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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 879, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 879
  • लङ्काकाण्ड *

८७७

धरु मारु बोलहिं घोर । रहि पूरि धुनि चहुँ ओर । मुख बाड़ धावहिं खान । तब लगे कीस परान ॥ ३ ॥

वे 'पकड़ो, मारो' आदि घोर शब्द बोल रही हैं। चारों ओर (सब दिशाओंमें) यह ध्वनि भर गयी। वे मुख फैलाकर खाने दौड़ती हैं। तब वानर भागने लगे ॥ ३ ॥

जहँ जाहिं मर्कट भागि । तहँ बरत देखहिं आगि । भाए बिकल बानर भालु । पुनि लाग बरघै बालु ॥ ४ ॥

वानर भागकर जहाँ भी जाते हैं, वहीं आग जलती देखते हैं। वानर-भालू व्याकुल हो गये। फिर रावण बालू बरसाने लगा ॥ ४ ॥

जहँ तहँ थकित करि कीस । गजेंउ बहुरि दससीस । लछिमन कपीस समेत । भाए सकल बीर अचेत ॥ ५ ॥

वानरोंको जहाँ-तहाँ थकित (शिथिल) कर रावण फिर गरजा। लक्ष्मणजी और सुग्रीवसहित सभी बीर अचेत हो गये ॥ ५ ॥

हा राम हा रघुनाथ । कहि सुभट मीजहिं हाथ । एहि बिधि सकल बल तोरि । तेहिं कीन्ह कपट बहोरि ॥ ६ ॥

हा राम! हा रघुनाथ! पुकारते हुए श्रेष्ठ योद्धा अपने हाथ मलते (पछताते) हैं। इस प्रकार सबका बल तोड़कर रावणने फिर दूसरी माया रची ॥ ६ ॥

प्रगटेसि बिपुल हनुमान । धाए गहे पाषान । तिन्ह रामु घैरे जाड़ । चहुँ दिसि बरुथ बनाड़ ॥ ७ ॥

उसने बहुत-से हनुमान् प्रकट किये, जो पत्थर लिये दौड़े। उन्होंने चारों ओर दल बनाकर श्रीरामचन्द्रजीको जा घेरा ॥ ७ ॥

मारहु धरहु जनि जाड़ । कटकटहिं पूँछ उठाड़ । दहँ दिसि लँगूर बिराज । तेहिं मध्य कोसलराज ॥ ८ ॥

वे पूँछ उठाकर कटकटाते हुए पुकारने लगे, 'मारो, पकड़ो, जाने न पावे।' उनके लँगूर (पूँछ) दसों दिशाओंमें शोभा दे रहे हैं और उनके बीचमें कोसलराज श्रीरामजी हैं ॥ ८ ॥

छं०—तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही । जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही ॥ प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी । रघुबीर एकहिं तीर कोपि निमेष महूँ माया हरी ॥