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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 893, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 893
  • लङ्काकाण्ड *

८११

अनवद्य अखंड न गोचर गो । सब रूप सदा सब होइ न गो ॥

इति बेद बर्दति न दंतकथा । रवि आतप भिन्नमभिन्न जथा ॥ ८ ॥

आप अनिच्छ या दोषरहित हैं, अखण्ड हैं, इन्द्रियोंके विषय नहीं हैं। सदा सर्वरूप होते हुए भी आप वह सब कभी हुए ही नहीं, ऐसा वेद कहते हैं। यह [कोई] दंतकथा (कोरी कल्पना) नहीं है। जैसे सूर्य और सूर्यका प्रकाश अलग-अलग हैं और अलग नहीं भी हैं, वैसे ही आप भी संसारसे भिन्न तथा अभिन्न दोनों ही हैं ॥ ८ ॥

कृतकृत्य बिभो सब बानर ए । निरखंति तवानन सादर ए ॥

धिग जीवन देव सरीर हरे । तव भक्ति बिना भव भूलि परे ॥ ९ ॥

हे व्यापक प्रभो! ये सब वानर कृतार्थरूप हैं, जो आदरपूर्वक ये आपका मुख देख रहे हैं। [और] हे हरे! हमारे [अमर] जीवन और देव (दिव्य) शरीरको धिक्कार है, जो हम आपकी भक्तिसे रहित हुए संसारमें (सांसारिक विषयोंमें) भूले पड़े हैं ॥ ९ ॥

अब दीनदयाल दया करिए । मति मोरि बिभेदकरी हरिए ॥

जेहि ते बिपरीत क्रिया करिए । दुख सो सुख मानि सुखी चरिए ॥ १० ॥

हे दीनदयाल! अब दया कीजिये और मेरी उस विभेद उत्पन्न करनेवाली बुद्धिको हर लीजिये, जिससे मैं विपरीत कर्म करता हूँ और जो दुःख है, उसे सुख मानकर आनन्दसे विचरता हूँ ॥ १० ॥

खल खंडन मंडन रम्य छमा । पद पंकज सेवित संभु उमा ॥

नृप नायक दे बरदानमिंदं । चरनांबुज प्रेमु सदा सुभदं ॥ ११ ॥

आप दुष्टोंका खण्डन करनेवाले और पृथ्वीके रमणीय आभूषण हैं। आपके चरणकमल श्रीशिव-पार्वतीद्वारा सेवित हैं। हे राजाओंके महाराज! मुझे यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलोंमें सदा मेरा कल्याणदायक [अनन्य] प्रेम हो ॥ ११ ॥

दो०—बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात।

सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात ॥ १११ ॥

इस प्रकार ब्रह्माजीने अत्यन्त प्रेम-पुलकित शरीरसे विनती की। शोभाके समुद्र श्रीरामजीके दर्शन करते-करते उनके नेत्र तूस ही नहीं होते थे ॥ १११ ॥

तेहि अवसर दसरथ तहाँ आए । तनय बिलोकि नयन जल छाए ॥

अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा । आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा ॥

उसी समय दशरथजी वहाँ आये। पुत्र (श्रीरामजी) को देखकर उनके नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल छा गया। छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित प्रभुने उनकी वन्दना की और तब पिताने उनको आशीर्वाद दिया ॥ १ ॥