श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 866, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
श्रीरामजीके वचन सुनकर वह खूब हँसा (और बोला—) मुझे ज्ञान सिखाते हो? उस समय वैर करते तो नहीं डरे, अब प्राण प्यारे लग रहे हैं ॥ १० ॥
कहि दुर्बचन कृद्ध दसकंधर । कुलिस समान लाग छाँड़ै सर ॥ नानाकार सिलीमुख धाए । दिसि अरु बिदिसि गगन महि छाए ॥
दुर्बचन कहकर रावण कृद्ध होकर वज्रके समान बाण छोड़ने लगा। अनेकों आकारके बाण दौड़े और दिशा, विदिशा तथा आकाश और पृथ्वीमें, सब जगह छा गये ॥ १ ॥
पावक सर छाँड़ेउ रघुबीरा । छन महुँ जरे निसाचर तीरा ॥ छाड़िसि तीब्र सक्ति खिसिआई । बान संग प्रभु फेरि चलाई ॥
श्रीरघुवीरने अग्निबाण छोड़ा, [जिससे] रावणके सब बाण क्षणभरमें भस्म हो गये। तब उसने खिसियाकर तीक्ष्ण शक्ति छोड़ी। [किन्तु] श्रीरामचन्द्रजीने उसको बाणके साथ वापस भेज दिया ॥ २ ॥
कोटिन्ह चक्र त्रिसूल पबारे । बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारे ॥ निफल होहिं रावन सर कैसें । खल के सकल मनोरथ जैसें ॥
वह करोड़ों चक्र और त्रिशूल चलाता है, परन्तु प्रभु उन्हें बिना ही परिश्रम काटकर हटा देते हैं। रावणके बाण किस प्रकार निष्फल होते हैं जैसे दुष्ट मनुष्यके सब मनोरथ ॥ ३ ॥
तब सत बान सारथी मारेसि । परेउ भूमि जय राम पुकारेसि ॥ राम कृपा करि सूत उठावा । तब प्रभु परम क्रोध कहूँ पावा ॥
तब उसने श्रीरामजीके सारथिको सौ बाण मारे। वह श्रीरामजीकी जय पुकारकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। श्रीरामजीने कृपा करके सारथिको उठाया। तब प्रभु अत्यन्त क्रोधको प्राप्त हुए ॥ ४ ॥
छं०—भए कृद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे । कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे ॥ मन्दोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे । चिवकरहिं दिगज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे ॥
युद्धमें शत्रुके विरुद्ध श्रीरघुनाथजी क्रोधित हुए, तब तरकसमें बाण कसमसाने लगे (बाहर निकलनेको आतुर होने लगे)। उनके धनुषका अत्यन्त प्रचण्ड शब्द (टङ्कार) सुनकर मनुष्यभक्षी सब राक्षस वातग्रस्त हो गये (अत्यन्त भयभीत हो गये)। मन्दोदरीका हृदय काँप उठा; समुद्र, कच्छप, पृथ्वी और पर्वत डर गये। दिशाओंके हाथी पृथ्वीको दाँतोसे पकड़कर चिघाड़ने लगे। यह कौतुक देखकर देवता हँसे।