श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 901, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- लङ्काकाण्ड *
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प्रभो! आप जो कुछ भी कहें, आपको सब सोहता है। पर आपके वचन सुनकर हमको मोह होता है। हे रघुनाथजी! आप तीनों लोकोंके ईश्वर हैं। हम वानरोंको दीन जानकर ही आपने सनाथ (कृतार्थ) किया है ॥ ४ ॥
सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं। मसक कई खगपति हित करहीं ॥ देखि राम रुख बानर रीछा। प्रेम मगन नहीं गृह कै ईछा ॥
प्रभुके (ऐसे) वचन सुनकर हम लाजके मारे मरे जा रहे हैं। कहीं मच्छर भी गरुड़का हित कर सकते हैं? श्रीरामजीका रुख देखकर रीछ-वानर प्रेममें मग्न हो गये। उनकी घर जानेकी इच्छा नहीं है ॥ ५ ॥
दो०— प्रभु प्रेरित कपि भालु सब राम रूप उर राखि।
हरष बिषाद सहित चले बिनय बिबिध बिधि भाषि ॥ ११८ ( क ) ॥
परन्तु प्रभुकी प्रेरणा (आज्ञा) से सब वानर-भालू श्रीरामजीके रूपको हृदयमें रखकर और अनेकों प्रकारसे विनती करके हर्ष और विषादसहित घरको चले ॥ ११८ ( क ) ॥
कपिपति नील रीछपति अंगद नल हनुमान।
सहित बिभीषण अपर जे जूथप कपि बलवान ॥ ११८ ( ख ) ॥
वानरराज सुग्रीव, नील, क्रक्षराज जाम्बवान्, अंगद, नल और हनुमान् तथा विभीषणसहित और जो बलवान् वानर सेनापति हैं, ॥ ११८ ( ख ) ॥
कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि।
सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि ॥ ११८ ( ग ) ॥
वे कुछ कह नहीं सकते; प्रेमवश नेत्रोंमें जल भर-भरकर, नेत्रोंका पलक मारना छोड़कर (टकटकी लगाये) सम्मुख होकर श्रीरामजीकी ओर देख रहे हैं ॥ ११८ ( ग ) ॥
अतिसय प्रीति देखि रघुराई। लीन्हे सकल बिमान चढ़ाई ॥
मन महुं बिप्र चरन सिरु नायो। उत्तर दिसिहि बिमान चलायो ॥
श्रीरघुनाथजीने उनका अतिशय प्रेम देखकर सबको विमानपर चढ़ा लिया। तदनन्तर मन-ही-मन विप्रचरणोंमें सिर नवाकर उत्तर दिशाकी ओर विमान चलाया ॥ १ ॥
चलत बिमान कोलाहल होई। जय रघुबीर कहइ सबु कोई ॥
सिंहासन अति उच्च मनोहर। श्री समेत प्रभु बैठे ता पर ॥
विमानके चलते समय बड़ा शोर हो रहा है। सब कोई श्रीरघुवीरकी जय कह रहे हैं। विमानमें एक अत्यन्त ऊँचा मनोहर सिंहासन है। उसपर सीताजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी विराजमान हो गये ॥ २ ॥