु प्रचंड । बेताल भूत पिसाच । कर धरें धनु नाराच ॥ १ ॥

जब उसने पाखण्ड (माया) रचा, तब भयङ्कर जीव प्रकट हो गये। बेताल, भूत और पिशाच हाथोंमें धनुष-बाण लिये प्रकट हुए! ॥ १ ॥

जोगिनि गहँ करबाल । एक हाथ मनुज कपाल । करि सद्य सोनित पान । नाचहिं करहिं बहु गान ॥ २ ॥

जोगिनियाँ एक हाथमें तलवार और दूसरे हाथमें मनुष्यकी खोपड़ी लिये ताजा खून पीकर नाचने और बहुत तरहके गीत गाने लगीं ॥ २ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८७७

धरु मारु बोलहिं घोर । रहि पूरि धुनि चहुँ ओर । मुख बाड़ धावहिं खान । तब लगे कीस परान ॥ ३ ॥

वे 'पकड़ो, मारो' आदि घोर शब्द बोल रही हैं। चारों ओर (सब दिशाओंमें) यह ध्वनि भर गयी। वे मुख फैलाकर खाने दौड़ती हैं। तब वानर भागने लगे ॥ ३ ॥

जहँ जाहिं मर्कट भागि । तहँ बरत देखहिं आगि । भाए बिकल बानर भालु । पुनि लाग बरघै बालु ॥ ४ ॥

वानर भागकर जहाँ भी जाते हैं, वहीं आग जलती देखते हैं। वानर-भालू व्याकुल हो गये। फिर रावण बालू बरसाने लगा ॥ ४ ॥

जहँ तहँ थकित करि कीस । गजेंउ बहुरि दससीस । लछिमन कपीस समेत । भाए सकल बीर अचेत ॥ ५ ॥

वानरोंको जहाँ-तहाँ थकित (शिथिल) कर रावण फिर गरजा। लक्ष्मणजी और सुग्रीवसहित सभी बीर अचेत हो गये ॥ ५ ॥

हा राम हा रघुनाथ । कहि सुभट मीजहिं हाथ । एहि बिधि सकल बल तोरि । तेहिं कीन्ह कपट बहोरि ॥ ६ ॥

हा राम! हा रघुनाथ! पुकारते हुए श्रेष्ठ योद्धा अपने हाथ मलते (पछताते) हैं। इस प्रकार सबका बल तोड़कर रावणने फिर दूसरी माया रची ॥ ६ ॥

प्रगटेसि बिपुल हनुमान । धाए गहे पाषान । तिन्ह रामु घैरे जाड़ । चहुँ दिसि बरुथ बनाड़ ॥ ७ ॥

उसने बहुत-से हनुमान् प्रकट किये, जो पत्थर लिये दौड़े। उन्होंने चारों ओर दल बनाकर श्रीरामचन्द्रजीको जा घेरा ॥ ७ ॥

मारहु धरहु जनि जाड़ । कटकटहिं पूँछ उठाड़ । दहँ दिसि लँगूर बिराज । तेहिं मध्य कोसलराज ॥ ८ ॥

वे पूँछ उठाकर कटकटाते हुए पुकारने लगे, 'मारो, पकड़ो, जाने न पावे।' उनके लँगूर (पूँछ) दसों दिशाओंमें शोभा दे रहे हैं और उनके बीचमें कोसलराज श्रीरामजी हैं ॥ ८ ॥

छं०—तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही । जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही ॥ प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी । रघुबीर एकहिं तीर कोपि निमेष महूँ माया हरी ॥

८७८

  • रामचरितमानस *

उनके बीचमें कोसलराजका सुन्दर श्याम शरीर ऐसी शोभा पा रहा है, मानो ऊँचे तमाल वृक्षके लिये अनेक इन्द्रधनुषोंकी श्रेष्ठ बाड़ (घेरा) बनायी गयी हो। प्रभुको देखकर देवता हर्ष और विषादयुक्त हृदयसे 'जय, जय, जय' ऐसा बोलने लगे। तब श्रीरघुवीरने क्रोध करके एक ही बाणसे निमेषमात्रमें रावणकी सारी माया हर ली॥ १ ॥

माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे । सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे ॥ श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं । सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं ॥

माया दूर हो जानेपर वानर-भालू हर्षित हुए और वृक्ष तथा पर्वत ले-लेकर सब लौट पड़े। श्रीरामजीने बाणोंके समूह छोड़े, जिनसे रावणके हाथ और सिर फिर कट-कटकर पृथ्वीपर गिर पड़े। श्रीरामजी और रावणके युद्धका चरित्र यदि सैकड़ों शेष, सरस्वती, वेद और कवि अनेक कल्पोंतक गाते रहें, तो भी वे उसका पार नहीं पा सकते॥ २ ॥

