श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 885, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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अहह! नाथ! श्रीरघुनाथजीके समान कृपाका समुद्र दूसरा कोई नहीं है, जिन भगवान्ने तुमको वह गति दी जो योगिसमाजको भी दुर्लभ है ॥ १०४ ॥
मन्दोदरी बचन सुनि काना । सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना ॥ अज मेहस नारद सनकादी । जे मुनिबर परमारथबादी ॥
मन्दोदरीके वचन कानोंसे सुनकर देवता, मुनि और सिद्ध सभीने सुख माना। ब्रह्मा, महादेव, नारद और सनकादि तथा और भी जो परमार्थवादी (परमात्माके तत्त्वको जानने और कहनेवाले) श्रेष्ठ मुनि थे ॥ १ ॥
भरि लोचन रघुपतिहि निहारी । प्रेम मगन सब भए सुखारी ॥ रुदन करत देखीं सब नारी । गयउ बिभीषनु मन दुख भारी ॥
वे सभी श्रीरघुनाथजीको नेत्र भरकर निरखकर प्रेममग्न हो गये और अत्यन्त सुखी हुए। अपने घरकी सब स्त्रियोंको रोती हुई देखकर विभीषणजीके मनमें बड़ा भारी दुःख हुआ और वे उनके पास गये ॥ २ ॥
बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा । तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा ॥ लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो । बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो ॥
उन्होंने भाईकी दशा देखकर दुःख किया। तब प्रभु श्रीरामजीने छोटे भाईको आज्ञा दी [कि जाकर विभीषणको धैर्य बँधाओ]। लक्ष्मणजीने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया तब विभीषण प्रभुके पास लौट आये ॥ ३ ॥
कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका । करहु क्रिया परिहरि सब सोका ॥ कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी । बिधिवत देस काल जियँ जानी ॥
प्रभुने उनको कृपापूर्ण दृष्टिसे देखा [और कहा—] सब शोक त्यागकर रावणकी अन्त्येष्टि क्रिया करो। प्रभुकी आज्ञा मानकर और हृदयमें देश और कालका विचार करके विभीषणजीने विधिपूर्वक सब क्रिया की ॥ ४ ॥
दो०—मन्दोदरी आदि सब देड़ तिलांजलि ताहि।
भवन गई रघुपति गुन गन बरनत मन माहि ॥ १०५ ॥
मन्दोदरी आदि सब स्त्रियाँ उसे (रावणको) तिलाञ्जलि देकर मनमें श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका वर्णन करती हुई महलको गयीं ॥ १०५ ॥
आड़ बिभीषन पुनि सिरु नायो । कृपासिंधु तब अनुज बोलायो ॥ तुम्ह कपीस अंगद नल नीला । जामवंत मारुति नयसीला ॥ सब मिलि जाहु बिभीषन साथा । सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा ॥ पिता बचन मैं नगर न आवउँ । आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ ॥