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भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ
  • लङ्काकाण्ड *

८२३

माया देखकर वानर अकुला उठे। वे सोचने लगे कि इस हिसाबसे (इसी तरह रहा) तो सबका मरण आ बना। यह कौतुक देखकर श्रीरामजी मुसकराये। उन्होंने जान लिया कि सब वानर भयभीत हो गये हैं ॥ ३ ॥

एक बान काटी सब माया । जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया ॥ कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके । भए प्रबल रन रहहिं न रोके ॥

तब श्रीरामजीने एक ही बाणसे सारी माया काट डाली, जैसे सूर्य अन्धकारके समूहको हर लेता है। तदनन्तर उन्होंने कृपाभरी दृष्टिसे वानर-भालुओंकी ओर देखा, [जिससे] वे ऐसे प्रबल हो गये कि रणमें रोकनेपर भी नहीं रुकते थे ॥ ४ ॥

दो०—आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ ।

लछिमन चले कुब्द्ध होइ बान सरासन हाथ ॥ ५२ ॥

श्रीरामजीसे आज्ञा माँगकर, अंगद आदि वानरोंके साथ हाथोंमें धनुष-बाण लिये हुए श्रीलक्ष्मणजी कुब्द्ध होकर चले ॥ ५२ ॥

छतज नयन उर बाहु बिसाला । हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला ॥ इहाँ दसानन सुभट पठाए । नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए ॥

उनके लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं। हिमाचल पर्वतके समान उज्ज्वल (गौरवर्ण) शरीर कुछ ललाई लिये हुए है। इधर रावणने भी बड़े-बड़े योद्धा भेजे, जो अनेकों अस्त्र-सस्त्र लेकर दौड़े ॥ १ ॥

भूधर नख बिटपायुध धारी । धाए कपि जय राम पुकारी ॥ भिरे सकल जोरिहि सन जोरी । इत उत जय इच्छा नहिं थोरी ॥

पर्वत, नख और वृक्षरूपी हथियार धारण किये हुए वानर 'श्रीरामचन्द्रजीकी जय' पुकारकर दौड़े। वानर और राक्षस सब जोड़ीसे जोड़ी भिड़ गये। इधर और उधर दोनों ओर जयकी इच्छा कम न थी (अर्थात् प्रबल थी) ॥ २ ॥

मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं । कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं ॥ मारु मारु धरु धरु धरु मारु । सीस तोरि गहि भुजा उपारु ॥

वानर उनको घूँसों और लातोंसे मारते हैं, दांतोंसे काटते हैं। विजयशील वानर उन्हें मारकर फिर डाँटते भी हैं। 'मारो, मारो, पकड़ो, पकड़ो, पकड़कर मार दो, सिर तोड़ दो और भुजाएँ पकड़कर उखाड़ लो' ॥ ३ ॥

असि रव पूरि रही नव खंडा । धावहिं जहाँ तहाँ रुंड प्रचंडा ॥ देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा । कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा ॥

८२४

  • रामचरितमानस *

नवों खण्डोंमें ऐसी आवाज भर रही है। प्रचण्ड रुण्ड (धड़) जहाँ-तहाँ दौड़ रहे हैं। आकाशमें देवतागण यह कौतुक देख रहे हैं। उन्हें कभी खेद होता है और कभी आनन्द ॥४॥

दो०— रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ।

जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाड़ ॥५३॥

खून गड़ोंमें भर-भरकर जम गया है और उसपर धूल उड़कर पड़ रही है [वह दृश्य ऐसा है] मानो अंगारोंके ढेरोंपर राख छा रही हो ॥५३॥

घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमित किसुक के तरु जैसे ॥

लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा ॥

घायल वीर कैसे शोभित हैं, जैसे फूले हुए पलासके पेड़। लक्ष्मण और मेघनाद दोनों योद्धा अत्यन्त क्रोध करके एक-दूसरेसे भिड़ते हैं ॥१॥

एकहि एक सकड़ नहिं जीती। निसिचर छल बल करड़ अनीती ॥

क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता ॥

एक-दूसरेको (कोई किसीको) जीत नहीं सकता। राक्षस छल-बल (माया) और अनीति (अधर्म) करता है, तब भगवान् अनन्तजी (लक्ष्मणजी) क्रोधित हुए और उन्होंने तुरंत उसके रथको तोड़ डाला और सारथिको टुकड़े-टुकड़े कर दिये! ॥२॥

नाना बिधि प्रहार कर सेष। राच्छस भयउ प्रान अवसेषा ॥

रावन सुत निज मन अनुमाना। संकठ भयउ हरिहि मम प्राना ॥

शेषजी (लक्ष्मणजी) उसपर अनेक प्रकारसे प्रहार करने लगे। राक्षसके प्राणमात्र शेष रह गये। रावणपुत्र मेघनादने मनमें अनुमान किया कि अब तो प्राणसंकट आ बना, ये मेरे प्राण हर लेंगे ॥३॥

बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेजपुंज लछिमन उर लागी ॥

मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें ॥

तब उसने वीरघातिनी शक्ति चलायी। वह तेजपूर्ण शक्ति लक्ष्मणजीकी छातीमें लगी। शक्तिके लगनेसे उन्हें मूर्छा आ गयी। तब मेघनाद भय छोड़कर उनके पास चला गया ॥४॥

दो०— मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ।

जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ ॥५४॥

मेघनादके समान सौ करोड़ (अगणित) योद्धा उन्हें उठा रहे हैं। परन्तु जगत्के आधार श्रीशेषजी (लक्ष्मणजी) उनसे कैसे उठते? तब वे लजाकर चले गये ॥५४॥

  • लङ्काकाण्ड *

८२५

सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू॥ सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही॥

[शिवजी कहते हैं—] हे गिरिजे! सुनो, [प्रलयकालमें] जिन (शेषनाग)—के क्रोधकी अग्नि चौदहों भुवनोंको तुरंत ही जला डालती है और देवता, मनुष्य तथा समस्त चराचर [जीव] जिनकी सेवा करते हैं, उनको संग्राममें कौन जीत सकता है ? ॥ १ ॥

यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई॥ संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी॥

इस लीलाको वही जान सकता है जिसपर श्रीरामजीकी कृपा हो। सन्ध्या होनेपर दोनों ओरकी सेनाएँ लौट पड़ीं; सेनापति अपनी-अपनी सेनाएँ सँभालने लगे ॥ २ ॥

व्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर। लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर॥ तब लिंग लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना॥

व्यापक, ब्रह्म, अजेय, सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके ईश्वर और करुणाकी खान श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—लक्ष्मण कहाँ है? तबतक हनुमान् उन्हें ले आये। छोटे भाईको [इस दशामें] देखकर प्रभुने बहुत ही दुःख माना ॥ ३ ॥

जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना॥ धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता॥

जाम्बवान्ने कहा—लङ्कामें सुषेण वैद्य रहता है, उसे ले आनेके लिये किसको भेजा जाय? हनुमान्जी छोटा रूप धरकर गये और सुषेणको उसके घरसमेत तुरंत ही उठा लाये ॥ ४ ॥

