सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 822, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 822

८२०

  • रामचरितमानस *

सो उठि गयउ कहत दुर्बादा । तब सकोप बोलेउ घननादा ॥ कौतुक प्रात देखिअहु मोरा । करिहुउँ बहुत कहौं का थोरा ॥

वह रावणको दुर्वचन कहता हुआ उठकर चला गया। तब मेघनाद क्रोधपूर्वक बोला—सबेरें मेरी करामात देखना। मैं बहुत कुछ करूँगा; थोड़ा क्या कहूँ ? (जो कुछ वर्णन करूँगा थोड़ा ही होगा) ॥ ३ ॥

सुनि सुत बचन भरोसा आवा । प्रीति समेत अंक बैठावा ॥ करत बिचार भयउ भिनुसारा । लागे कपि पुनि चहुँ दुआरा ॥

पुत्रके वचन सुनकर रावणको भरोसा आ गया। उसने प्रेमके साथ उसे गोदमें बैठा लिया। विचार करते-करते ही सबेरा हो गया। वानर फिर चारों दरवाजोंपर जा लगे ॥ ४ ॥

कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ु घेरा । नगर कोलाहलु भयउ घनेरा ॥ बिबिधायुध धर निसिचर धाए । गढ़ ते पर्वत सिखर ढहाए ॥

वानरोंने क्रोध करके दुर्गम किलेको घेर लिया। नगरमें बहुत ही कोलाहल (शोर) मच गया। राक्षस बहुत तरहके अस्त्र-शस्त्र धारण करके दौड़े और उन्होंने किलेपरसे पहाड़ोंके शिखर ढहाये ॥ ५ ॥

छं०—ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले ।

घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले ॥

मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए ।

गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहाँ सो तहाँ निसिचर हए ॥

उन्होंने पर्वतोंके करोड़ों शिखर ढहाये, अनेक प्रकारसे गोले चलने लगे। वे गोले ऐसा घहराते हैं जैसे व्रजपात हुआ हो (बिजली गिरी हो) और योद्धा ऐसे गरजते हैं मानो प्रलयकालके बादल हों। विकट वानर योद्धा भिड़ते हैं, कट जाते हैं (घायल हो जाते हैं), उनके शरीर जर्जर (चलनी) हो जाते हैं, तब भी वे लटते नहीं (हिम्मत नहीं हारते)। वे पहाड़ उठाकर उसे किलेपर फेंकते हैं। राक्षस जहाँ-के-तहाँ (जो जहाँ होते हैं वहाँ) मारे जाते हैं।

दो०—मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ु पुनि छँका आइ ।

उत्तर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चलयो बजाइ ॥ ४९ ॥

मेघनादने कानोंसे ऐसा सुना कि वानरोंने आकर फिर किलेको घेर लिया है। तब वह वीर किलेसे उतरा और ढंका बजाकर उनके सामने चला ॥ ४९ ॥

कहाँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता । धन्वी सकल लोक बिख्याता ॥

कहाँ नल नील दुबिद सुग्रीवा । अंगद हनूमंत बल सीवा ॥