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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 875, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 875
  • लङ्काकाण्ड *

८७३

तब उसने क्रोध करके उछलकर दोनोंको पकड़ लिया। पृथ्वीपर पटकते समय वे उसकी भुजाओंको मरोड़कर भाग छूटे। उसने क्रोध करके हाथोंमें दसों धनुष लिये और वानरोंको बाणोंसे मारकर घायल कर दिया ॥ ५ ॥

हनुमदादि मुरुछित करि बंदर । पाड़ प्रदोष हरष दसकंधर ॥ मुरुछित देखि सकल कपि बीरा । जामवंत धायउ रनधीरा ॥

हनुमान्जी आदि सब वानरोंको मूर्च्छित करके और सन्ध्याका समय पाकर रावण हर्षित हुआ। समस्त वानर-वीरोंको मूर्च्छित देखकर रणधीर जाम्बवान् दौड़े ॥ ६ ॥

संग भालु भूधर तरु धारी । मारन लगे पचारि पचारी ॥ भयउ क्रुब्ध रावन बलवाना । गहि पद महि पटकड़ भट नाना ॥

जाम्बवान्के साथ जो भालू थे, वे पर्वत और वृक्ष धारण किये रावणको ललकार-ललकारकर मारने लगे। बलवान् रावण क्रोधित हुआ और पैर पकड़-पकड़कर वह अनेकों योद्धाओंको पृथ्वीपर पटकने लगा ॥ ७ ॥

देखि भालुपति निज दल घाता । कोपि माझ उर मारेसि लाता ॥

जाम्बवान्ने अपने दलका विध्वंस देखकर क्रोध करके रावणकी छातीमें लात मारी ॥ ८ ॥

छं०—उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा ।

गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा ॥

मुरुछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयो ।

निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतनु करत भयो ॥

छातीमें लातका प्रचण्ड आघात लगते ही रावण व्याकुल होकर रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसने बीसों हाथोंमें भालुओंको पकड़ रखा था। [ऐसा जान पड़ता था] मानो रात्रिके समय भौर कमलोंमें बसे हुए हों। उसे मूर्च्छित देखकर, फिर लात मारकर ऋक्षराज जाम्बवान् प्रभुके पास चले गये। रात्रि जानकर सारथि रावणको रथमें डालकर उसे होशमें लानेका उपाय करने लगा।

दो०—मुरुछा बिगत भालु कपि सब आए प्रभु पास ।

निसिचर सकल रावनहि घेरि रहे अति त्रास ॥ १८ ॥

मूर्च्छा दूर होनेपर सब रीछ-वानर प्रभुके पास आये। उधर सब राक्षसोंने बहुत ही भयभीत होकर रावणको घेर लिया ॥ १८ ॥

मासपारायण, छब्बीसवाँ विश्राम

तेही निसि सीता पहिं जाई । त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई ॥

सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी । सीता उर भड़ त्रास घनेरी ॥