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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 821, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 821
  • लङ्काकाण्ड *

८११

माल्यवंत अति जरठ निसाचर । रावन मातु पिता मंत्री बर॥ बोला बचन नीति अति पावन । सुनहु तात कछु मोर सिखावन॥

माल्यवंत [नामका एक] अत्यन्त बूढ़ा राक्षस था। वह रावणकी माताका पिता (अर्थात् उसका नाना) और श्रेष्ठ मन्त्री था। वह अत्यन्त पवित्र नीतिके वचन बोला—हे तात! कुछ मेरी सीख भी सुनो—॥ ३ ॥

जब ते तुम्ह सीता हरि आनी । असगुन होहिं न जाहिं बखानी॥ बेद पुरान जासु जसु गायो । राम बिमुख काहुँ न सुख पायो॥

जबसे तुम सीताको हर लाये हो, तबसे इतने अपशकुन हो रहे हैं कि जो वर्णन नहीं किये जा सकते। वेद-पुराणोंने जिनका यश गाया है, उन श्रीरामसे विमुख होकर किसीने सुख नहीं पाया॥ ४ ॥

दो०—हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान ।

जेहिं मारे सोड़ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान॥ ४८ ( क )॥

भाई हिरण्यकशिपुसहित हिरण्याक्षको और बलवान् मधु-कैटभको जिन्होंने मारा था, वे ही कृपाके समुद्र भगवान् [रामरूपसे] अवतरित हुए हैं॥ ४८ ( क )॥

मासपारायण, पचीसवाँ विश्राम

कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध ।

सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध॥ ४८ ( ख )॥

जो कालस्वरूप हैं, दुष्टोंके समूहरूपी बनके भस्म करनेवाले [अग्नि] हैं, गुणोंके धाम और ज्ञानघन हैं, एवं शिवजी और ब्रह्माजी भी जिनकी सेवा करते हैं, उनसे वैर कैसा?॥ ४८ ( ख )॥

परिहरि बयरु देहु बैदैही । भजहु कृपानिधि परम सनेही॥

ताके बचन बान सम लागे । करिआ मुह करि जाहि अभागे॥

[अतः] वैर छोड़कर उन्हें जानकीजीको दे दो और कृपानिधान परम स्नेही श्रीरामजीका भजन करो। रावणको उसके वचन बाणके समान लगे। [वह बोला—] अरे अभागे! मुँह काला करके [यहाँसे] निकल जा॥ १ ॥

बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही । अब जनि नयन देखावसि मोही॥

तेहिं अपने मन अस अनुमाना । बध्यो चहत एहि कृपानिधाना॥

तू बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुझे मार ही डालता। अब मेरी आँखोंको अपना मुँह न दिखला। रावणके ये वचन सुनकर उसने (माल्यवान्ने) अपने मनमें ऐसा अनुमान किया कि इसे कृपानिधान श्रीरामजी अब मारना ही चाहते हैं॥ २ ॥