श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- लङ्काकाण्ड *
८११
प्रभो! आप जो कुछ भी कहें, आपको सब सोहता है। पर आपके वचन सुनकर हमको मोह होता है। हे रघुनाथजी! आप तीनों लोकोंके ईश्वर हैं। हम वानरोंको दीन जानकर ही आपने सनाथ (कृतार्थ) किया है ॥ ४ ॥
सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं। मसक कई खगपति हित करहीं ॥ देखि राम रुख बानर रीछा। प्रेम मगन नहीं गृह कै ईछा ॥
प्रभुके (ऐसे) वचन सुनकर हम लाजके मारे मरे जा रहे हैं। कहीं मच्छर भी गरुड़का हित कर सकते हैं? श्रीरामजीका रुख देखकर रीछ-वानर प्रेममें मग्न हो गये। उनकी घर जानेकी इच्छा नहीं है ॥ ५ ॥
दो०— प्रभु प्रेरित कपि भालु सब राम रूप उर राखि।
हरष बिषाद सहित चले बिनय बिबिध बिधि भाषि ॥ ११८ ( क ) ॥
परन्तु प्रभुकी प्रेरणा (आज्ञा) से सब वानर-भालू श्रीरामजीके रूपको हृदयमें रखकर और अनेकों प्रकारसे विनती करके हर्ष और विषादसहित घरको चले ॥ ११८ ( क ) ॥
कपिपति नील रीछपति अंगद नल हनुमान।
सहित बिभीषण अपर जे जूथप कपि बलवान ॥ ११८ ( ख ) ॥
वानरराज सुग्रीव, नील, क्रक्षराज जाम्बवान्, अंगद, नल और हनुमान् तथा विभीषणसहित और जो बलवान् वानर सेनापति हैं, ॥ ११८ ( ख ) ॥
कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि।
सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि ॥ ११८ ( ग ) ॥
वे कुछ कह नहीं सकते; प्रेमवश नेत्रोंमें जल भर-भरकर, नेत्रोंका पलक मारना छोड़कर (टकटकी लगाये) सम्मुख होकर श्रीरामजीकी ओर देख रहे हैं ॥ ११८ ( ग ) ॥
अतिसय प्रीति देखि रघुराई। लीन्हे सकल बिमान चढ़ाई ॥
मन महुं बिप्र चरन सिरु नायो। उत्तर दिसिहि बिमान चलायो ॥
श्रीरघुनाथजीने उनका अतिशय प्रेम देखकर सबको विमानपर चढ़ा लिया। तदनन्तर मन-ही-मन विप्रचरणोंमें सिर नवाकर उत्तर दिशाकी ओर विमान चलाया ॥ १ ॥
चलत बिमान कोलाहल होई। जय रघुबीर कहइ सबु कोई ॥
सिंहासन अति उच्च मनोहर। श्री समेत प्रभु बैठे ता पर ॥
विमानके चलते समय बड़ा शोर हो रहा है। सब कोई श्रीरघुवीरकी जय कह रहे हैं। विमानमें एक अत्यन्त ऊँचा मनोहर सिंहासन है। उसपर सीताजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी विराजमान हो गये ॥ २ ॥
१००
- रामचरितमानस *
राजत रामु सहित भामिनी। मेरु सृंग जनु घन दामिनी॥ रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर। कीन्ही सुमन बृष्टि हरषे सुर॥
पलीसहित श्रीरामजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो सुमेरुके शिखरपर बिजलीसहित श्याम मेघ हो। सुन्दर विमान बड़ी शीघ्रतासे चला। देवता हर्षित हुए और उन्होंने फूलोंकी वर्षा की॥ ३ ॥
परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी। सागर सर सरि निर्मल बारी॥ सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा। मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा॥
अत्यन्त सुख देनेवाली तीन प्रकारकी (शीतल, मन्द, सुगन्धित) वायु चलने लगी। समुद्र, तालाब और नदियोंका जल निर्मल हो गया। चारों ओर सुन्दर शकुन होने लगे। सबके मन प्रसन्न हैं, आकाश और दिशाएँ निर्मल हैं॥ ४ ॥
कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इन्द्रजीता॥ हनूमान अंगद के मारे। रन महि परे निसाचर भारे॥
श्रीरघुवीरने कहा—हे सीते! रणभूमि देखो। लक्ष्मणने यहाँ इन्द्रको जीतनेवाले मेघनादको मारा था। हनुमान् और अंगदके मारे हुए ये भारी-भारी निशाचर रणभूमिमें पड़े हैं॥ ५ ॥
कुंभकरन रावन द्वौ भाई। इहाँ हते सुर मुनि दुखदाई॥
