श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 900, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
जोड़ जोड़ मन भावड़ सोड़ लेहीं । मनि मुख मेलि डारि कपि देहीं ॥ हँसे रामु श्री अनुज समेता । परम कौतुकी कृपा निकेता ॥
जिसके मनको जो अच्छा लगता है, वह वही ले लेता है । मणियोंको मुँहमें लेकर वानर फिर उन्हें खानेकी चीज न समझकर उगल देते हैं । यह तमाशा देखकर परम विनोदी और कृपाके धाम श्रीरामजी सीताजी और लक्ष्मणजीसहित हँसने लगे ॥ ४ ॥
दो०— मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद ।
कृपासिंधु सोड़ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद ॥ ११७ ( क ) ॥
जिनको मुनि ध्यानमें भी नहीं पाते, जिन्हें वेद नेति-नेति कहते हैं, वे ही कृपाके समुद्र श्रीरामजी वानरोंके साथ अनेकों प्रकारके विनोद कर रहे हैं ॥ ११७ ( क ) ॥
उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम ।
राम कृपा नहिं करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम ॥ ११७ ( ख ) ॥
[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! अनेकों प्रकारके योग, जप, दान, तप, यज्ञ, ब्रत और नियम करनेपर भी श्रीरामचन्द्रजी वैसी कृपा नहीं करते जैसी अनन्य प्रेम होनेपर करते हैं ॥ ११७ (ख) ॥
भालु कपिन्ह पट भूषन पाए । पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए ॥
नाना जिनस देखि सब कीसा । पुनि पुनि हँसत कोसलाधीसा ॥
भालुओं और वानरोंने कपड़े-गहने पाये और उन्हें पहन-पहनकर वे श्रीरघुनाथजीके पास आये । अनेकों जातियोंके वानरोंको देखकर कोसलपति श्रीरामजी बार-बार हँस रहे हैं ॥ १ ॥
चितइ सबन्हि पर कीन्ही दाय। बोले मृदुल बचन रघुराय ॥
तुम्हरे बल मैं रावनु मार्यो । तिलक बिभीषन कहँ पुनि सार्यो ॥
श्रीरघुनाथजीने कृपादृष्टिसे देखकर सबपर दया की । फिर वे कोमल वचन बोले—हे भाइयो! तुम्हारे ही बलसे मैंने रावणको मारा और फिर विभीषणका राजतिलक किया ॥ २ ॥
निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू । सुमिरेहु मोहि डरपहु जनि काहू ॥
सुनत बचन प्रेमाकुल बानर । जोरि पानि बोले सब सादर ॥
अब तुम सब अपने-अपने घर जाओ । मेरा स्मरण करते रहना और किसीसे डरना नहीं । ये वचन सुनते ही सब वानर प्रेममें विहल होकर हाथ जोड़कर आदरपूर्वक बोले— ॥ ३ ॥
प्रभु जोड़ कहहु तुम्हहि सब सोहा । हमरे होत बचन सुनि मोहा ॥
दीन जानि कपि किए सनाथा । तुम्ह त्रैलोक ईस रघुनाथा ॥