श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 819, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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गए जानि अंगद हनुमाना । फिरे भालु मर्कट भट नाना ॥ जातुधान प्रदोष बल पाई । धाए करि दससीस दोहाई ॥
अङ्गद और हनुमान्को गये जानकर सभी भालू और वानर वीर लौट पड़े । राक्षसोंने प्रदोष (सायं) कालका बल पाकर रावणकी दुहाई देते हुए वानरोंपर धावा किया ॥ २ ॥
निसिचर अनी देखि कपि फिरे । जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे ॥ द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी । लरत सुभट नहिं मानहिं हारी ॥
राक्षसोंकी सेना आती देखकर वानर लौट पड़े और वे योद्धा जहाँ-तहाँ कटकटाकर भिड़ गये । दोनों ही दल बड़े बलवान् हैं । योद्धा ललकार-ललकारकर लड़ते हैं, कोई हार नहीं मानते ॥ ३ ॥
महाबीर निसिचर सब कारे । नाना बरन बलीमुख भारे ॥ सबल जुगल दल समबल जोधा । कौतुक करत लरत करि क्रोधा ॥
सभी राक्षस महान् वीर और अत्यन्त काले हैं और वानर विशालकाय तथा अनेकों रंगोंके हैं । दोनों ही दल बलवान् हैं और समान बलवाले योद्धा हैं । वे क्रोध करके लड़ते हैं और खेल करते (वीरता दिखलाते) हैं ॥ ४ ॥
प्राबिट सरद पयोद घनैरे । लरत मनहु मारुत के प्रैरे ॥ अनिप अकंपन अरु अतिकाया । बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया ॥
[राक्षस और वानर युद्ध करते हुए ऐसे जान पड़ते हैं] मानो क्रमशः वर्षा और शरद-ऋतुके बहुत-से बादल पवनसे प्रेरित होकर लड़ रहे हों । अकंपन और अतिकाय इन सेनापतियोंने अपनी सेनाको विचलित होते देखकर माया की ॥ ५ ॥
भयउ निमिष महँ अति अँधिआरा । बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा ॥
पलभरमें अत्यन्त अन्धकार हो गया । खून, पत्थर और राखकी वर्षा होने लगी ॥ ६ ॥
दो०—देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार ।
एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार ॥ ४६ ॥
दसों दिशाओंमें अत्यन्त घना अन्धकार देखकर वानरोंकी सेनामें खलबली पड़ गयी । एकको एक (दूसरा) नहीं देख सकता और सब जहाँ-तहाँ पुकार कर रहे हैं ॥ ४६ ॥
सकल मरमु रघुनायक जाना । लिए बोलि अंगद हनुमाना ॥ समाचार सब कहि समुझाए । सुनत कोपि कपिकुंजर धाए ॥
श्रीरघुनाथजी सब रहस्य जान गये । उन्होंने अङ्गद और हनुमान्को बुला लिया और सब समाचार कहकर समझाया । सुनते ही वे दोनों कपिश्रेष्ठ क्रोध करके दौड़े ॥ १ ॥