दो०—राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन।

कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन॥ ५५ ॥

सुषेणने आकर श्रीरामजीके चरणारविन्दोंमें सिर नवाया। उसने पर्वत और औषधका नाम बताया, (और कहा कि) हे पवनपुत्र! औषधि लेने जाओ ॥ ५५ ॥

राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजनसुत बल भाषी॥ उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावनु कालनेमि गृह आवा॥

श्रीरामजीके चरणकमलोंको हृदयमें रखकर पवनपुत्र हनुमान्जी अपना बल बखानकर (अर्थात् मैं अभी लिये आता हूँ, ऐसा कहकर) चले। उधर एक गुप्तचरने रावणको इस रहस्यकी खबर दी। तब रावण कालनेमिके घर आया ॥ १ ॥

दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना॥ देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा॥

८२६

  • रामचरितमानस *

रावणने उसको सारा मर्म (हाल) बतलाया। कालनेमिने सुना और बार-बार सिर पीटा (खेद प्रकट किया)। [उसने कहा—] तुम्हारे देखते-देखते जिसने नगर जला डाला, उसका मार्ग कौन रोक सकता है? ॥ २ ॥

भजु रघुपति करु हित आपना । छाँड़हु नाथ मूषा जल्पना ॥ नील कंज तनु सुंदर स्यामा । हृदयँ राखु लोचनाभिरामा ॥

श्रीरघुनाथजीका भजन करके तुम अपना कल्याण करो। हे नाथ! झूठी बकवाद छोड़ दो। नेत्रोंको आनन्द देनेवाले नीलकमलके समान सुन्दर श्याम शरीरको अपने हृदयमें रखो ॥ ३ ॥

मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू । महा मोह निस्ति सूतत जागू ॥ काल ब्याल कर भच्छक जोई । सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई ॥

मैं-तू (भेद-भाव) और ममतारूपी मूढ़ताको त्याग दो। महामोह (अज्ञान)-रूपी रात्रिमें सो रहे हो, सो जाग उठो। जो कालरूपी सर्पका भी भक्षक है, कहीं स्वप्नमें भी वह रणमें जीता जा सकता है? ॥ ४ ॥

दो०— सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार ।

राम दूत कर मरौँ बरु यह खल रत मल भार ॥ ५६ ॥

उसकी ये बातें सुनकर रावण बहुत ही क्रोधित हुआ। तब कालनेमिने मनमें विचार किया कि [इसके हाथसे मरनेकी अपेक्षा] श्रीरामजीके दूतके हाथसे ही मरूँ तो अच्छा है। यह दुष्ट तो पापसमूहमें रत है ॥ ५६ ॥

अस कहि चला रचिसि मग माया । सर मंदिर बर बाग बनाया ॥ मारुतसुत देखा सुभ आश्रम । मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम ॥

वह मन-ही-मन ऐसा कहकर चला और उसने मार्गमें माया रची। तालाब, मन्दिर और सुन्दर बाग बनाया। हनुमान्जीने सुन्दर आश्रम देखकर सोचा कि मुनिसे पूछकर जल पी लूँ, जिससे थकावट दूर हो जाय ॥ १ ॥

राच्छस कपट बेष तहाँ सोहा । मायापति दूतहि चह मोहा ॥ जाइ पवनसुत नायउ माथा । लाग सो कहै राम गुन गाथा ॥

राक्षस वहाँ कपट [से मुनि] का वेष बनाये विराजमान था। वह मूर्ख अपनी मायासे मायापतिके दूतको मोहित करना चाहता था। मारुतिने उसके पास जाकर मस्तक नवाया। वह श्रीरामजीके गुणोंकी कथा कहने लगा ॥ २ ॥

होत महा रन रावन रामहिं । जितिहिं राम न संसय या महिं ॥ इहाँ भएँ मैं देखउँ भाई । ग्यानदृष्टि बल मोहि अधिकाई ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८२७

[वह बोला—] रावण और राममें महान् युद्ध हो रहा है। रामजी जीतेंगे इसमें सन्देह नहीं है। हे भाई! मैं यहाँ रहता हुआ ही सब देख रहा हूँ। मुझे ज्ञानदृष्टिका बहुत बड़ा बल है ॥ ३ ॥

मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल । कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल ॥ सर मज्जन करि आतुर आवहु । दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु ॥

हनुमान्जीने उससे जल माँगा, तो उसने कमण्डलु दे दिया। हनुमान्जीने कहा—थोड़े जलसे मैं तुम नहीं होनेका। तब वह बोला—तालाबमें स्नान करके तुरंत लौट आओ तो मैं तुम्हें दीक्षा दूँ, जिससे तुम ज्ञान प्राप्त करो ॥ ४ ॥

दो०—सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान ।

मारी सो धरि दिव्य तनु चली गगन चढ़ि जान ॥ ५७ ॥

तालाबमें प्रवेश करते ही एक मगरिने अकुलाकर उसी समय हनुमान्जीका पैर पकड़ लिया। हनुमान्जीने उसे मार डाला। तब वह दिव्य देह धारण करके विमानपर चढ़कर आकाशको चली ॥ ५७ ॥

कपि तव दरस भइउँ निष्पापा । मिटा तात मुनिबर कर सापा ॥ मुनि न होइ यह निसिचर घोरा । मानहु सत्य बचन कपि मोरा ॥

[उसने कहा—] हे वानर! मैं तुम्हारे दर्शनसे पापरहित हो गयी। हे तात! श्रेष्ठ मुनिका शाप मिट गया। हे कपि! यह मुनि नहीं है, घोर निशाचर है। मेरा बचन सत्य मानो ॥ १ ॥

अस कहि गई अपछरा जबहीं । निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं ॥ कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू । पाछें हमहिं मंत्र तुम्ह देहू ॥

ऐसा कहकर ज्यों ही वह अप्सरा गयी, त्यों ही हनुमान्जी निशाचरके पास गये। हनुमान्जीने कहा—हे मुनि! पहले गुरुदक्षिणा ले लीजिये। पीछे आप मुझे मन्त्र दीजियेगा ॥ २ ॥

सिर लंगूर लपेटि पछारा । निज तनु प्रगटेसि मरती बारा ॥ राम राम कहि छाड़ेसि प्राना । सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना ॥

हनुमान्जीने उसके सिरको पूँछमें लपेटकर उसे पछाड़ दिया। मरते समय उसने अपना (राक्षसी) शरीर प्रकट किया। उसने राम-राम कहकर प्राण छोड़े। यह (उसके मुँहसे राम-नामका उच्चारण) सुनकर हनुमान्जी मनमें हर्षित होकर चले ॥ ३ ॥

देखा सैल न औषध चीन्हा । सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा ॥ गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ । अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ ॥

उन्होंने पर्वतको देखा, पर औषध न पहचान सके। तब हनुमान्जीने एकदमसे पर्वतको ही उखाड़ लिया। पर्वत लेकर हनुमान्जी रातहीमें आकाशमार्गसे दौड़ चले और अयोध्यापुरीके ऊपर पहुँच गये ॥ ४ ॥

८२८

  • रामचरितमानस *

दो०—देखा भरत बिसाल अति निस्चिन्न मन अनुमानि ।

बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि ॥ ५८ ॥

भरतजीने आकाशमें अत्यन्त विशाल स्वरूप देखा, तब मनमें अनुमान किया कि यह कोई राक्षस है। उन्होंने कानतक धनुषको खींचकर बिना फलका एक बाण मारा ॥ ५८ ॥

