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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 902, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 902

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  • रामचरितमानस *

राजत रामु सहित भामिनी। मेरु सृंग जनु घन दामिनी॥ रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर। कीन्ही सुमन बृष्टि हरषे सुर॥

पलीसहित श्रीरामजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो सुमेरुके शिखरपर बिजलीसहित श्याम मेघ हो। सुन्दर विमान बड़ी शीघ्रतासे चला। देवता हर्षित हुए और उन्होंने फूलोंकी वर्षा की॥ ३ ॥

परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी। सागर सर सरि निर्मल बारी॥ सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा। मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा॥

अत्यन्त सुख देनेवाली तीन प्रकारकी (शीतल, मन्द, सुगन्धित) वायु चलने लगी। समुद्र, तालाब और नदियोंका जल निर्मल हो गया। चारों ओर सुन्दर शकुन होने लगे। सबके मन प्रसन्न हैं, आकाश और दिशाएँ निर्मल हैं॥ ४ ॥

कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इन्द्रजीता॥ हनूमान अंगद के मारे। रन महि परे निसाचर भारे॥

श्रीरघुवीरने कहा—हे सीते! रणभूमि देखो। लक्ष्मणने यहाँ इन्द्रको जीतनेवाले मेघनादको मारा था। हनुमान् और अंगदके मारे हुए ये भारी-भारी निशाचर रणभूमिमें पड़े हैं॥ ५ ॥

कुंभकरन रावन द्वौ भाई। इहाँ हते सुर मुनि दुखदाई॥

देवताओं और मुनियोंको दुःख देनेवाले कुम्भकर्ण और रावण दोनों भाई यहाँ मारे गये॥ ६ ॥

दो०—इहाँ सेतु बाँध्यों अरु थापेउँ सिव सुख धाम।

सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम॥ ११९ (क)॥

मैंने यहाँ पुल बाँधा (बँधवाया) और सुखधाम श्रीशिवजीकी स्थापना की। तदनन्तर कृपानिधान श्रीरामजीने सीताजीसहित श्रीरामेश्वर महादेवको प्रणाम किया॥ ११९ (क) ॥

जहाँ जहाँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम।

सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम॥ ११९ (ख)॥

वनमें जहाँ-जहाँ करुणासागर श्रीरामचन्द्रजीने निवास और विश्राम किया था, वे सब स्थान प्रभुने जानकीजीको दिखलाये और सबके नाम बतलाये॥ ११९ (ख) ॥

तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहाँ परम सुहावा॥

कुंभजादि मुनिनायक नाना। गए रामु सब केँ अस्थाना॥

विमान शीघ्र ही वहाँ चला आया जहाँ परम सुन्दर दण्डकवन था, और अगस्त्य आदि बहुत-से मुनिराज रहते थे। श्रीरामजी इन सबके स्थानोंमें गये॥ १ ॥

सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा। चित्रकूट आए जगदीसा॥

तहाँ करि मुनिन्ह केर संतोष। चला बिमानु तहाँ ते चोखा॥