श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 858, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें८५६
- रामचरितमानस *
अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो । देखि दसानन बिसमय पायो ॥ कह रघुबीर समुझु जियैँ भ्राता । तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता ॥
ऐसा कहकर और लक्ष्मणजीको उठाकर हनुमान्जी श्रीरघुनाथजीके पास ले आये। यह देखकर रावणको आश्चर्य हुआ। श्रीरघुवीरने [लक्ष्मणजीसे] कहा—हे भाई! हृदयमें समझो, तुम कालके भी भक्षक और देवताओंके रक्षक हो ॥ ३ ॥
सुनत बचन उठि बैठ कृपाला । गई गगन सो सकति कराला ॥ पुनि कोदंड बान गहि धाए । रिपु सन्मुख अति आतुर आए ॥
ये वचन सुनते ही कृपालु लक्ष्मणजी उठ बैठे। वह कराल शक्ति आकाशको चली गयी। लक्ष्मणजी फिर धनुष-बाण लेकर दौड़े और बड़ी शीघ्रतासे शत्रुके सामने आ पहुँचे ॥ ४ ॥
छं०— आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति व्याकुल कियो । गिर्यो धरनि दसकंधर बिकलतर बान सत बेध्यो हियो ॥ सारथी दूसर घालि रथ तेहि तुरत लंका लै गयो । रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरि प्रभु चरनन्हि नयो ॥
फिर उन्होंने बड़ी ही शीघ्रतासे रावणके रथको चूर-चूरकर और सारथिको मारकर उसे (रावणको) व्याकुल कर दिया। सौ बाणोंसे उसका हृदय बेध दिया, जिससे रावण अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। तब दूसरा सारथि उसे रथमें डालकर तुरंत ही लंकाको ले गया। प्रतापके समूह श्रीरघुवीरके भाई लक्ष्मणजीने फिर आकर प्रभुके चरणोंमें प्रणाम किया।
दो०— उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य । राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य ॥ ८४ ॥
वहाँ (लंकामें) रावण मूर्च्छासे जागकर कुछ यज्ञ करने लगा। वह मूर्ख और अत्यन्त अज्ञानी हठवश श्रीरघुनाथजीसे विरोध करके विजय चाहता है ॥ ८४ ॥
इहाँ विभीषण सब सुधि पाई । सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई ॥ नाथ करइ रावन एक जागा । सिद्ध भएँ नहिं मरिहि अभागा ॥
यहाँ विभीषणजीने सब खबर पायी और तुरंत जाकर श्रीरघुनाथजीको कह सुनायी कि हे नाथ! रावण एक यज्ञ कर रहा है। उसके सिद्ध होनेपर वह अभागा सहज ही नहीं मरेगा ॥ १ ॥