परेउ मुरुछि महि लागत सायक । सुमिरत राम राम रघुनायक ॥ सुनि प्रिय वचन भरत तब धाए । कपि समीप अति आतुर आए ॥

बाण लगते ही हनुमान्जी 'राम, राम, रघुपति' का उच्चारण करते हुए मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। प्रिय वचन (रामनाम) सुनकर भरतजी उठकर दौड़े और बड़ी उतावलीसे हनुमान्जीके पास आये ॥ १ ॥

बिकल बिलोकि कीस उर लावा । जागत नहिं बहु भाँति जगावा ॥ मुख मलीन मन भए दुखारी । कहत बचन भरि लोचन बारी ॥

हनुमान्जीको व्याकुल देखकर उन्होंने हृदयसे लगा लिया। बहुत तरहसे जगाया, पर वे जागते न थे! तब भरतजीका मुख उदास हो गया। वे मनमें बड़े दुखी हुए और नेत्रोंमें [विषादके आँसुओंका] जल भरकर ये वचन बोले— ॥ २ ॥

जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा । तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा ॥ जौं मोरें मन बच अरु काया । प्रीति राम पद कमल अमाया ॥

जिस विधाताने मुझे श्रीरामसे विमुख किया, उसीने फिर यह भयानक दुःख भी दिया। यदि मन, वचन और शरीरसे श्रीरामजीके चरणकमलोंमें मेरा निष्कपट प्रेम हो, ॥ ३ ॥

तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला । जौं मो पर रघुपति अनुकूला ॥ सुनत बचन उठि बैठ कपीसा । कहि जय जयति कोसलाधीसा ॥

और यदि श्रीरघुनाथजी मुझपर प्रसन्न हों तो यह वानर थकावट और पीड़ासे रहित हो जाय! यह वचन सुनते ही कपिराज हनुमान्जी 'कोसलपति श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जय हो' कहते हुए उठ बैठे ॥ ४ ॥

सो०—लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल ।

प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक ॥ ५९ ॥

भरतजीने वानर (हनुमान्जी) को हृदयसे लगा लिया, उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [आनन्द तथा प्रेमके आँसुओंका] जल भर आया। रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके भरतजीके हृदयमें प्रीति समाती न थी ॥ ५९ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८२१

तात कुसल कहु सुखनिधान की । सहित अनुज अरु मातु जानकी ॥ कपि सब चरित समास बखाने । भए दुखी मन महुँ पछिताने ॥

[भरतजी बोले—] हे तात! छोटे भाई लक्ष्मण तथा माता जानकीसहित सुखनिधान श्रीरामजीकी कुशल कहो। वानर (हनुमान्जी) ने संक्षेपमें सब कथा कही। सुनकर भरतजी दुखी हुए और मनमें पछिताने लगे ॥ १ ॥

अहह दैव मैं कत जग जायउँ । प्रभु के एकहु काज न आयउँ ॥ जानि कुअवसरु मन धरि धीरा । पुनि कपि सन बोले बलबीरा ॥

हा दैव! मैं जगत्में क्यों जन्मा? प्रभुके एक भी काम न आया। फिर कुअवसर (विपरीत समय) जानकर मनमें धीरज धरकर बलवीर भरतजी हनुमान्जीसे बोले— ॥ २ ॥

तात गहरु होइहि तोहि जाता । काजु नसाइहि होत प्रभाता ॥ चढु मम सायक सैल समेता । पठवौँ तोहि जहाँ कृपानिकेता ॥

हे तात! तुमको जानेमें देर होगी और सबेरा होते ही काम बिगड़ जायगा। [अतः] तुम पर्वतसहित मेरे बाणपर चढ़ जाओ, मैं तुमको वहाँ भेज दूँ जहाँ कृपाके धाम श्रीरामजी हैं ॥ ३ ॥

सुनि कपि मन उपजा अभिमाना । मोरें भार चलिहि किमि बाना ॥ राम प्रभाव बिचारि बहोरी । बंदि चरन कह कपि कर जोरी ॥

भरतजीकी यह बात सुनकर [एक बार तो] हनुमान्जीके मनमें अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझसे बाण कैसे चलेगा? [किन्तु] फिर श्रीरामचन्द्रजीके प्रभावका विचार करके वे भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले— ॥ ४ ॥

दो०— तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत ।

अस कहि आयसु पाड़ पद बंदि चलेउ हनुमंत ॥ ६० ( क ) ॥

हे नाथ! हे प्रभो! मैं आपका प्रताप हृदयमें रखकर तुरंत चला जाऊँगा। ऐसा कहकर आज्ञा पाकर और भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हनुमान्जी चले ॥ ६० ( क ) ॥

भरत बाहुबल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार ।

मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार ॥ ६० ( ख ) ॥

भरतजीके बाहुबल, शील (सुन्दर स्वभाव), गुण और प्रभुके चरणोंमें अपार प्रेमकी मन-ही-मन बारंबार सराहना करते हुए मारुति श्रीहनुमान्जी चले जा रहे हैं ॥ ६० ( ख ) ॥

उहाँ राम लछिमनहि निहारी । बोले बचन मनुज अनुसारी ॥ अर्ध राति गड़ कपि नहीं आयउ । राम उठाइ अनुज उर लायउ ॥

८३०

  • रामचरितमानस *

वहाँ लक्ष्मणजीको देखकर श्रीरामजी साधारण मनुष्योंके अनुसार (समान) वचन बोले—आधी रात बीत चुकी, हनुमान् नहीं आये। यह कहकर श्रीरामजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको उठाकर हृदयसे लगा लिया ॥ १ ॥

सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ । बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ ॥ मम हित लागि तजेहु पितु माता । सहेहु बिपिन हिम आतप बाता ॥

[और बोले—] हे भाई! तुम मुझे कभी दुःखी नहीं देख सकते थे। तुम्हारा स्वभाव सदासे ही कोमल था। मेरे हितके लिये तुमने माता-पिताको भी छोड़ दिया और वनमें जाड़ा, गरमी और हवा सब सहन किया ॥ २ ॥

सो अनुराग कहाँ अब भाई । उठहु न सुनि मम बच बिकलाई ॥ जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू । पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू ॥

हे भाई! वह प्रेम अब कहाँ है? मेरे व्याकुलतापूर्ण वचन सुनकर उठते क्यों नहीं? यदि मैं जानता कि वनमें भाईका विछोह होगा तो मैं पिताका वचन [जिसका मानना मेरे लिये परम कर्तव्य था] उसे भी न मानता ॥ ३ ॥

सुत बित नारि भवन परिवारा । होहिं जाहिं जग बारहिं बारा ॥ अस बिचारि जियै जागहु ताता । मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥

पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार—ये जगत्में बार-बार होते और जाते हैं, परन्तु जगत्में सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता। हृदयमें ऐसा विचारकर हे तात! जागो ॥ ४ ॥

जथा पंख बिनु खग अति दीना । मनि बिनु फनि करिबर कर हीना ॥ अस मम जिवन बंधु बिनु तोही । जौं जड़ दैव जिआवै मोही ॥

