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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 876, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 876

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  • रामचरितमानस *

उसी रात त्रिजटाने सीताजीके पास जाकर उन्हें सब कथा कह सुनायी। शत्रुके सिर और भुजाओंकी बढ़तीका संवाद सुनकर सीताजीके हृदयमें बड़ा भय हुआ ॥ १ ॥

मुख मलीन उपजी मन चिंता । त्रिजटा सन बोली तब सीता ॥ होइहि कहा कहसि किन माता । केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता ॥

[उनका] मुख उदास हो गया, मनमें चिन्ता उत्पन्न हो गयी। तब सीताजी त्रिजटासे बोली—हे माता! बताती क्यों नहीं? क्या होगा? सम्पूर्ण विश्वको दुःख देनेवाला यह किस प्रकार मरेगा? ॥ २ ॥

रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई । बिधि बिपरीत चरित सब करई ॥ मोर अभाग्य जिआवत ओही । जेहिँ हौँ हरि पद कमल बिछोही ॥

श्रीरघुनाथजीके बाणोंसे सिर कटनेपर भी नहीं मरता। विधाता सारे चरित्र विपरीत (उलटे) ही कर रहा है। [सच बात तो यह है कि] मेरा दुर्भाग्य ही उसे जिला रहा है, जिसने मुझे भगवान् के चरण-कमलोंसे अलग कर दिया है ॥ ३ ॥

जेहिँ कृत कपट कनक मृग झूठा । अजहुँ सो दैव मोहि पर रूठा ॥ जेहिँ बिधि मोहि दुख दुसह सहाए । लछिमन कहुँ कटु बचन कहाए ॥

जिसने कपटका झूठा स्वर्णमृग बनाया था, वही दैव अब भी मुझपर रूठा हुआ है। जिस विधाताने मुझसे दुःसह दुःख सहन कराये और लक्ष्मणको कटुवे वचन कहलाये, ॥ ४ ॥

रघुपति विरह सबिष सर भारी । तकि तकि मार बार बहु मारी ॥ ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना । सोड़ बिधि ताहि जिआव न आना ॥

जो श्रीरघुनाथजीके विरहरूपी बड़े विपैले बाणोंसे तक-तककर मुझे बहुत बार मारकर, अब भी मार रहा है और ऐसे दुःखमें भी जो मेरे प्राणोंको रख रहा है, वही विधाता उस (रावण) को जिला रहा है, दूसरा कोई नहीं ॥ ५ ॥

बहु बिधि कर बिलाप जानकी । करि करि सुरति कृपानिधान की ॥ कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी । उर सर लागत मरइ सुरारी ॥

कृपानिधान श्रीरामजीकी याद कर-करके जानकीजी बहुत प्रकारसे विलाप कर रही हैं। त्रिजटाने कहा—हे राजकुमारी! सुनो, देवताओंका शत्रु रावण हृदयमें बाण लगते ही मर जायगा ॥ ६ ॥

प्रभु ताते उर हतइ न तेही । एहि के हृदयँ बसति बैदेही ॥

परन्तु प्रभु उसके हृदयमें बाण इसलिये नहीं मारते कि इसके हृदयमें जानकीजी (आप) बसती हैं ॥ ७ ॥