श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 835, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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कीन्हेहु प्रभु विरोध तेहि देवक । सिव बिरंचि सुर जाके सेवक ॥ नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा । कहतेउँ तोहि समय निरबहा ॥
हे स्वामी! तुमने उस परम देवताका विरोध किया, जिसके शिव, ब्रह्मा आदि देवता सेवक हैं। नारद मुनिने मुझे जो ज्ञान कहा था, वह मैं तुझसे कहता; पर अब तो समय जाता रहा ॥ ३ ॥
अब भरि अंक भेटु मोहि भाई । लोचन सुफल करौं मैं जाई ॥ स्याम गात सरसीरुह लोचन । देखौं जाइ ताप त्रय मोचन ॥
हे भाई! अब तो [अन्तिम बार] अँकवार भरकर मुझसे मिल ले। मैं जाकर अपने नेत्र सफल करूँ। तीनों तापोंको छुड़ानेवाले श्यामशरीर, कमलनेत्र श्रीरामजीके जाकर दर्शन करूँ ॥ ४ ॥
दो०— राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक । रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक ॥ ६३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके रूप और गुणोंको स्मरण करके वह एक क्षणके लिये प्रेममें मग्न हो गया। फिर रावणने करोड़ों घड़े मदिरा और अनेकों भैंसे मँगावाये ॥ ६३ ॥
महिष खाइ करि मदिरा पाना । गर्जा बज्राघात समाना ॥ कुंभकरण दुर्मद रन रंगा । चला दुर्ग तजि सेन न संगा ॥
भैंसे खाकर और मदिरा पीकर वह वज्राघात (बिजली गिरने) के समान गरजा। मदसे चूर, रणके उत्साहसे पूर्ण कुम्भकर्ण किला छोड़कर चला। सेना भी साथ नहीं ली ॥ १ ॥
देखि बिभीषनु आगें आयउ । परेउ चरन निज नाम सुनायउ ॥ अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो । रघुपति भक्त जानि मन भायो ॥
उसे देखकर विभीषण आगे आये और उसके चरणोंपर गिरकर अपना नाम सुनाया। छोटे भाईको उठाकर उसने हृदयसे लगा लिया और श्रीरघुनाथजीका भक्त जानकर वे उसके मनको प्रिय लगे ॥ २ ॥
तात लात रावन मोहि मारा । कहत परम हित मंत्र बिचारा ॥ तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ । देखि दीन प्रभु के मन भायउँ ॥
[विभीषणने कहा—] हे तात! परम हितकर सलाह एवं विचार कहनेपर रावणने मुझे लात मारी। उसी ग्लानिके मारे मैं श्रीरघुनाथजीके पास चला आया। दीन देखकर प्रभुके मनको मैं [बहुत] प्रिय लगा ॥ ३ ॥