श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 871, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
८६१
ठाढ़ रहा अति कंपित गाता । गयड बिभीषनु जहँ जनत्राता ॥ पुनि रावन कपि हतेउ पचारी । चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी ॥
रावण खड़ा रहा, पर उसका शरीर अत्यन्त काँपने लगा। विभीषण वहाँ गये जहाँ सेवकोंके रक्षक श्रीरामजी थे। फिर रावणने ललकारकर हनुमान्जीको मारा। वे पूँछ फैलाकर आकाशमें चले गये ॥ २ ॥
गहिंसि पूँछ कपि सहित उड़ाना । पुनि फिरि भिरेउ प्रबल हनुमाना ॥ लरत अकास जुगल सम जोधा । एकहि एकु हनत करि क्रोधा ॥
रावणने पूँछ पकड़ ली, हनुमान्जी उसको साथ लिये हुए ऊपर उड़े। फिर लौटकर महाबलवान् हनुमान्जी उससे भिड़ गये। दोनों समान योद्धा आकाशमें लड़ते हुए एक-दूसरेको क्रोध करके मारने लगे ॥ ३ ॥
सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं । कज्जलगिरि सुमेरु जनु लरहीं ॥ बुधि बल निसिचर परड़ न पार्यो । तब मारुतसुत प्रभु संभार्यो ॥
दोनों बहुत-से छल-बल करते हुए आकाशमें ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो कज्जलगिरि और सुमेरु पर्वत लड़ रहे हों। जब बुद्धि और बलसे राक्षस गिराये न गिरा तब मारुति श्रीहनुमान्जीने प्रभुको स्मरण किया ॥ ४ ॥
छं०—संभारि श्रीरघुवीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो । महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहँ जय जय भन्यो ॥ हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले । रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले ॥
श्रीरघुवीरका स्मरण करके धीर हनुमान्जीने ललकारकर रावणको मारा। वे दोनों पृथ्वीपर गिरते और फिर उठकर लड़ते हैं; देवताओंने दोनोंकी 'जय-जय' पुकारी। हनुमान्जीपर सङ्कट देखकर वानर-भालू क्रोधातुर होकर दौड़े। किन्तु रण-मद-माते रावणने सब योद्धाओंको अपने प्रचण्ड भुजाओंके बलसे कुचल और मसल डाला।
दो०—तब रघुवीर पचारि धाए कीस प्रचंड । कपि बल प्रबल देखि तेहिं कीन्ह प्रगट पाषंड ॥ १५ ॥
तब श्रीरघुवीरके ललकारनेपर प्रचण्ड वीर वानर दौड़े। वानरोंके प्रबल दलको देखकर रावणने माया प्रकट की ॥ १५ ॥
अंतरधान भयउ छन एका । पुनि प्रगटे खल रूप अनेका ॥ रघुपति कटक भालु कपि जेते । जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते ॥