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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 898, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 898

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  • रामचरितमानस *

हे श्यामसुन्दर-शरीर! हे कमलनयन! हे दीनबन्धु! हे शरणागतको दुःखसे छुड़ानेवाले! हे राजा रामचन्द्रजी! आप छोटे भाई लक्ष्मण और जानकीजीसहित निरन्तर मेरे हृदयके अंदर निवास कीजिये। आप मुनियोंको आनन्द देनेवाले, पृथ्वीमण्डलके भूषण, तुलसीदासके प्रभु और भयका नाश करनेवाले हैं ॥ ४-५ ॥

दो०—नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार। कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार॥ ११५॥

हे नाथ! जब अयोध्यापुरीमें आपका राजतिलक होगा, तब हे कृपासागर! मैं आपकी उदार लीला देखने आऊँगा ॥ ११५ ॥

करि विनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए॥ नाइ चरण सिरु कह मृदु बानी। बिनय सुनहु प्रभु सारंगपानी॥

जब शिवजी विनती करके चले गये, तब विभीषणजी प्रभुके पास आये और चरणोंमें सिर नवाकर कोमल वाणीसे बोले—हे शाईधनुषके धारण करनेवाले प्रभो! मेरी विनती सुनिये— ॥ १ ॥

सकुल सदल प्रभु रावन मास्यो। पावन जस त्रिभुवन बिस्तास्यो॥ दीन मलीन हीन मति जाती। मो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती॥

आपने कुल और सेनासहित रावणका वध किया, त्रिभुवनमें अपना पवित्र यश फैलाया और मुझ दीन, पापी, बुद्धिहीन और जातिहीनपर बहुत प्रकारसे कृपा की ॥ २ ॥

अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे। मज्जनु करिअ समर श्रम छीजे॥ देखि कोस मंदिर संपदा। देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा॥

अब हे प्रभु! इस दासके घरको पवित्र कीजिये और वहाँ चलकर स्नान कीजिये, जिससे युद्धकी थकावट दूर हो जाय। हे कृपालु! खजाना, महल और सम्पत्तिका निरीक्षण कर प्रसन्नतापूर्वक वानरोंको दीजिये ॥ ३ ॥

सब बिधि नाथ मोहि अपनाइअ। पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ॥ सुनत बचन मृदु दीनदयाला। सजल भए द्वौ नयन बिसाला॥

हे नाथ! मुझे सब प्रकारसे अपना लीजिये और फिर हे प्रभो! मुझे साथ लेकर अयोध्यापुरीको पधारिये। विभीषणजीके कोमल वचन सुनते ही दीनदयालु प्रभुके दोनों विशाल नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया ॥ ४ ॥

दो०—तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात। भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात॥ ११६ ( क ) ॥