सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 828, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 828

८२६

  • रामचरितमानस *

रावणने उसको सारा मर्म (हाल) बतलाया। कालनेमिने सुना और बार-बार सिर पीटा (खेद प्रकट किया)। [उसने कहा—] तुम्हारे देखते-देखते जिसने नगर जला डाला, उसका मार्ग कौन रोक सकता है? ॥ २ ॥

भजु रघुपति करु हित आपना । छाँड़हु नाथ मूषा जल्पना ॥ नील कंज तनु सुंदर स्यामा । हृदयँ राखु लोचनाभिरामा ॥

श्रीरघुनाथजीका भजन करके तुम अपना कल्याण करो। हे नाथ! झूठी बकवाद छोड़ दो। नेत्रोंको आनन्द देनेवाले नीलकमलके समान सुन्दर श्याम शरीरको अपने हृदयमें रखो ॥ ३ ॥

मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू । महा मोह निस्ति सूतत जागू ॥ काल ब्याल कर भच्छक जोई । सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई ॥

मैं-तू (भेद-भाव) और ममतारूपी मूढ़ताको त्याग दो। महामोह (अज्ञान)-रूपी रात्रिमें सो रहे हो, सो जाग उठो। जो कालरूपी सर्पका भी भक्षक है, कहीं स्वप्नमें भी वह रणमें जीता जा सकता है? ॥ ४ ॥

दो०— सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार ।

राम दूत कर मरौँ बरु यह खल रत मल भार ॥ ५६ ॥

उसकी ये बातें सुनकर रावण बहुत ही क्रोधित हुआ। तब कालनेमिने मनमें विचार किया कि [इसके हाथसे मरनेकी अपेक्षा] श्रीरामजीके दूतके हाथसे ही मरूँ तो अच्छा है। यह दुष्ट तो पापसमूहमें रत है ॥ ५६ ॥

अस कहि चला रचिसि मग माया । सर मंदिर बर बाग बनाया ॥ मारुतसुत देखा सुभ आश्रम । मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम ॥

वह मन-ही-मन ऐसा कहकर चला और उसने मार्गमें माया रची। तालाब, मन्दिर और सुन्दर बाग बनाया। हनुमान्जीने सुन्दर आश्रम देखकर सोचा कि मुनिसे पूछकर जल पी लूँ, जिससे थकावट दूर हो जाय ॥ १ ॥

राच्छस कपट बेष तहाँ सोहा । मायापति दूतहि चह मोहा ॥ जाइ पवनसुत नायउ माथा । लाग सो कहै राम गुन गाथा ॥

राक्षस वहाँ कपट [से मुनि] का वेष बनाये विराजमान था। वह मूर्ख अपनी मायासे मायापतिके दूतको मोहित करना चाहता था। मारुतिने उसके पास जाकर मस्तक नवाया। वह श्रीरामजीके गुणोंकी कथा कहने लगा ॥ २ ॥

होत महा रन रावन रामहिं । जितिहिं राम न संसय या महिं ॥ इहाँ भएँ मैं देखउँ भाई । ग्यानदृष्टि बल मोहि अधिकाई ॥