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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 888, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 888

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  • रामचरितमानस *

हे तात! अब तुम वही उपाय करो जिससे मैं इन नेत्रोंसे प्रभुके कोमल श्याम शरीरके दर्शन करूँ। तब श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर हनुमान्जीने जानकीजीका कुशल-समाचार सुनाया ॥ १ ॥

सुनि संदेसु भानुकुलभूषण । बोलि लिए जुबराज बिभीषण ॥ मारुतसुत के संग सिधावहु । सादर जनकसुतहि लै आवहु ॥

सूर्यकुलभूषण श्रीरामजीने सन्देश सुनकर युवराज अंगद और विभीषणको बुला लिया [और कहा—] पवनपुत्र हनुमान्के साथ जाओ और जानकीको आदरके साथ ले आओ ॥ २ ॥

तुरतहिं सकल गए जहाँ सीता । सेवहिं सब निसिचरीं बिनीता ॥ बेगि बिभीषण तिन्हहि सिखायो । तिन्ह बहु बिधि मज्जन करवायो ॥

वे सब तुरंत ही वहाँ गये जहाँ सीताजी थीं। सब-की-सब राक्षसियाँ नम्रतापूर्वक उनकी सेवा कर रही थीं। विभीषणजीने शीघ्र ही उन लोगोंको समझा दिया। उन्होंने बहुत प्रकारसे सीताजीको स्नान कराया, ॥ ३ ॥

बहु प्रकार भूषण पहिराए । सिबिका रुचिर साजि पुनि ल्याए ॥ ता पर हरषि चढ़ी बैदेही । सुमिरि राम सुखधाम सनेही ॥

बहुत प्रकारके गहने पहनाने और फिर वे एक सुन्दर पालकी सजाकर ले आये। सीताजी प्रसन्न होकर सुखके धाम प्रियतम श्रीरामजीका स्मरण करके उसपर हर्षके साथ चढ़ीं ॥ ४ ॥

बेतपानि रच्छक चहु पासा । चले सकल मन परम हुलासा ॥ देखन भालु कीस सब आए । रच्छक कोपि निवारन धाए ॥

चारों ओर हाथोंमें छड़ी लिये रक्षक चले। सबके मनोंमें परम उल्लास (उमंग) है। रीछ-वानर सब दर्शन करनेके लिये आये, तब रक्षक क्रोध करके उनको रोकने दौड़े ॥ ५ ॥

कह रघुबीर कहा मम मानहु । सीतहि सखा पयादें आनहु ॥ देखहुँ कपि जननी की नाई । बिहसि कहा रघुनाथ गोसाई ॥

श्रीरघुवीरने कहा—हे मित्र! मेरा कहना मानो और सीताको पैदल ले आओ, जिससे वानर उसको माताकी तरह देखें। गोसाई श्रीरामजीने हँसकर ऐसा कहा ॥ ६ ॥

सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे । नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे ॥ सीता प्रथम अनल महुँ राखी । प्रगट कीन्हि चह अंतर सारखी ॥

प्रभुके वचन सुनकर रीछ-वानर हर्षित हो गये। आकाशसे देवताओंने बहुत-से फूल बरसाये। सीताजी [के असली स्वरूप] को पहले अग्निमें रखा था। अब भीतरके साक्षी भगवान् उनको प्रकट करना चाहते हैं ॥ ७ ॥