श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 878, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
यहाँ आधी रातको रावण [मूच्छीसे] जगा और अपने सारथिपर रुष्ट होकर कहने लगा—अरे मूर्ख! तूने मुझे रणभूमिसे अलग कर दिया। अरे अधम! अरे मन्दबुद्धि! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है! ॥ ४ ॥ तेहिं पद गहि बहु बिधि समुद्गावा । भोरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा ॥ सुनि आगवनु दसानन केरा । कपि दल खरभर भयउ घनेरा ॥
सारथिने चरण पकड़कर रावणको बहुत प्रकारसे समझाया। सबेरा होते ही वह रथपर चढ़कर फिर दौड़ा। रावणका आना सुनकर वानरोंकी सेनामें बड़ी खलबली मच गयी ॥ ५ ॥
जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी । धाए कटकटाइ भट भारी ॥
वे भारी योद्धा जहाँ-तहाँसे पर्वत और वृक्ष उखाड़कर [क्रोधसे] दाँत कटकटाकर दौड़े ॥ ६ ॥
छं०—धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा । अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा ॥ बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो । चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु व्याकुल कियो ॥
विकट और विकराल वानर-भालू हाथोंमें पर्वत लिये दौड़े। वे अत्यन्त क्रोध करके प्रहार करते हैं। उनके मारनेसे राक्षस भाग चले। बलवान् वानरोंने शत्रुकी सेनाको विचलित करके फिर रावणको घेर लिया। चारों ओरसे चपेटे मारकर और नखोंसे शरीर विदीर्णकर वानरोंने उसको व्याकुल कर दिया।
दो०—देखि महा मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार । अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार ॥ १०० ॥
वानरोंको बड़ा ही प्रबल देखकर रावणने विचार किया और अन्तर्धान होकर क्षणभरमें उसने माया फैलायी ॥ १०० ॥
छं०—जब कीन्ह तेहिं पाषंड । भए प्रगट जंतु प्रचंड । बेताल भूत पिसाच । कर धरें धनु नाराच ॥ १ ॥
जब उसने पाखण्ड (माया) रचा, तब भयङ्कर जीव प्रकट हो गये। बेताल, भूत और पिशाच हाथोंमें धनुष-बाण लिये प्रकट हुए! ॥ १ ॥
जोगिनि गहँ करबाल । एक हाथ मनुज कपाल । करि सद्य सोनित पान । नाचहिं करहिं बहु गान ॥ २ ॥
जोगिनियाँ एक हाथमें तलवार और दूसरे हाथमें मनुष्यकी खोपड़ी लिये ताजा खून पीकर नाचने और बहुत तरहके गीत गाने लगीं ॥ २ ॥