जैसे पंख बिना पक्षी, मणि बिना सर्प और सूँड़ बिना श्रेष्ठ हाथी अत्यन्त दीन हो जाते हैं, हे भाई! यदि कहीं जड़ दैव मुझे जीवित रखे तो तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी ऐसा ही होगा ॥ ५ ॥

जैहउँ अवध कवन मुहु लाई । नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई ॥ बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं । नारि हानि बिसेष छति नाहीं ॥

स्त्रीके लिये प्यारे भाईको खोकर, मैं कौन-सा मुँह लेकर अवध जाऊँगा? मैं जगत्में बदनामी भले ही सह लेता (कि राममें कुछ भी वीरता नहीं है जो स्त्रीको खो बैठे)। स्त्रीकी हानिसे [इस हानिको देखते] कोई विशेष क्षति नहीं थी ॥ ६ ॥

अब अपलोकु सोकु सुत तोरा । सहिहि निठुर कठोर उर मोरा ॥ निज जननी के एक कुमारा । तात तासु तुम्ह प्रान अधारा ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८३१

अब तो हे पुत्र! मेरा निष्ठुर और कठोर हृदय यह अपयश और तुम्हारा शोक दोनों ही सहन करेगा। हे तात! तुम अपनी माताके एक ही पुत्र और उसके प्राणाधार हो ॥७॥

सौंपैसि मोहि तुम्हहि गहि पानी । सब बिधि सुखद परम हित जानी ॥ उतरु काह दैहउँ तेहि जाई । उठि किन मोहि सिखावहु भाई ॥

सब प्रकारसे सुख देनेवाला और परम हितकारी जानकर उन्होंने तुम्हें हाथ पकड़कर मुझे सौंपा था। मैं अब जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा? हे भाई! तुम उठकर मुझे सिखाते (समझाते) क्यों नहीं? ॥८॥

बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन । स्वत सलिल राजिव दल लोचन ॥ उमा एक अखंड रघुराई । नर गति भगत कृपाल देखाई ॥

सोचसे छुड़ानेवाले श्रीरामजी बहुत प्रकारसे सोच कर रहे हैं। उनके कमलकी पँखुड़ीके समान नेत्रोंसे [विषादके आँसुओंका] जल बह रहा है। [शिवजी कहते हैं—] हे उमा! श्रीरघुनाथजी एक (अद्वितीय) और अखण्ड (वियोगरहित) हैं। भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवान्ने [लीला करके] मनुष्यकी दशा दिखलायी है ॥९॥

सो०—प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए वानर निकर । आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महाँ बीर रस ॥६१॥

प्रभुके [लीलाके लिये किये गये] प्रलापको कानोंसे सुनकर वानरोंके समूह व्याकुल हो गये। [इतनेमें ही] हनुमान्जी आ गये, जैसे करुणरस [के प्रसङ्ग] में वीररस [का प्रसङ्ग] आ गया हो ॥६१॥

हरषि राम भेटेउ हनुमाना । अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना ॥ तुरत बैद तब कीन्हि उपाई । उठि बैठे लछिमन हरषाई ॥

श्रीरामजी हर्षित होकर हनुमान्जीसे गले लगकर मिले। प्रभु परम सुजान (चतुर) और अत्यन्त ही कृतज्ञ हैं। तब वैद्य (सुषेण) ने तुरंत उपाय किया, [जिससे] लक्ष्मणजी हर्षित होकर उठ बैठे ॥१॥

हृदयं लाइ प्रभु भेटेउ भ्राता । हरषे सकल भालु कपि ब्राता ॥ कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा । जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा ॥

प्रभु भाईको हृदयसे लगाकर मिले। भालू और वानरोंके समूह सब हर्षित हो गये। फिर हनुमान्जीने वैद्यको उसी प्रकार वहाँ पहुँचा दिया जिस प्रकार वे उस बार (पहले) उसे ले आये थे ॥२॥

८३२

  • रामचरितमानस *

यह ब्रूतांत दसानन सुनेऊ । अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ ॥ व्याकुल कुंभकरण पहिं आवा । बिबिध जतन करि ताहि जगावा ॥

यह समाचार जब रावणने सुना, तब उसने अत्यन्त विषादसे बार-बार सिर पीटा । वह व्याकुल होकर कुम्भकर्णके पास गया और बहुत-से उपाय करके उसने उसको जगाया ॥ ३ ॥

जागा निसिचर देखिअ कैसा । मानहुँ कालु देह धरि बैसा ॥ कुंभकरण बूझा कहु भाई । काहे तव मुख रहे सुखाई ॥

कुम्भकर्ण जगा (उठ बैठा) । वह कैसा दिखायी देता है मानो स्वयं काल ही शरीर धारण करके बैठा हो । कुम्भकर्णने पूछा—हे भाई ! कहो तो, तुम्हारे मुख सूख क्यों रहे हैं ? ॥ ४ ॥

कथा कही सब तेहिं अभिमानी । जेहि प्रकार सीता हरि आनी ॥ तात कपिन्ह सब निसिचर मारे । महा महा जोधा संघारे ॥

उस अभिमानी (रावण) —ने उससे जिस प्रकारसे वह सीताको हर लाया था [तबसे अबतककी] सारी कथा कही । [फिर कहा—] हे तात ! वानरोने सब राक्षस मार डाले । बड़े-बड़े योद्धाओंका भी संहार कर डाला ॥ ५ ॥

दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी । भट अतिकाय अकंपन भारी ॥ अपर महोदर आदिक बीरा । परे समर महि सब रनधीरा ॥

दुर्मुख, देवशत्रु (देवान्तक), मनुष्यभक्षक (नरान्तक), भारी योद्धा अतिकाय और अकम्पन तथा महोदर आदि दूसरे सभी रणधीर वीर रणभूमिमें मारे गये ॥ ६ ॥

दो०— सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरण बिलखान । जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान ॥ ६२ ॥

तब रावणके वचन सुनकर कुम्भकर्ण बिलखकर (दुखी होकर) बोला—अरे मूर्ख ! जगज्जननी जानकीको हर लाकर अब तू कल्याण चाहता है ? ॥ ६२ ॥

भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा । अब मोहि आइ जगाएहि काहा ॥ अजहुँ तात त्यागि अभिमाना । भजहु राम होइहि कल्याना ॥

हे राक्षसराज ! तूने अच्छा नहीं किया । अब आकर मुझे क्या जगाया ? हे तात ! अब भी अभिमान छोड़कर श्रीरामजीको भजो तो कल्याण होगा ॥ १ ॥

हैं दससीस मनुज रघुनायक । जाके हनुमान से पायक ॥ अहह बंधु तैं कीन्हि खोटार्ई । प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई ॥

हे रावण ! जिनके हनुमान्-सरीखे सेवक हैं, वे श्रीरघुनाथजी क्या मनुष्य हैं ? हाय भाई ! तूने बुरा किया, जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया ॥ २ ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८३३

कीन्हेहु प्रभु विरोध तेहि देवक । सिव बिरंचि सुर जाके सेवक ॥ नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा । कहतेउँ तोहि समय निरबहा ॥

हे स्वामी! तुमने उस परम देवताका विरोध किया, जिसके शिव, ब्रह्मा आदि देवता सेवक हैं। नारद मुनिने मुझे जो ज्ञान कहा था, वह मैं तुझसे कहता; पर अब तो समय जाता रहा ॥ ३ ॥