देवताओं और मुनियोंको दुःख देनेवाले कुम्भकर्ण और रावण दोनों भाई यहाँ मारे गये॥ ६ ॥
दो०—इहाँ सेतु बाँध्यों अरु थापेउँ सिव सुख धाम।
सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम॥ ११९ (क)॥
मैंने यहाँ पुल बाँधा (बँधवाया) और सुखधाम श्रीशिवजीकी स्थापना की। तदनन्तर कृपानिधान श्रीरामजीने सीताजीसहित श्रीरामेश्वर महादेवको प्रणाम किया॥ ११९ (क) ॥
जहाँ जहाँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम।
सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम॥ ११९ (ख)॥
वनमें जहाँ-जहाँ करुणासागर श्रीरामचन्द्रजीने निवास और विश्राम किया था, वे सब स्थान प्रभुने जानकीजीको दिखलाये और सबके नाम बतलाये॥ ११९ (ख) ॥
तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहाँ परम सुहावा॥
कुंभजादि मुनिनायक नाना। गए रामु सब केँ अस्थाना॥
विमान शीघ्र ही वहाँ चला आया जहाँ परम सुन्दर दण्डकवन था, और अगस्त्य आदि बहुत-से मुनिराज रहते थे। श्रीरामजी इन सबके स्थानोंमें गये॥ १ ॥
सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा। चित्रकूट आए जगदीसा॥
तहाँ करि मुनिन्ह केर संतोष। चला बिमानु तहाँ ते चोखा॥
- लङ्काकाण्ड *
१०१
सम्पूर्ण ऋषियोंसे आशीर्वाद पाकर जगदीश्वर श्रीरामजी चित्रकूट आये। वहाँ मुनियोंको सन्तुष्ट किया। [फिर] विमान वहाँसे आगे तेजीके साथ चला ॥ २ ॥
बहरि राम जानकिहि देखाई। जमुना कलि मल हरनि सुहाई॥ पुनि देखी सुरसरी पुनीता। राम कहा प्रनाम करु सीता॥
फिर श्रीरामजीने जानकीजीको कलियुगके पापोंका हरण करनेवाली सुहावनी यमुनाजीके दर्शन कराये। फिर पवित्र गङ्गाजीके दर्शन किये। श्रीरामजीने कहा—हे सीते! इन्हें प्रणाम करो ॥ ३ ॥
तीर्थपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत जन्म कोटि अघ भागा॥ देखु परम पावनि पुनि बेनी। हरनि सोक हरि लोक निसेनी॥ पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि। त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि॥
फिर तीर्थराज प्रयागको देखो, जिसके दर्शनसे ही करोड़ों जन्मोंके पाप भाग जाते हैं। फिर परम पवित्र त्रिवेणीजीके दर्शन करो, जो शोकोंको हरनेवाली और श्रीहरिके परम धाम [पहुँचने] के लिये सीढ़ीके समान है। फिर अत्यन्त पवित्र अयोध्यापुरीके दर्शन करो, जो तीनों प्रकारके तापों और भव (आवागमनरूपी) रोगका नाश करनेवाली है ॥ ४-५ ॥
दो०— सीता सहित अवध कहँ कीन्ह कृपाल प्रनाम।
सजल नयन तन पुलकित पुनि पुनि हरषित राम॥ १२० ( क )॥
यों कहकर कृपालु श्रीरामजीने सीताजीसहित अवधपुरीको प्रणाम किया। सजलनेत्र और पुलकितशरीर होकर श्रीरामजी बार-बार हरषित हो रहे हैं ॥ १२० ( क ) ॥
पुनि प्रभु आइ त्रिवेनीं हरषित मज्जनु कीन्ह।
कपिन्ह सहित बिप्रन्ह कहँ दान बिबिध बिधि दीन्ह॥ १२० ( ख )॥
फिर त्रिवेणीमें आकर प्रभुने हरषित होकर स्नान किया और वानरोंसहित ब्राह्मणोंको अनेकों प्रकारके दान दिये ॥ १२० ( ख ) ॥
प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई। धरि बटु रूप अवधपुर जाई॥
भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु। समाचार लै तुम्ह चलि आएहु॥
तदनन्तर प्रभुने हनुमान्जीको समझाकर कहा—तुम ब्रह्मचारीका रूप धरकर अवधपुरीको जाओ। भरतको हमारी कुशल सुनाना और उनका समाचार लेकर चले आना ॥ १ ॥
तुरत पवनसुत गवनत भयऊ। तब प्रभु भरद्वाज पहँ गयऊ॥
नाना बिधि मुनि पूजा कीन्ही। अस्तुति करि पुनि आसिष दीन्ही॥
१०२
- रामचरितमानस *
पवनपुत्र हनुमान्जी तुरंत ही चल दिये। तब प्रभु भरद्वाजजीके पास गये। मुनिने [इष्टबुद्धिसे] उनकी अनेकों प्रकारसे पूजा की और स्तुति की और फिर [लीलाकी दृष्टिसे] आशीर्वाद दिया ॥ २ ॥
