श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 899, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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[ श्रीरामजीने कहा— ] हे भाई! सुनो, तुम्हारा खजाना और घर सब मेरा ही है, यह बात सच है। पर भरतकी दशा याद करके मुझे एक-एक पल कल्पके समान बीत रहा है ॥ ११६ (क) ॥
तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि।
देखौं बेगि सो जतनु करु सखा निहोरउँ तोहि ॥ ११६ (ख) ॥
तपस्वीके वेषमें कृश (दुबले) शरीरसे निरन्तर मेरा नाम जप कर रहे हैं। हे सखा! वही उपाय करो जिससे मैं जल्दी-से-जल्दी उन्हें देख सकूँ। मैं तुमसे निहोरा (अनुरोध) करता हूँ ॥ ११६ (ख) ॥
बीतें अवधि जाऊँ जौं जिअत न पावउँ बीर।
सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर ॥ ११६ (ग) ॥
यदि अवधि बीत जानेपर जाता हूँ तो भाईको जीता न पाऊँगा। छोटे भाई भरतजीकी प्रीतिके स्मरण करके प्रभुका शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है ॥ ११६ (ग) ॥
करेहु कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहिं।
पुनि मम धाम पाइहहु जहाँ संत सब जाहिं ॥ ११६ (घ) ॥
[ श्रीरामजीने फिर कहा— ] हे विभीषण! तुम कल्पभर राज्य करना, मनमें मेरा निरन्तर स्मरण करते रहना। फिर तुम मेरे उस धामको पा जाओगे जहाँ सब संत जाते हैं ॥ ११६ (घ) ॥
सुनत बिभीषन बचन राम के। हरषि गहे पद कृपाधाम के ॥
बानर भालु सकल हरषाने। गहि प्रभु पद गुन बिमल बखाने ॥
श्रीरामचन्द्रजीके वचन सुनते ही विभीषणजीने हर्षित होकर कृपाके धाम श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये। सभी बानर-भालू हर्षित हो गये और प्रभुके चरण पकड़कर उनके निर्मल गुणोंका बखान करने लगे ॥ १ ॥
बहुरि बिभीषन भवन सिधायो। मनि गन बसन बिमान भरायो ॥
तै पुष्पक प्रभु आगें राखा। हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा ॥
फिर विभीषणजी महलको गये और उन्होंने मणियोंके समूहों (रलों) से और वस्त्रोंसे विमानको भर लिया। फिर उस पुष्पकविमानको लाकर प्रभुके सामने रखा। तब कृपासागर श्रीरामजीने हँसकर कहा— ॥ २ ॥
चढ़ि बिमान सुनु सखा बिभीषन। गगन जाइ बरषहु पट भूषन ॥
नभ पर जाइ बिभीषन तबही। बरषि दिए मनि अंबर सबही ॥
हे सखा विभीषण! सुनो, विमानपर चढ़कर, आकाशमें जाकर वस्त्रों और गहनोंको बरसा दो। तब (आज्ञा सुनते) ही विभीषणजीने आकाशमें जाकर सब मणियों और वस्त्रोंको बरसा दिया ॥ ३ ॥