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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 836, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 836

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  • रामचरितमानस *

सुनु सुत भयउ कालबस रावन । सो कि मान अब परम सिखावन ॥ धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन । भयहु तात निसिचर कुल भूषन ॥

[कुम्भकर्णने कहा—] हे पुत्र! सुन, रावण तो कालके वश हो गया है (उसके सिरपर मृत्यु नाच रही है)। वह क्या अब उत्तम शिक्षा मान सकता है? हे विभीषण! तू धन्य है, धन्य है, धन्य है। हे तात! तू राक्षसकुलका भूषण हो गया ॥४॥

बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर । भजेहु राम सोभा सुख सागर ॥

हे भाई! तूने अपने कुलको देदीप्यमान कर दिया, जो शोभा और सुखके समुद्र श्रीरामजीको भजा ॥५॥

दो०—बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर ।

जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर ॥६४॥

मन, वचन और कर्मसे कपट छोड़कर रणधीर श्रीरामजीका भजन करना। हे भाई! मैं काल (मृत्यु)-के वश हो गया हूँ, मुझे अपना-पराया नहीं सूझता; इसलिये अब तुम जाओ ॥६४॥

बंधु बचन सुनि चला बिभीषन । आयउ जहैं त्रैलोक बिभूषन ॥

नाथ भूधराकार सरीरा । कुंभकरन आवत रनधीरा ॥

भाईके वचन सुनकर विभीषण लौट गये और वहाँ आये जहाँ त्रिलोकीके भूषण श्रीरामजी थे। [विभीषणने कहा—] हे नाथ! पर्वतके समान [विशाल] देहवाला रणधीर कुम्भकर्ण आ रहा है ॥१॥

एतना कपिन्ह सुना जब काना । किलकिलाइ धाए बलवाना ॥

लिए उठाइ बिटप अरु भूधर । कटकटाइ डारहिं ता ऊपर ॥

वानरोंने जब कानोंसे इतना सुना, तब वे बलवान् किलकिलाकर (हर्षध्वनि करके) दौड़े। वृक्ष और पर्वत [उखाड़कर] उठा लिये और [क्रोधसे] दाँत कटकटाकर उन्हें उसके ऊपर डालने लगे ॥२॥

कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा । करहिं भालु कपि एक एक बारा ॥

मुर्यो न मनु तनु टर्यो न टार्यो । जिमि गज अर्क फलनि को मार्यो ॥

रीछ-वानर एक-एक बारमें ही करोड़ों पहाड़ोंके शिखरोंसे उसपर प्रहार करते हैं; परन्तु इससे न तो उसका मन ही मुड़ा (विचलित हुआ) और न शरीर ही टाले टला, जैसे मदारके फलोंकी मारसे हाथीपर कुछ भी असर नहीं होता! ॥३॥

तब मारुतसुत मुठिका हन्यो । पर्यो धरनि व्याकुल सिर धुन्यो ॥

पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता । घुर्मित भूतल परेउ तुरंता ॥