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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 837, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 837
  • लङ्काकाण्ड *

८३५

तब हनुमान्जीने उसे एक घूँसा मारा; जिससे वह व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और सिर पीटने लगा। फिर उसने उठकर हनुमान्जीको मारा! वे चक्कर खाकर तुरंत ही पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४ ॥

पुनि नल नीलहि अवनि पछोरसि । जहँ तहँ पटक पटक भट डोरसि ॥ चली बलीमुख सेन पराई । अति भय त्रसित न कोउ समुहाई ॥

फिर उसने नल-नीलको पृथ्वीपर पछाड़ दिया और दूसरे योद्धाओंको भी जहाँ-तहाँ पटक-पटककर डाल दिया। वानरसेना भाग चली। सब अत्यन्त भयभीत हो गये, कोई सामने नहीं आता ॥ ५ ॥

दो०—अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव । काँख दाबि कपिराज कहँ चला अमित बल सीव ॥ ६५ ॥

सुग्रीवसमेत अंगदादि वानरोंको मूर्च्छित करके फिर वह अपरिमित बलकी सीमा कुम्भकर्ण वानरराज सुग्रीवको काँखमें दाबकर चला ॥ ६५ ॥

उमा करत रघुपति नरलीला । खेल गुरुड़ जिमि अहिगन मीला ॥ भूकृटि भंग जो कालहि खाई । ताहि कि सोहड़ ऐसि लराई ॥

(शिवजी कहते हैं—) हे उमा! श्रीरघुनाथजी वैसे ही नरलीला कर रहे हैं जैसे गुरुड़ सर्पोंके समूहमें मिलकर खेलता हो। जो भीहके इशारेमात्रसे (बिना परिश्रमके) कालको भी खा जाता है, उसे कहीं ऐसी लड़ाई शोभा देती है ? ॥ १ ॥

जग पावनि कीरति बिस्तरिहँहि । गाड़ गाड़ भवनधि नर तरिहँहि ॥ मुरुछा गड़ मारुतसुत जागा । सुग्रीवहि तब खोजन लागा ॥

भगवान् [इसके द्वारा] जगत्को पवित्र करनेवाली वह कीर्ति फैलायेंगे जिसे गा-गाकर मनुष्य भवसागरसे तर जायेंगे। मूर्च्छा जाती रही, तब मारुति हनुमान्जी जागे और फिर वे सुग्रीवको खोजने लगे ॥ २ ॥

सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती । निबुकि गयउ तेहि मृतक प्रतीती ॥ काटेसि दसन नासिका काना । गरजि अकास चलेउ तेहि जाना ॥

सुग्रीवकी भी मूर्च्छा दूर हुई, तब वे [मुर्दे-से होकर] खिसक गये (काँखसे नीचे गिर पड़े)। कुम्भकर्णने उनको मृतक जाना। उन्होंने कुम्भकर्णके नाक-कान दाँतोंसे काट लिये और फिर गरजकर आकाशकी ओर चले, तब कुम्भकर्णने जाना ॥ ३ ॥

गहेउ चरन गहि भूमि पछारा । अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा ॥ पुनि आयउ प्रभु पहँ बलवाना । जयति जयति जय कृपानिधाना ॥

उसने सुग्रीवका पैर पकड़कर उनको पृथ्वीपर पछाड़ दिया। फिर सुग्रीवने बड़ी फुर्तीसे उठकर उसको मारा। और तब बलवान् सुग्रीव प्रभुके पास आये और बोले—कृपानिधान प्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो ॥ ४ ॥