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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 887, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 887
  • लङ्काकाण्ड *

८८५

तब हनुमंत नगर महुँ आए । सुनि निसिचरी निसाचर धाए ॥ बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही । जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही ॥

तब हनुमान्जी नगरमें आये । यह सुनकर राक्षस-राक्षसी [उनके सत्कारके लिये] दौड़े । उन्होंने बहुत प्रकारसे हनुमान्जीकी पूजा की और फिर श्रीजानकीजीको दिखला दिया ॥ २ ॥

दूरिहि ते प्रनाम कपि कीन्हा । रघुपति दूत जानकी चीन्हा ॥ कहहु तात प्रभु कृपानिकेता । कुसल अनुज कपि सेन समेता ॥

हनुमान्जीने [सीताजीको] दूरसे ही प्रणाम किया । जानकीजीने पहचान लिया कि यह वही श्रीरघुनाथजीका दूत है [और पूछा—] हे तात! कहो, कृपाके धाम मेरे प्रभु छोटे भाई और वानरोंकी सेनासहित कुशलसे तो हैं ? ॥ ३ ॥

सब बिधि कुसल कोसलाधीसा । मातु समर जीत्यो दससीसा ॥ अबिचल राजु बिभीषण पायो । सुनि कपि बचन हरष उर छायो ॥

[हनुमान्जीने कहा—] हे माता! कोसलपति श्रीरामजी सब प्रकारसे सकुशल हैं । उन्होंने संग्राममें दस सिरवाले रावणको जीत लिया है और विभीषणने अचल राज्य प्राप्त किया है । हनुमान्जीके वचन सुनकर सीताजीके हृदयमें हर्ष छा गया ॥ ४ ॥

छं०—अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा । का देउँ तोहि त्रैलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा ॥ सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं । रन जीति रिपुदल बंधु जूत पस्यामि राममनामयं ॥

श्रीजानकीजीके हृदयमें अत्यन्त हर्ष हुआ । उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [आनन्दाश्रुओंका] जल छा गया । वे बार-बार कहती हैं—हे हनुमान्! मैं तुझे क्या दूँ? इस वाणी (समाचार) के समान तीनों लोकोंमें और कुछ भी नहीं है! [हनुमान्जीने कहा—] हे माता! सुनिये, मैंने आज निःसन्देह सारे जगत्का राज्य पा लिया, जो मैं रणमें शत्रुसेनाको जीतकर भाईसहित निर्विकार श्रीरामजीको देख रहा हूँ ।

दो०—सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत । सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत ॥ १०७ ॥

[जानकीजीने कहा—] हे पुत्र! सुन, समस्त सदगुण तेरे हृदयमें बसें और हे हनुमान्! शेष (लक्ष्मणजी) सहित कोसलपति प्रभु सदा तुझपर प्रसन्न रहें ॥ १०७ ॥

अब सोड़ जतन करहु तुम्ह ताता । देखौँ नयन स्याम मृदु गाता ॥ तब हनुमान राम पहिं जाई । जनकसुता कै कुसल सुनाई ॥