श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 857, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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पुनि सत सर मारा उर माहीं। परेउ धरनि तल सुधि कछु नाहीं॥ उठा प्रबल पुनि मुरुछा जागी। छाड़िसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी॥
फिर सौ बाण उसकी छातीमें मारे। वह पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसे कुछ भी होश न रहा। फिर मूर्च्छा छूटनेपर वह प्रबल रावण उठा और उसने वह शक्ति चलायी जो ब्रह्माजीने उसे दी थी॥ ४ ॥
छं०—सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही। पर्यो बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही॥ ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी। तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी॥
वह ब्रह्माकी दी हुई प्रचण्ड शक्ति लक्ष्मणजीकी ठीक छातीमें लगी। वीर लक्ष्मणजी व्याकुल होकर गिर पड़े। तब रावण उन्हें उठाने लगा, पर उसके अतुलित बलकी महिमा यों ही रह गयी (व्यर्थ हो गयी, वह उन्हें उठा न सका)। जिनके एक ही सिरपर ब्रह्माण्डरूपी भवन धूलके एक कणके समान विराजता है, उन्हें मूर्ख रावण उठाना चाहता है! वह तीनों भुवनोंके स्वामी लक्ष्मणजीको नहीं जानता।
दो०—देखि पवनसुत धायउ बोलत बचन कठोर। आवत कपिहि हन्यो तेहिं मुष्टि प्रहार प्रघोर॥ ८३ ॥
यह देखकर पवनपुत्र हनुमान्जी कठोर वचन बोलते हुए दौड़े। हनुमान्जीके आते ही रावणने उनपर अत्यन्त भयङ्कर घूँसेका प्रहार किया॥ ८३ ॥
जानु टेकि कपि भूमि न गिरा। उठा सँभारि बहुत रिस भरा॥ मुठिका एक ताहि कपि मारा। परेउ सैल जनु बज्र प्रहारा॥
हनुमान्जी घुटने टेककर रह गये, पृथ्वीपर गिरे नहीं। और फिर क्रोधसे भरे हुए सँभालकर उठे। हनुमान्जीने रावणको एक घूँसा मारा। वह ऐसा गिर पड़ा जैसे वज्रकी मारसे पर्वत गिरा हो॥ १ ॥
मुरुछा गै बहोरि सो जागा। कपि बल बिपुल सराहन लागा॥ धिग धिग मम पौरुष धिग मोही। जौँ तैं जितत रहेसि सुरद्वोही॥
मूर्च्छा भंग होनेपर फिर वह जगा और हनुमान्जीके बड़े भारी बलको सराहने लगा। [हनुमान्जीने कहा—] मेरे पौरुषको धिक्कार है, धिक्कार है और मुझे भी धिक्कार है, जो हे देवद्वोही! तू अब भी जीता रह गया॥ २ ॥