श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 884, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
बरुन कुबेर सुरेस समीरा । रन सन्मुख धरि काहूँ न धीरा ॥ भुजबल जितेहु काल जम साईं । आजु परेहु अनाथ की नाईं ॥
वरुण, कुबेर, इन्द्र और वायु, इनमेंसे किसीने भी रणमें तुम्हारे सामने धैर्य धारण नहीं किया। हे स्वामी! तुमने अपने भुजबलसे काल और यमराजको भी जीत लिया था। वही तुम आज अनाथकी तरह पड़े हो ॥४॥
जगत बिदित तुम्हारी प्रभुताईं । सुत परिजन बल बरनि न जाईं ॥ राम बिमुख अस हाल तुम्हारा । रहा न कोउ कुल रोवनिहारा ॥
तुम्हारी प्रभुता जगत्भरमें प्रसिद्ध है। तुम्हारे पुत्रों और कुटुम्बियोंके बलका हाय! वर्णन ही नहीं हो सकता। श्रीरामचन्द्रजीके विमुख होनेसे ही तुम्हारी ऐसी दुर्दशा हुई कि आज कुलमें कोई रोनेवाला भी न रह गया ॥५॥
तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा । सभय दिसिप नित नावहिं माथा ॥ अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं । राम बिमुख यह अनुचित नाहीं ॥
हे नाथ! विधाताकी सारी सृष्टि तुम्हारे वशमें थी। लोकपाल सदा भयभीत होकर तुमको मस्तक नवाते थे। किन्तु हाय! अब तुम्हारे सिर और भुजाओंको गीदड़ खा रहे हैं। रामविमुखके लिये ऐसा होना अनुचित भी नहीं है (अर्थात् उचित ही है) ॥६॥
काल बिबस पति कहा न माना । अग जग नाथु मनुज करि जाना ॥
हे पति! कालके पूर्ण वशमें होनेसे तुमने [किसीका] कहना नहीं माना और चराचरके नाथ परमात्माको मनुष्य करके जाना ॥७॥
छं०—जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं । जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं ॥ आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं । तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं ॥
दैत्यरूपी वनको जलानेके लिये अग्निस्वरूप साक्षात् श्रीहरिको तुमने मनुष्य करके जाना। शिव और ब्रह्मा आदि देवता जिनको नमस्कार करते हैं, उन करुणामय भगवान्को हे प्रियतम! तुमने नहीं भजा। तुम्हारा यह शरीर जन्मसे ही दूसरोंसे द्रोह करनेमें तत्पर तथा पापसमूहमय रहा! इतनेपर भी जिन निर्विकार ब्रह्म श्रीरामजीने तुमको अपना धाम दिया, उनको मैं नमस्कार करती हूँ।
दो०—अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन । जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान ॥ १०४ ॥