श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 818, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
महा महा मुखिआ जे पावहिं । ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं ॥ कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा । देहिं राम तिन्हहू निज धामा ॥
जिन बड़े-बड़े मुखियों (प्रधान सेनापतियों)-को पकड़ पाते हैं उनके पैर पकड़कर उन्हें प्रभुके पास फेंक देते हैं। विभीषणजी उनके नाम बतलाते हैं और श्रीरामजी उन्हें भी अपना धाम (परम पद) दे देते हैं ॥१॥
खल मनुजाद द्विजामिष भोगी । पावहिं गति जो जाचत जोगी । उमा राम मृदुचित करुनाकर । बयर भाव सुमिरत मोहि निस्चर ॥
ब्राह्मणोंका मांस खानेवाले वे नरभोजी दुष्ट राक्षस भी वह परम गति पाते हैं जिसकी योगी भी याचना किया करते हैं [परन्तु सहजमें नहीं पाते] । [शिवजी कहते हैं—] हे उमा ! श्रीरामजी बड़े ही कोमलहृदय और करुणाकी खान हैं । [वे सोचते हैं कि] राक्षस मुझे वैरभावसे ही सही, स्मरण तो करते ही हैं ॥२॥
देहिं परम गति सो जियँ जानी । अस कृपाल को कहहु भवानी ॥ अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी । नर मतिमंद ते परम अभागी ॥
ऐसा हृदयमें जानकर वे उन्हें परमगति (मोक्ष) देते हैं। हे भवानी ! कहो तो ऐसे कृपालु [और] कौन हैं ? प्रभुका ऐसा स्वभाव सुनकर भी जो मनुष्य भ्रम त्यागकर उनका भजन नहीं करते, वे अत्यन्त मन्दबुद्धि और परम भाग्यहीन हैं ॥३॥
अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा । कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा ॥ लंका द्वौ कपि सोहहिं कैसें । मथहिं सिंधु दुड़ मंदर जैसें ॥
श्रीरामजीने कहा कि अङ्गद और हनुमान् किलेमें घुस गये हैं। दोनों वानर लङ्कामें [विध्वंस करते] कैसे शोभा देते हैं, जैसे दो मन्दराचल समुद्रको मथ रहे हों ॥४॥
दो०— भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत । कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहाँ भगवंत ॥४५॥
भुजाओंके बलसे शत्रुकी सेनाको कुचलकर और मसलकर, फिर दिनका अन्त होता देखकर हनुमान् और अङ्गद दोनों कूद पड़े और श्रम (थकावट) रहित होकर वहाँ आ गये जहाँ भगवान् श्रीरामजी थे ॥४५॥
प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए । देखि सुभट रघुपति मन भाए ॥ राम कृपा करि जुगल निहारे । भए बिगतश्रम परम सुखारे ॥
उन्होंने प्रभुके चरणकमलोंमें सिर नवाये। उत्तम योद्धाओंको देखकर श्रीरघुनाथजी मनमें बहुत प्रसन्न हुए। श्रीरामजीने कृपा करके दोनोंको देखा, जिससे वे श्रमरहित और परम सुखी हो गये ॥१॥