श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 870, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
शक्ति लगनेसे उन्हें कुछ मूर्च्छा हो गयी। प्रभुने तो यह लीला की, पर देवताओंको व्याकुलता हुई। प्रभुको श्रम (शारीरिक कष्ट) प्राप्त हुआ देखकर विभीषण क्रोधित हो हाथमें गदा लेकर दौड़े ॥ २ ॥
रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे । तैं सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे ॥ सादर सिव कहूँ सीस चढ़ाए । एक एक के कोटिन्ह पाए ॥
[और बोले—] अरे अभागे! मूर्ख, नीच, दुर्बुद्धि! तूने देवता, मनुष्य, मुनि, नाग सभीसे विरोध किया। तूने आदरसहित शिवजीको सिर चढ़ाये। इसीसे एक-एकके बदलेमें करोड़ों पाये ॥ ३ ॥
तेहि कारन खल अब लंगि बाँच्यो । अब तव कालु सीस पर नाच्यो ॥ राम बिमुख सठ चहसि संपदा । अस कहि हनेसि माझ उर गदा ॥
उसी कारणसे अरे दुष्ट! तू अबतक बचा है। [किन्तु] अब काल तेरे सिरपर नाच रहा है। अरे मूर्ख! तू रामविमुख होकर सम्पत्ति (सुख) चाहता है? ऐसा कहकर विभीषणने रावणकी छातीके बीचो-बीच गदा मारी ॥ ४ ॥
छं०—उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पख्यो । दस बदन सोनित स्वत पुनि संभारि धायो रिस भख्यो ॥ द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै । रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहूँ गनै ॥
बीच छातीमें कठोर गदाकी घोर और कठिन चोट लगते ही वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके दसों मुखोंसे रुधिर बहने लगा; वह अपनेको फिर सँभालकर क्रोधमें भरा हुआ दौड़ा। दोनों अत्यन्त बलवान् योद्धा भिड़ गये और मल्लयुद्धमें एक दूसरेके विरुद्ध होकर मारने लगे। श्रीरघुवीरके बलसे गर्वित विभीषण उसको (रावण-जैसे जगद्विजयी योद्धाको) पासंगके बराबर भी नहीं समझते।
दो०—उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ । सो अब भिरत काल ज्यों श्रीरघुबीर प्रभाउ ॥ १४ ॥
[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! विभीषण क्या कभी रावणके सामने आँख उठाकर भी देख सकता था? परन्तु अब वही कालके समान उससे भिड़ रहा है। यह श्रीरघुवीरका ही प्रभाव है ॥ १४ ॥
देखा श्रमित बिभीषनु भारी । धायउ हनूमान गिरि धारी ॥ रथ तुरंग सारथी निपाता । हृदय माझ तेहि मारेसि लाता ॥
विभीषणको बहुत ही थका हुआ देखकर हनुमान्जी पर्वत धारण किये हुए दौड़े। उन्होंने उस पर्वतसे रावणके रथ, घोड़े और सारथिका संहार कर डाला और उसके सीनेपर लात मारी ॥ १ ॥