दो०—ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास।

जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास ॥ १०१ क ॥

उसी चरित्रके कुछ गुणगण मन्दबुद्धि तुलसीदासने कहे हैं, जैसे मक्खी भी अपने पुरुषार्थके अनुसार आकाशमें उड़ती है॥ १०१ (क) ॥

काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस।

प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि व्याकुल देखि कलेस ॥ १०१ ख ॥

सिर और भुजाएँ बहुत बार काटी गयीं। फिर भी वीर रावण मरता नहीं। प्रभु तो खेल कर रहे हैं; परन्तु मुनि, सिद्ध और देवता उस क्लेशको देखकर (प्रभुको क्लेश पाते समझकर) व्याकुल हैं॥ १०१ (ख) ॥

काटत बढ़हिं सीस समुदाई । जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकार्ई ॥

मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा । राम बिभीषन तन तब देखा ॥

काटते ही सिरोंका समूह बढ़ जाता है जैसे प्रत्येक लाभपर लोभ बढ़ता है। शत्रु मरता नहीं और परिश्रम बहुत हुआ। तब श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणकी ओर देखा॥ १ ॥

उमा काल मर जाकीं ईछा । सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा ॥

सुनु सरबग्य चराचर नायक । प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! जिसकी इच्छामात्रसे काल भी मर जाता है, वही प्रभु सेवककी प्रीतिकी परीक्षा ले रहे हैं। [विभीषणजीने कहा—] हे सर्वज्ञ! हे चराचरके स्वामी! हे शरणागतके पालन करनेवाले! हे देवता और मुनियोंको सुख देनेवाले! सुनिये—॥ २ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८७९

नाभिकुंड पियूष बस याकें । नाथ जितत रावनु बल ताकें ॥ सुनत बिभीषन बचन कृपाला । हरषि गहे कर बान कराला ॥

इसके नाभिकुण्डमें अमृतका निवास है। हे नाथ! रावण उसीके बलपर जीता है। विभीषणके वचन सुनते ही कृपालु श्रीरघुनाथजीने हर्षित होकर हाथमें विकराल बाण लिये ॥ ३ ॥

असुभ होन लागे तब नाना । रोवहिं खर सूकाल बहु स्वाना ॥ बोलहिं खग जग आरति हेतू । प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू ॥

उस समय नाना प्रकारके अशकुन होने लगे। बहुत-से गदहे, स्यार और कुत्ते रोने लगे। जगत्के दुःख (असुभ) को सूचित करनेके लिये पक्षी बोलने लगे। आकाशमें जहाँ-तहाँ केतु (पुच्छल तारे) प्रकट हो गये ॥ ४ ॥

दस दिसि दाह होन अति लागा । भयउ परब बिनु रबि उपरागा ॥ मन्दोदरि उर कंपति भारी । प्रतिमा स्वर्वाहिं नयन मग बारी ॥

दसों दिशाओंमें अत्यन्त दाह होने लगा (आग लगने लगी)। बिना ही पर्व (योग) के सूर्यग्रहण होने लगा। मन्दोदरीका हृदय बहुत काँपने लगा। मूर्तियाँ नेत्र-मार्गसे जल बहाने लगीं ॥ ५ ॥

छं०—प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही । बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही ॥ उतपात अमित बिलोकि नभ सुरबिकल बोलहिं जय जए । सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए ॥

मूर्तियाँ रोने लगीं, आकाशसे वज्रपात होने लगे, अत्यन्त प्रचण्ड वायु बहने लगी, पृथ्वी हिलने लगी, बादल रक्त, बाल और धूलकी वर्षा करने लगे। इस प्रकार इतने अधिक अमङ्गल होने लगे कि उनको कौन कह सकता है? अपरिमित उत्पात देखकर आकाशमें देवता व्याकुल होकर जय-जय पुकार उठे। देवताओंको भयभीत जानकर कृपालु श्रीरघुनाथजी धनुषपर बाण सन्धान करने लगे।

दो०—खैँचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस । रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस ॥ १०२ ॥

कानोंतक धनुषको खींचकर श्रीरघुनाथजीने इकतीस बाण छोड़े। वे श्रीरामचन्द्रजीके बाण ऐसे चले मानो कालसर्प हों ॥ १०२ ॥

सायक एक नाभि सर सोषा । अपर लगे भुज सिर करि रोषा ॥ तै सिर बाहु चले नाराचा । सिर भुज हीन रुंड महि नाचा ॥