अब भरि अंक भेटु मोहि भाई । लोचन सुफल करौं मैं जाई ॥ स्याम गात सरसीरुह लोचन । देखौं जाइ ताप त्रय मोचन ॥

हे भाई! अब तो [अन्तिम बार] अँकवार भरकर मुझसे मिल ले। मैं जाकर अपने नेत्र सफल करूँ। तीनों तापोंको छुड़ानेवाले श्यामशरीर, कमलनेत्र श्रीरामजीके जाकर दर्शन करूँ ॥ ४ ॥

दो०— राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक । रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक ॥ ६३ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके रूप और गुणोंको स्मरण करके वह एक क्षणके लिये प्रेममें मग्न हो गया। फिर रावणने करोड़ों घड़े मदिरा और अनेकों भैंसे मँगावाये ॥ ६३ ॥

महिष खाइ करि मदिरा पाना । गर्जा बज्राघात समाना ॥ कुंभकरण दुर्मद रन रंगा । चला दुर्ग तजि सेन न संगा ॥

भैंसे खाकर और मदिरा पीकर वह वज्राघात (बिजली गिरने) के समान गरजा। मदसे चूर, रणके उत्साहसे पूर्ण कुम्भकर्ण किला छोड़कर चला। सेना भी साथ नहीं ली ॥ १ ॥

देखि बिभीषनु आगें आयउ । परेउ चरन निज नाम सुनायउ ॥ अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो । रघुपति भक्त जानि मन भायो ॥

उसे देखकर विभीषण आगे आये और उसके चरणोंपर गिरकर अपना नाम सुनाया। छोटे भाईको उठाकर उसने हृदयसे लगा लिया और श्रीरघुनाथजीका भक्त जानकर वे उसके मनको प्रिय लगे ॥ २ ॥

तात लात रावन मोहि मारा । कहत परम हित मंत्र बिचारा ॥ तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ । देखि दीन प्रभु के मन भायउँ ॥

[विभीषणने कहा—] हे तात! परम हितकर सलाह एवं विचार कहनेपर रावणने मुझे लात मारी। उसी ग्लानिके मारे मैं श्रीरघुनाथजीके पास चला आया। दीन देखकर प्रभुके मनको मैं [बहुत] प्रिय लगा ॥ ३ ॥

८३४

  • रामचरितमानस *

सुनु सुत भयउ कालबस रावन । सो कि मान अब परम सिखावन ॥ धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन । भयहु तात निसिचर कुल भूषन ॥

[कुम्भकर्णने कहा—] हे पुत्र! सुन, रावण तो कालके वश हो गया है (उसके सिरपर मृत्यु नाच रही है)। वह क्या अब उत्तम शिक्षा मान सकता है? हे विभीषण! तू धन्य है, धन्य है, धन्य है। हे तात! तू राक्षसकुलका भूषण हो गया ॥४॥

बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर । भजेहु राम सोभा सुख सागर ॥

हे भाई! तूने अपने कुलको देदीप्यमान कर दिया, जो शोभा और सुखके समुद्र श्रीरामजीको भजा ॥५॥

दो०—बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर ।

जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर ॥६४॥

मन, वचन और कर्मसे कपट छोड़कर रणधीर श्रीरामजीका भजन करना। हे भाई! मैं काल (मृत्यु)-के वश हो गया हूँ, मुझे अपना-पराया नहीं सूझता; इसलिये अब तुम जाओ ॥६४॥

बंधु बचन सुनि चला बिभीषन । आयउ जहैं त्रैलोक बिभूषन ॥

नाथ भूधराकार सरीरा । कुंभकरन आवत रनधीरा ॥

भाईके वचन सुनकर विभीषण लौट गये और वहाँ आये जहाँ त्रिलोकीके भूषण श्रीरामजी थे। [विभीषणने कहा—] हे नाथ! पर्वतके समान [विशाल] देहवाला रणधीर कुम्भकर्ण आ रहा है ॥१॥

एतना कपिन्ह सुना जब काना । किलकिलाइ धाए बलवाना ॥

लिए उठाइ बिटप अरु भूधर । कटकटाइ डारहिं ता ऊपर ॥

वानरोंने जब कानोंसे इतना सुना, तब वे बलवान् किलकिलाकर (हर्षध्वनि करके) दौड़े। वृक्ष और पर्वत [उखाड़कर] उठा लिये और [क्रोधसे] दाँत कटकटाकर उन्हें उसके ऊपर डालने लगे ॥२॥

कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा । करहिं भालु कपि एक एक बारा ॥

मुर्यो न मनु तनु टर्यो न टार्यो । जिमि गज अर्क फलनि को मार्यो ॥

रीछ-वानर एक-एक बारमें ही करोड़ों पहाड़ोंके शिखरोंसे उसपर प्रहार करते हैं; परन्तु इससे न तो उसका मन ही मुड़ा (विचलित हुआ) और न शरीर ही टाले टला, जैसे मदारके फलोंकी मारसे हाथीपर कुछ भी असर नहीं होता! ॥३॥

तब मारुतसुत मुठिका हन्यो । पर्यो धरनि व्याकुल सिर धुन्यो ॥

पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता । घुर्मित भूतल परेउ तुरंता ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८३५

तब हनुमान्जीने उसे एक घूँसा मारा; जिससे वह व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और सिर पीटने लगा। फिर उसने उठकर हनुमान्जीको मारा! वे चक्कर खाकर तुरंत ही पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४ ॥

पुनि नल नीलहि अवनि पछोरसि । जहँ तहँ पटक पटक भट डोरसि ॥ चली बलीमुख सेन पराई । अति भय त्रसित न कोउ समुहाई ॥

फिर उसने नल-नीलको पृथ्वीपर पछाड़ दिया और दूसरे योद्धाओंको भी जहाँ-तहाँ पटक-पटककर डाल दिया। वानरसेना भाग चली। सब अत्यन्त भयभीत हो गये, कोई सामने नहीं आता ॥ ५ ॥

दो०—अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव । काँख दाबि कपिराज कहँ चला अमित बल सीव ॥ ६५ ॥

सुग्रीवसमेत अंगदादि वानरोंको मूर्च्छित करके फिर वह अपरिमित बलकी सीमा कुम्भकर्ण वानरराज सुग्रीवको काँखमें दाबकर चला ॥ ६५ ॥

उमा करत रघुपति नरलीला । खेल गुरुड़ जिमि अहिगन मीला ॥ भूकृटि भंग जो कालहि खाई । ताहि कि सोहड़ ऐसि लराई ॥

(शिवजी कहते हैं—) हे उमा! श्रीरघुनाथजी वैसे ही नरलीला कर रहे हैं जैसे गुरुड़ सर्पोंके समूहमें मिलकर खेलता हो। जो भीहके इशारेमात्रसे (बिना परिश्रमके) कालको भी खा जाता है, उसे कहीं ऐसी लड़ाई शोभा देती है ? ॥ १ ॥

जग पावनि कीरति बिस्तरिहँहि । गाड़ गाड़ भवनधि नर तरिहँहि ॥ मुरुछा गड़ मारुतसुत जागा । सुग्रीवहि तब खोजन लागा ॥

