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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 897, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 897
  • लङ्काकाण्ड *

८१५

श्रीरामचन्द्रजीके समान दीनोंका हित करनेवाला कौन है? जिन्होंने सारे राक्षसोंको मुक्त कर दिया! दुष्ट, पापोंके घर और कामी रावणने भी वह गति पायी जिसे श्रेष्ठ मुनि भी नहीं पाते ॥ ५ ॥

दो०—सुमन बरषि सब सुर चले चढ़ि चढ़ि रुचिर बिमान ।

देखि सुअवसर प्रभु पहिं आयउ संभु सुजान ॥ ११४ ( क ) ॥

फूलोंकी वर्षा करके सब देवता सुन्दर विमानोंपर चढ़-चढ़कर चले। तब सुअवसर जानकर सुजान शिवजी प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके पास आये— ॥ ११४ ( क ) ॥

परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि ।

पुलकित तन गदगद गिराँ बिनय करत त्रिपुरारि ॥ ११४ ( ख ) ॥

और परम प्रेमसे दोनों हाथ जोड़कर, कमलके समान नेत्रोंमें जल भरकर, पुलकित शरीर और गदगद वाणीसे त्रिपुरारि शिवजी विनती करने लगे— ॥ ११४ ( ख ) ॥

छं०—मामभिरक्षय रघुकुल नायक । धृत बर चाप रुचिर कर सायक ॥

मोह महा घन पटल प्रभंजन । संसय बिपिन अनल सुर रंजन ॥

हे रघुकुलके स्वामी! सुन्दर हाथोंमें श्रेष्ठ धनुष और सुन्दर बाण धारण किये हुए आप मेरी रक्षा कीजिये। आप महामोहरूपी मेघसमूहके [उड़ानेके] लिये प्रचण्ड पवन हैं, संशयरूपी वनके [भस्म करनेके] लिये अग्नि हैं और देवताओंको आनन्द देनेवाले हैं ॥ १ ॥

अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर । भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर ॥

काम क्रोध मद गज पंचानन । बसहु निरंतर जन मन कानन ॥

आप निर्गुण, सगुण, दिव्य गुणोंके धाम और परम सुन्दर हैं। भ्रमरूपी अन्धकारके [नाशके] लिये प्रबल प्रतापी सूर्य हैं। काम, क्रोध और मदरूपी हाथियोंके [वधके] लिये सिंहके समान आप इस सेवकके मनरूपी वनमें निरन्तर निवास कीजिये ॥ २ ॥

बिषय मनोरथ पुंज कंज बन । प्रबल तुषार उदार पार मन ॥

भव बारिधि मंदर परमं दर । बारय तारय संसृति दुस्तर ॥

विषयकामनाओंके समूहरूपी कमलवनके [नाशके] लिये आप प्रबल पाला हैं, आप उदार और मनसे परे हैं। भवसागर [को मथने] के लिये आप मन्दराचल पर्वत हैं। आप हमारे परम भयको दूर कीजिये और हमें दुस्तर संसारसागरसे पार कीजिये ॥ ३ ॥

स्याम गात राजीव बिलोचन । दीन बंधु प्रनतारति मोचन ॥

अनुज जानकी सहित निरंतर । बसहु राम नृप मम उर अंतर ॥

मुनि रंजन महि मंडल मंडन । तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन ॥