श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 867, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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दो०—तानेउ चाप श्रवन लगि छोंड़े बिसिख कराल।
राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याल ॥ ११ ॥
धनुषको कानतक तानकर श्रीरामचन्द्रजीने भयानक बाण छोड़े। श्रीरामजीके बाणसमूह ऐसे चले मानो सर्प लहलहाते (लहराते) हुए जा रहे हों ॥ ११ ॥
चले बान सपच्छ जनु उरगा। प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा ॥
रथ बिभंजि हति केतु पताका। गर्जा अति अंतर बल थाका ॥
बाण ऐसे चले मानो पंखवाले सर्प उड़ रहे हों। उन्होंने पहले सारथि और घोड़ोंको मार डाला। फिर रथको चूर-चूर करके ध्वजा और पताकाओंको गिरा दिया। तब रावण बड़े जोरसे गरजा, पर भीतरसे उसका बल थक गया था ॥ ११ ॥
तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना। अस्त्र सस्त्र छोंड़ेसि बिधि नाना ॥
बिफल होहिं सब उद्यम ताके। जिमि परद्रोह निरत मनसा के ॥
तुरंत दूसरे रथपर चढ़कर खिसियाकर उसने नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र छोड़े। उसके सब उद्योग वैसे ही निष्फल हो रहे हैं जैसे परद्रोहमें लगे हुए चित्तवाले मनुष्यके होते हैं ॥ १२ ॥
तब रावन दस सूल चलावा। बाजि चारि महि मारि गिरावा ॥
तुरग उठाइ कोपि रघुनायक। खैँचि सरासन छोंड़े सायक ॥
तब रावणने दस त्रिशूल चलाये और श्रीरामजीके चारों घोड़ोंको मारकर पृथ्वीपर गिरा दिया। घोड़ोंको उठाकर श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके धनुष खींचकर बाण छोड़े ॥ १३ ॥
रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी ॥
दस दस बान भाल दस मारे। निसरि गए चले रुधिर पनारे ॥
रावणके सिररूपी कमलवनमें विचरण करनेवाले श्रीरघुवीरके बाणरूपी भ्रमरोंकी पंक्ति चली। श्रीरामचन्द्रजीने उसके दसों सिरोंमें दस-दस बाण मारे, जो आर-पार हो गये और सिरोंसे रक्तके पनाले बह चले ॥ १४ ॥
स्वत रुधिर धायउ बलवाना। प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना ॥
तीस तीर रघुबीर पबारे। भुजन्हि समेत सीस महि पारे ॥
रुधिर बहते हुए ही बलवान् रावण दौड़ा। प्रभुने फिर धनुषपर बाण सन्धान किया। श्रीरघुवीरने तीस बाण मारे और बीसों भुजाओंसमेत दसों सिर काटकर पृथ्वीपर गिरा दिये ॥ १५ ॥
काटतहीं पुनि भए नबीने। राम बहोरि भुजा सिर छीने ॥
प्रभु बहु बार बाहु सिर हए। कटत झटिति पुनि नूतन भए ॥