भगवान् [इसके द्वारा] जगत्को पवित्र करनेवाली वह कीर्ति फैलायेंगे जिसे गा-गाकर मनुष्य भवसागरसे तर जायेंगे। मूर्च्छा जाती रही, तब मारुति हनुमान्जी जागे और फिर वे सुग्रीवको खोजने लगे ॥ २ ॥

सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती । निबुकि गयउ तेहि मृतक प्रतीती ॥ काटेसि दसन नासिका काना । गरजि अकास चलेउ तेहि जाना ॥

सुग्रीवकी भी मूर्च्छा दूर हुई, तब वे [मुर्दे-से होकर] खिसक गये (काँखसे नीचे गिर पड़े)। कुम्भकर्णने उनको मृतक जाना। उन्होंने कुम्भकर्णके नाक-कान दाँतोंसे काट लिये और फिर गरजकर आकाशकी ओर चले, तब कुम्भकर्णने जाना ॥ ३ ॥

गहेउ चरन गहि भूमि पछारा । अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा ॥ पुनि आयउ प्रभु पहँ बलवाना । जयति जयति जय कृपानिधाना ॥

उसने सुग्रीवका पैर पकड़कर उनको पृथ्वीपर पछाड़ दिया। फिर सुग्रीवने बड़ी फुर्तीसे उठकर उसको मारा। और तब बलवान् सुग्रीव प्रभुके पास आये और बोले—कृपानिधान प्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो ॥ ४ ॥

८३६

  • रामचरितमानस *

नाक कान काटे जियँ जानी । फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी ॥ सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा । देखत कपि दल उपजी त्रासा ॥

नाक-कान काटे गये, ऐसा मनमें जानकर बड़ी ग्लानि हुई; और वह क्रोध करके लौटा। एक तो वह स्वभाव (आकृति)-से ही भयंकर था और फिर बिना नाक-कानका होनेसे और भी भयानक हो गया। उसे देखते ही वानरोंकी सेनामें भय उत्पन्न हो गया ॥ ५ ॥

दो०—जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह।

एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह ॥ ६६ ॥

‘रघुवंशमणिकी जय हो, जय हो, जय हो’ ऐसा पुकारकर वानर हूह करके दौड़े और सबने एक ही साथ उसपर पहाड़ और वृक्षोंके समूह छोड़े ॥ ६६ ॥

कुंभकरण रन रंग बिरुद्धा । सन्मुख चला काल जनु कुद्धा ॥ कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई । जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई ॥

रणके उत्साहमें कुम्भकर्ण विरुद्ध होकर [उनके] सामने ऐसा चला मानो क्रोधित होकर काल ही आ रहा हो। वह करोड़-करोड़ वानरोंको एक साथ पकड़-पकड़कर खाने लगा। [ वे उसके मुँहमें इस तरह घुसने लगे] मानो पर्वतकी गुफामें टिड़ियाँ समा रही हों ॥ १ ॥

कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा । कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा ॥ मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा । निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा ॥

करोड़ों (वानरों)-को पकड़कर उसने शरीरसे मसल डाला। करोड़ोंको हाथोंसे मलकर पृथ्वीकी धूलमें मिला दिया। [पेटमें गये हुए] भालू और वानरोंके ठट्ट-के-ठट्ट उसके मुख, नाक और कानोंकी राहसे निकल-निकलकर भाग रहे हैं ॥ २ ॥

रन मद मत्त निसाचर दर्पा । बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अपर्पा ॥ मुरे सुभट सब फिरिहिं न फेरे । सूझ न नयन सुनिहिं नहिं टेरे ॥

रणके मदमें मत्त राक्षस कुम्भकर्ण इस प्रकार गर्वित हुआ, मानो विधाताने उसको सारा विश्व अपर्ण कर दिया हो, और उसे वह ग्रास कर जायगा। सब योद्धा भाग खड़े हुए, वे लौटाये भी नहीं लौटते। आँखोंसे उन्हें सूझ नहीं पड़ता और पुकारनेसे सुनते नहीं ॥ ३ ॥

कुंभकरण कपि फौज बिडारी । सुनि धाई रजनीचर धारी ॥ देखी राम बिकल कटकाई । रिपु अनीक नाना बिधि आई ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८३७

कुम्भकर्णने वानर-सेनाको तितर-बितर कर दिया। यह सुनकर राक्षस-सेना भी दौड़ी। श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि अपनी सेना व्याकुल है और शत्रुकी नाना प्रकारकी सेना आ गयी है ॥ ४ ॥

दो०—सुनु सुग्रीव बिभीषण अनुज सँभारेहु सैन। मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन ॥ ६७ ॥

तब कमलनयन श्रीरामजी बोले—हे सुग्रीव! हे विभीषण! और हे लक्ष्मण! सुनो, तुम सेनाको सँभालना। मैं इस दुष्टके बल और सेनाको देखता हूँ ॥ ६७ ॥

कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा ॥ प्रथम कीन्हि प्रभु धनुष टँकोरा। रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा ॥

हाथमें शाईधनुष और कमरमें तरकस सजकर श्रीरघुनाथजी शत्रुसेनाको दलन करने चले। प्रभुने पहले तो धनुषका टँकार किया जिसकी भयानक आवाज सुनते ही शत्रुदल बहरा हो गया ॥ १ ॥

सत्यसंध छौड़े सर लच्छा। कालसर्प जनु चले सपच्छा ॥ जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा। लगे कटन भट बिकट पिसाचा ॥

फिर सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामजीने एक लाख बाण छोड़े। वे ऐसे चले मानो पंखवाले काल-सर्प चले हों। जहाँ-तहाँ बहुत-से बाण चले, जिनसे भयंकर राक्षस योद्धा कटने लगे ॥ २ ॥

कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा। बहुतक बीर होहिं सत खंडा ॥ घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं। उठि सँभारि सुभट पुनि लरहीं ॥

उनके चरण, छाती, सिर और भुजदण्ड कट रहे हैं। बहुत-से बीरोंके सौ-सौ टुकड़े हो जाते हैं। घायल चक्कर खा-खाकर पृथ्वीपर पड़ रहे हैं। उत्तम योद्धा फिर सँभलकर उठते और लड़ते हैं ॥ ३ ॥

लागत बान जलद जिमि गाजहिं। बहुतक देखि कठिन सर भाजहिं ॥ रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं। धरु धरु मारु मारु धुनि गावहिं ॥

बाण लगते ही वे मेघकी तरह गरजते हैं। बहुत-से तो कठिन बाणको देखकर ही भाग जाते हैं। बिना मुण्ड (सिर) के प्रचण्ड रुण्ड (धड़) दौड़ रहे हैं और 'पकड़ो, पकड़ो, मारो, मारो' का शब्द करते हुए गा (चिल्ला) रहे हैं ॥ ४ ॥

दो०—छन महँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच। पुनि रघुबीर निषंग महँ प्रबिसे सब नाराच ॥ ६८ ॥

प्रभुके बाणोंने क्षणमात्रमें भयानक राक्षसोंको काटकर रख दिया। फिर वे सब बाण लौटकर श्रीरघुनाथजीके तरकसमें घुस गये ॥ ६८ ॥

