श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 868, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें८६६
- रामचरितमानस *
[सिर और हाथ] काटते ही फिर नये हो गये। श्रीरामजीने फिर भुजाओं और सिरोंको काट गिराया। इस तरह प्रभुने बहुत बार भुजाएँ और सिर काटे। परन्तु काटते ही वे तुरन्त फिर नये हो गये ॥ ६ ॥
पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा । अति कौतुकी कोसलाधीसा ॥ रहे छाड़ नभ सिर अरु बाहु । मानहुँ अमित केतु अरु राहु ॥
प्रभु बार-बार उसकी भुजा और सिरोंको काट रहे हैं; क्योंकि कोसलपति श्रीरामजी बड़े कौतुकी हैं। आकाशमें सिर और बाहु ऐसे छा गये हैं, मानो असंख्य केतु और राहु हों ॥ ७ ॥
छं०—जनु राहु केतु अनेक नभ पथ स्वत सोनित थावहीं । रघुवीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरन न पावहीं ॥ एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं । जनु कोपि दिनकर कर निकर जहँ तहँ बिधंतुद पोहहीं ॥
मानो अनेकों राहु और केतु रुधिर बहाते हुए आकाशमार्गसे दौड़ रहे हों। श्रीरघुवीरके प्रचण्ड बाणोंके [बार-बार] लगनेसे वे पृथ्वीपर गिरने नहीं पाते। एक-एक बाणसे समूह-के-समूह सिर छिदे हुए आकाशमें उड़ते ऐसे शोभा दे रहे हैं मानो सूर्यकी किरणें क्रोध करके जहाँ-तहाँ राहुओंको पिरों रही हों।
दो०—जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार । सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार ॥ १२ ॥
जैसे-जैसे प्रभु उसके सिरोंको काटते हैं, वैसे-ही-वैसे वे अपार होते जाते हैं। जैसे विषयोंका सेवन करनेसे काम (उन्हें भोगनेकी इच्छा) दिन-प्रति-दिन नया-नया बढ़ता जाता है ॥ १२ ॥
दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी । बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी ॥ गर्जैउ मूढ़ महा अभिमानी । धायउ दसहु सरासन तानी ॥
सिरोंकी बाढ़ देखकर रावणको अपना मरण भूल गया और बड़ा गहरा क्रोध हुआ। वह महान् अभिमानी मूर्ख गरजा और दसों धनुषोंको तानकर दौड़ा ॥ १ ॥
समर भूमि दसकंधर कोप्यो । बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो ॥ दंड एक रथ देखि न परेऊ । जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ ॥
रणभूमिमें रावणने क्रोध किया और बाण बरसाकर श्रीरघुनाथजीके रथको ढक दिया। एक दण्ड (घड़ी) तक रथ दिखलायी न पड़ा, मानो कुहरेमें सूर्य छिप गया हो ॥ २ ॥