सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 825, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 825
  • लङ्काकाण्ड *

८२३

माया देखकर वानर अकुला उठे। वे सोचने लगे कि इस हिसाबसे (इसी तरह रहा) तो सबका मरण आ बना। यह कौतुक देखकर श्रीरामजी मुसकराये। उन्होंने जान लिया कि सब वानर भयभीत हो गये हैं ॥ ३ ॥

एक बान काटी सब माया । जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया ॥ कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके । भए प्रबल रन रहहिं न रोके ॥

तब श्रीरामजीने एक ही बाणसे सारी माया काट डाली, जैसे सूर्य अन्धकारके समूहको हर लेता है। तदनन्तर उन्होंने कृपाभरी दृष्टिसे वानर-भालुओंकी ओर देखा, [जिससे] वे ऐसे प्रबल हो गये कि रणमें रोकनेपर भी नहीं रुकते थे ॥ ४ ॥

दो०—आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ ।

लछिमन चले कुब्द्ध होइ बान सरासन हाथ ॥ ५२ ॥

श्रीरामजीसे आज्ञा माँगकर, अंगद आदि वानरोंके साथ हाथोंमें धनुष-बाण लिये हुए श्रीलक्ष्मणजी कुब्द्ध होकर चले ॥ ५२ ॥

छतज नयन उर बाहु बिसाला । हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला ॥ इहाँ दसानन सुभट पठाए । नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए ॥

उनके लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं। हिमाचल पर्वतके समान उज्ज्वल (गौरवर्ण) शरीर कुछ ललाई लिये हुए है। इधर रावणने भी बड़े-बड़े योद्धा भेजे, जो अनेकों अस्त्र-सस्त्र लेकर दौड़े ॥ १ ॥

भूधर नख बिटपायुध धारी । धाए कपि जय राम पुकारी ॥ भिरे सकल जोरिहि सन जोरी । इत उत जय इच्छा नहिं थोरी ॥

पर्वत, नख और वृक्षरूपी हथियार धारण किये हुए वानर 'श्रीरामचन्द्रजीकी जय' पुकारकर दौड़े। वानर और राक्षस सब जोड़ीसे जोड़ी भिड़ गये। इधर और उधर दोनों ओर जयकी इच्छा कम न थी (अर्थात् प्रबल थी) ॥ २ ॥

मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं । कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं ॥ मारु मारु धरु धरु धरु मारु । सीस तोरि गहि भुजा उपारु ॥

वानर उनको घूँसों और लातोंसे मारते हैं, दांतोंसे काटते हैं। विजयशील वानर उन्हें मारकर फिर डाँटते भी हैं। 'मारो, मारो, पकड़ो, पकड़ो, पकड़कर मार दो, सिर तोड़ दो और भुजाएँ पकड़कर उखाड़ लो' ॥ ३ ॥

असि रव पूरि रही नव खंडा । धावहिं जहाँ तहाँ रुंड प्रचंडा ॥ देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा । कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा ॥