८३८

  • रामचरितमानस *

कुंभकरण मन दीख बिचारी । हति छन माझ निसाचर धारी ॥ भा अति कुब्द महाबल बीरा । कियो मृगनायक नाद गँभीरा ॥

कुम्भकर्णने मनमें विचारकर देखा कि श्रीरामजीने क्षणमात्रमें राक्षसी सेनाका संहार कर डाला। तब वह महाबली वीर अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसने गम्भीर सिंहनाद किया ॥ १ ॥

कोपि महीधर लेड़ उपारी । डारड़ जहाँ मर्कट भट भारी ॥ आवत देखि सैल प्रभु भारे । सरन्हि काटि रज सम करि डारे ॥

वह क्रोध करके पर्वत उखाड़ लेता है और जहाँ भारी-भारी वानर योद्धा होते हैं, वहाँ डाल देता है। बड़े-बड़े पर्वतोंको आते देखकर प्रभुने उनको बाणोंसे काटकर धूलके समान (चूर-चूर) कर डाला ॥ २ ॥

पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक । छाँड़े अति कराल बहु सायक ॥ तनु महँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं । जिमि दामिनि घन माझ समाहीं ॥

फिर श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके धनुषको तानकर बहुत-से अत्यन्त भयानक बाण छोड़े। वे बाण कुम्भकर्णके शरीरमें घुसकर [पीछेसे इस प्रकार] निकल जाते हैं [कि उनका पता नहीं चलता], जैसे बिजलियाँ बादलमें समा जाती हैं ॥ ३ ॥

सोनित स्वत सोह तन कारे । जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे ॥ बिकल बिलोकि भालु कपि धाए । बिहँसा जबहिं निकट कपि आए ॥

उसके काले शरीरसे रुधिर बहता हुआ ऐसी शोभा देता है, मानो काजलके पर्वतसे गेरूके पनाले बह रहे हों। उसे व्याकुल देखकर रीछ-वानर दौड़े। वे ज्यों ही निकट आये, त्यों ही वह हँसा ॥ ४ ॥

दो०—महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस।

महि पटकड़ गजराज इव सपथ करड़ दससीस ॥ ६९ ॥

और बड़ा घोर शब्द करके गरजा। तथा करोड़-करोड़ वानरोंको पकड़कर वह गजराजकी तरह उन्हें पृथ्वीपर पटकने लगा और रावणकी दुहाई देने लगा ॥ ६९ ॥

भागे भालु बलीमुख जूथा । बूकु बिलोकि जिमि मेघ बरूथा ॥ चले भागि कपि भालु भवानी । बिकल पुकारत आरत बानी ॥

यह देखकर रीछ-वानरोंके झुंड ऐसे भागे जैसे भेंड़ियेको देखकर भेंड़ोंके झुंड। [शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! वानर-भालू व्याकुल होकर आर्तवाणीसे पुकारते हुए भाग चले ॥ १ ॥

यह निसिचर दुकाल सम अहई । कपिकुल देस परन अब चहई ॥ कृपा बारिधर राम खरारी । पाहि पाहि प्रनतारति हारी ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८३१

[वे कहने लगे—] यह राक्षस दुर्भिक्षके समान है, जो अब वानरकुलरूपी देशमें पड़ना चाहता है। हे कृपारूपी जलके धारण करनेवाले मेघरूप श्रीराम! हे खरके शत्रु! हे शरणागतके दुःख हरनेवाले! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये!! २ ॥

सकरुन बचन सुनत भगवाना। चले सुधारि सरासन बाना ॥ राम सेन निज पाछें घाली। चले सकोप महा बलसाली ॥

करुणाभरे वचन सुनते ही भगवान् धनुष-बाण सुधारकर चले। महाबलशाली श्रीरामजीने सेनाको अपने पीछे कर लिया और वे [अकेले] क्रोधपूर्वक चले (आगे बढ़े) ॥ ३ ॥

खैँचि धनुष सर सत संधाने। छूटे तीर सरीर समाने ॥ लागत सर धावा रिस भरा। कुधर डगमगत डोलति धरा ॥

उन्होंने धनुषको खींचकर सौ बाण सन्धान किये। बाण छूटे और उसके शरीरमें समा गये। बाणोंके लगते ही वह क्रोधमें भरकर दौड़ा। उसके दौड़नेसे पर्वत डगमगाने लगे और पृथ्वी हिलने लगी ॥ ४ ॥

लीन्ह एक तेहिँ सैल उपाटी। रघुकुलतिलक भुजा सोड़ काटी ॥ धावा बाम बाहु गिरि धारी। प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी ॥

उसने एक पर्वत उखाड़ लिया। रघुकुलतिलक श्रीरामजीने उसकी वह भुजा ही काट दी। तब वह बायें हाथमें पर्वतको लेकर दौड़ा। प्रभुने उसकी वह भुजा भी काटकर पृथ्वीपर गिरा दी ॥ ५ ॥

काटें भुजा सोह खल कैसा। पच्छहीन मंदर गिरि जैसा ॥ उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका। ग्रसन चहत मानहुँ त्रैलोका ॥

भुजाओंके कट जानेपर वह दुष्ट कैसी शोभा पाने लगा, जैसे बिना पंखका मन्दराचल पहाड़ हो। उसने उग्र दृष्टिसे प्रभुको देखा। मानो तीनों लोकोंको निगल जाना चाहता हो ॥ ६ ॥

दो०— करि चिवकार घोर अति धावा बदनु पसारि।

गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि ॥ ७० ॥

वह बड़े जोरसे चिघाड़ करके मुँह फैलाकर दौड़ा। आकाशमें सिद्ध और देवता डरकर हा! हा! इस प्रकार पुकारने लगे ॥ ७० ॥

सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो ॥ बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ ॥

करुणानिधान भगवान्ने देवताओंको भयभीत जाना। तब उन्होंने धनुषको कानतक तानकर राक्षसके मुखको बाणोंके समूहसे भर दिया। तो भी वह महाबली पृथ्वीपर न गिरा ॥ १ ॥

८४०

  • रामचरितमानस *

सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा । काल त्रोन सजीव जनु आवा ॥ तब प्रभु कोपि तीव्र सर लीन्हा । धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा ॥

मुखमें बाण भरे हुए वह [प्रभुके] सामने दौड़ा। मानो कालरूपी सजीव तरकस ही आ रहा हो। तब प्रभुने क्रोध करके तीक्ष्ण बाण लिया और उसके सिरको धड़से अलग कर दिया ॥ २ ॥

सो सिर परेउ दसानन आगें । बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें ॥ धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा । तब प्रभु काटि कीन्ह दुड़ खंडा ॥

वह सिर रावणके आगे जा गिरा। उसे देखकर रावण ऐसा व्याकुल हुआ जैसे मणिके छूट जानेपर सर्प। कुम्भकर्णका प्रचण्ड धड़ दौड़ा, जिससे पृथ्वी धँसी जाती थी। तब प्रभुने काटकर उसके दो टुकड़े कर दिये ॥ ३ ॥

परे भूमि जिमि नभ तें भूधर । हेठ दाबि कपि भालु निसाचर ॥ तासु तेज प्रभु बदन समाना । सुर मुनि सबहिं अचंभव माना ॥

