श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 894, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ । जीत्यों अजय निसाचर राऊ ॥ सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी । नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी ॥
[श्रीरामजीने कहा—] हे तात! यह सब आपके पुण्योंका प्रभाव है, जो मैंने अजेय राक्षसराजको जीत लिया। पुत्रके वचन सुनकर उनकी प्रीति अत्यन्त बढ़ गयी। नेत्रोंमें जल छा गया और रोमावली खड़ी हो गयी ॥ २ ॥
रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना । चितइ पितहि दीन्हेउ दूढ़ ग्याना ॥ ताते उमा मोच्छ नहीं पायो । दसरथ भेद भगति मन लायो ॥
श्रीरघुनाथजीने पहलेके (जीवित कालके) प्रेमको विचारकर, पिताकी ओर देखकर ही उन्हें अपने स्वरूपका दूढ़ ज्ञान करा दिया। हे उमा! दशरथजीने भेद-भक्तिमें अपना मन लगाया था, इसीसे उन्होंने [कैवल्य] मोक्ष नहीं पाया ॥ ३ ॥
सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं । तिन्ह कहूं राम भगति निज देहीं ॥ बार बार करि प्रभुहि प्रनामा । दसरथ हरषि गए सुरधामा ॥
[मायारहित सच्चिदानन्दमय स्वरूपभूत दिव्यगुणयुक्त] सगुणस्वरूपकी उपासना करनेवाले भक्त इस प्रकारका मोक्ष लेते भी नहीं। उनको श्रीरामजी अपनी भक्ति देते हैं। प्रभुको [इष्टबुद्धिसे] बार-बार प्रणाम करके दशरथजी हर्षित होकर देवलोकको चले गये ॥ ४ ॥
दो०—अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस।
सोभा देखि हरषि मन अस्तुति कर सुर ईस ॥ ११२ ॥
छोटे भाई लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित परम कुशल प्रभु श्रीकोसलाधीशकी शोभा देखकर देवराज इन्द्र मनमें हर्षित होकर स्तुति करने लगे— ॥ ११२ ॥
छं०—जय राम सोभा धाम । दायक प्रनत बिश्राम ॥
धृत त्रोन बर सर चाप । भुजदंड प्रबल प्रताप ॥ १ ॥
शोभाके धाम, शरणागतको विश्राम देनेवाले, श्रेष्ठ तरकस, धनुष और बाण धारण किये हुए, प्रबल प्रतापी भुजदण्डोंवाले श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो! ॥ १ ॥
जय दूषनारि खरारि । मर्दन निसाचर धारि ॥
यह दुष्ट मारेउ नाथ । भए देव सकल सनाथ ॥ २ ॥
हे खर और दूषणके शत्रु और राक्षसोंकी सेनाके मर्दन करनेवाले! आपकी जय हो! हे नाथ! आपने इस दुष्टको मारा, जिससे सब देवता सनाथ (सुरक्षित) हो गये ॥ २ ॥
जय हरन धरनी भार । महिमा उदार अपार ॥
जय रावनारि कृपाल । किए जातुधान बिहाल ॥ ३ ॥