वानर-भालू और निशाचरोंको अपने नीचे दबाते हुए वे दोनों टुकड़े पृथ्वीपर ऐसे पड़े जैसे आकाशसे दो पहाड़ गिरे हों। उसका तेज प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके मुखमें समा गया। [यह देखकर] देवता और मुनि सभीने आश्चर्य माना ॥ ४ ॥

सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं । अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं ॥ करि बिनती सुर सकल सिधाए । तेही समय देवरिषि आए ॥

देवता नगाड़े बजाते, हर्षित होते और स्तुति करते हुए बहुत-से फूल बरसा रहे हैं। विनती करके सब देवता चले गये। उसी समय देवर्षि नारद आये ॥ ५ ॥

गगनोपरि हरि गुन गन गाए । रुचिर बीररस प्रभु मन भाए ॥ बेगि हतहु खल कहि मुनि गए । राम समर महि सोभत भए ॥

आकाशके ऊपरसे उन्होंने श्रीहरिके सुन्दर वीररसयुक्त गुणसमूहका गान किया, जो प्रभुके मनको बहुत ही भाया। मुनि यह कहकर चले गये कि अब दुष्ट रावणको शीघ्र मारिये। [उस समय] श्रीरामचन्द्रजी रणभूमिमें आकर [अत्यन्त] सुशोभित हुए ॥ ६ ॥

छं०—संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी । श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी ॥ भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने । कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने ॥

  • लङ्काकाण्ड *

८४१

अतुलनीय बलवाले कोसलपति श्रीरघुनाथजी रणभूमिमें सुशोभित हैं। मुखपर पसीनेकी बूँदें हैं, कमलके समान नेत्र कुछ लाल हो रहे हैं। शरीरपर रक्तके कण हैं, दोनों हाथोंसे धनुष-बाण फिरा रहे हैं। चारों ओर रीछ-वानर सुशोभित हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभुकी इस छबिका वर्णन शेषजी भी नहीं कर सकते जिनके बहुत-से (हजार) मुख हैं।

दो०— निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम।

गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम ॥ ७१ ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे गिरिजे! कुम्भकर्ण, जो नीच राक्षस और पापकी खान था, उसे भी श्रीरामजीने अपना परमधाम दे दिया! अतः वे मनुष्य [निश्चय ही] मन्दबुद्धि हैं जो उन श्रीरामजीको नहीं भजते ॥ ७१ ॥

दिन के अंत फिरीं द्वौ अनी । समर भई सुभटन्ह श्रम घनी ॥ राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा । जिमि तून पाइ लाग अति डाढ़ा ॥

दिनका अन्त होनेपर दोनों सेनाएँ लौट पड़ीं। [आजके युद्धमें] योद्धाओंको बड़ी थकावट हुई; परन्तु श्रीरामजीकी कृपासे वानरसेनाका बल उसी प्रकार बढ़ गया जैसे घास पाकर अग्नि बहुत बढ़ जाती है ॥ १ ॥

छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती । निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती ॥ बहु बिलाप दसकंधर करई । बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई ॥

उधर राक्षस दिन-रात इस प्रकार घटते जा रहे हैं जिस प्रकार अपने ही मुखसे कहनेपर पुण्य घट जाते हैं। रावण बहुत विलाप कर रहा है। बार-बार भाई (कुम्भकर्ण) का सिर कलेजेसे लगाता है ॥ २ ॥

रोवहिं नारि हृदय हति पानी । तासु तेज बल बिपुल बखानी ॥ मेघनाद तेहि अवसर आयउ । कहि बहु कथा पिता समुझायउ ॥

स्त्रियाँ उसके बड़े भारी तेज और बलको बखान करके हाथोंसे छाती पीट-पीटकर रो रही हैं। उसी समय मेघनाद आया और उसने बहुत-सी कथाएँ कहकर पिताको समझाया ॥ ३ ॥

देखेहु कालि मोरि मनुसाई । अबहिं बहुत का करौं बड़ाई ॥ इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ । सो बल तात न तोहि देखायउँ ॥

[और कहा—] कल मेरा पुरुषार्थ देखियेगा। अभी बहुत बड़ाई क्या करूँ? हे तात! मैंने अपने इष्टदेवसे जो बल और रथ पाया था वह बल [और रथ] अबतक आपको नहीं दिखलाया था ॥ ४ ॥

एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना । चहुँ दुआर लागे कपि नाना ॥ इत कपि भालु काल सम बीरा । उत रजनीचर अति रनधीरा ॥

८४२

  • रामचरितमानस *

इस प्रकार डींग मारते हुए सबेरा हो गया। लंकाके चारों दरवाजोंपर बहुत-से वानर आ डटे। इधर कालके समान वीर वानर-भालू हैं और उधर अत्यन्त रणधीर राक्षस ॥ ५ ॥

लरहिं सुभट निज निज जय हेतू । बरनि न जाइ समर खगकेतू ॥

दोनों ओरके योद्धा अपनी-अपनी जयके लिये लड़ रहे हैं। हे गरुड़! उनके युद्धका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ६ ॥

दो०—मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास ।

गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास ॥ ७२ ॥

मेघनाद उसी (पूर्वोक्त) मायामय रथपर चढ़कर आकाशमें चला गया और अट्टहास करके गरजा, जिससे वानरोंकी सेनामें भय छा गया ॥ ७२ ॥

सक्ति सूल तरवारि कृपाना । अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना ॥ डारइ परसु परिघ पाषाना । लागेउ बृष्टि करै बहु बाना ॥

वह शक्ति, शूल, तलवार, कृपाण आदि अस्त्र, सस्त्र एवं वज्र आदि बहुत-से आयुध चलाने तथा फरसे, परिघ, पत्थर आदि डालने और बहुत-से बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥ १ ॥

दस दिसि रहे बान नभ छाई । मानहुँ मघा मेघ झरि लाई ॥ धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना । जो मारइ तेहि कोउ न जाना ॥

आकाशमें दसों दिशाओंमें बाण छा गये, मानो मघा नक्षत्रके बादलोंने झड़ी लगा दी हो। 'पकड़ो, पकड़ो, मारो' ये शब्द कानोंसे सुनायी पड़ते हैं। पर जो मार रहा है उसे कोई नहीं जान पाता ॥ २ ॥

गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं । देखहिं तेहि न दुखित फिरि आवहिं ॥ अवघट घाट बाट गिरि कंदर । माया बल कीन्हेसि सर पंजर ॥

पर्वत और वृक्षोंको लेकर वानर आकाशमें दौड़कर जाते हैं। पर उसे देख नहीं पाते, इससे दुखी होकर लौट आते हैं—मेघनादने मायाके बलसे अटपटी घाटियों, रास्तों और पर्वत-कन्दराओंको बाणोंके पिंजरे बना दिये (बाणोंसे छा दिया) ॥ ३ ॥

जाहिं कहाँ व्याकुल भए बंदर । सुरपति बंदि परे जनु मंदर ॥ मारुतसुत अंगद नल नीला । कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला ॥

अब कहाँ जायँ, यह सोचकर (रास्ता न पाकर) वानर व्याकुल हो गये। मानो पर्वत इन्द्रकी कैदमें पड़े हों। मेघनादने मारुति हनुमान्, अंगद, नल और नील आदि सभी बलवानोंको व्याकुल कर दिया ॥ ४ ॥