मुनि पद बंदि जुगल कर जोरी । चढ़ि बिमान प्रभु चले बहोरी ॥ इहाँ निषाद सुना प्रभु आए । नाव नाव कहँ लोग बोलाए ॥
दोनों हाथ जोड़कर तथा मुनिके चरणोंकी वन्दना करके प्रभु विमानपर चढ़कर फिर (आगे) चले। यहाँ जब निषादराजने सुना कि प्रभु आ गये, तब उसने 'नाव कहाँ है? नाव कहाँ है?' पुकारते हुए लोगोंको बुलाया ॥ ३ ॥
सुरसरि नाधि जान तब आयो । उतरेउ तट प्रभु आयसु पायो ॥ तब सीताँ पूजी सुरसरी । बहु प्रकार पुनि चरनन्हि परी ॥
इतनेमें ही विमान गङ्गाजीको लाँघकर [इस पार] आ गया और प्रभुकी आज्ञा पाकर वह किनारेपर उतरा। तब सीताजी बहुत प्रकारसे गङ्गाजीकी पूजा करके फिर उनके चरणोंपर गिरीं ॥ ४ ॥
दीन्हि असीस हरषि मन गंगा । सुंदरि तव अहिवात अभंगा ॥ सुनत गुहा धायउ प्रेमाकुल । आयउ निकट परम सुख संकुल ॥
गङ्गाजीने मनमें हर्षित होकर आशीर्वाद दिया—हे सुन्दरी! तुम्हारा सुहाग अखण्ड हो। भगवान्के तटपर उतरनेकी बात सुनते ही निषादराज गुह प्रेममें विह्वल होकर दौड़ा। परम सुखसे परिपूर्ण होकर वह प्रभुके समीप आया, ॥ ५ ॥
प्रभुहि सहित बिलोकि बैदेही । परेउ अवनि तन सुधि नहिं तेही ॥ प्रीति परम बिलोकि रघुराई । हरषि उठाइ लियो उर लाई ॥
और श्रीजानकीजीसहित प्रभुको देखकर वह [आनन्द-समाधिमें मग्न होकर] पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसे शरीरकी सुधि न रही। श्रीरघुनाथजीने उसका परम प्रेम देखकर उसे उठाकर हर्षके साथ हृदयसे लगा लिया ॥ ६ ॥
छं०—लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान रायँ रमापती । बैठारि परम समीप बूझी कुसल सो कर बीनती ॥ अब कुसल पद पंकज बिलोकि बिरंचि संकर सेब्य जे । सुख धाम पूरनकाम राम नमामि राम नमामि ते ॥
सुजानोंके राजा (शिरोमणि), लक्ष्मीकान्त, कृपानिधान भगवान्ने उसको हृदयसे लगा लिया और अत्यन्त निकट बैठाकर कुशल पूछी। वह विनती करने लगा—आपके जो चरणकमल ब्रह्माजी और शङ्करजीसे सेवित हैं, उनके दर्शन करके मैं अब सकुशल हूँ। हे सुखधाम! हे पूर्णकाम श्रीरामजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
- लङ्काकाण्ड *
१०३
सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो । मतिमंद तुलसीदास सो प्रभु मोह बस बिसराइयो ॥ यह रावनारि चरित्र पावन राम पद रतिप्रद सदा । कामादिहर बिग्यानकर सुर सिद्ध मुनि गावहिं मुदा ॥
सब प्रकारसे नीच उस निषादको भगवान्ने भरतजीकी भाँति हृदयसे लगा लिया। तुलसीदासजी कहते हैं—इस मन्दबुद्धिने (मैंने) मोहवश उस प्रभुको भुला दिया। रावणके शत्रुका यह पवित्र करनेवाला चरित्र सदा ही श्रीरामजीके चरणोंमें प्रीति उत्पन्न करनेवाला है। यह कामादि विकारोंका हरनेवाला और [भगवान्के स्वरूपका] विशेष ज्ञान उत्पन्न करनेवाला है। देवता, सिद्ध और मुनि आनन्दित होकर इसे गाते हैं ॥ २ ॥
दो०—समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान ।
बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान ॥ १२१ (क) ॥
जो सुजान लोग श्रीरघुवीरकी समरविजयसम्बन्धी लीलाको सुनते हैं, उनको भगवान् नित्य विजय, विवेक और विभूति (ऐश्वर्य) देते हैं ॥ १२१ (क) ॥
यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार ।
श्रीरघुनाथ नाम तजि नाहिन आन अधार ॥ १२१ (ख) ॥
अरे मन! विचार करके देख! यह कलिकाल पापोंका घर है। इसमें श्रीरघुनाथजीके नामको छोड़कर [पापोंसे बचनेके लिये] दूसरा कोई आधार नहीं है ॥ १२१ (ख) ॥
मासपारायण, सत्ताईसवाँ विश्राम
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने षष्ठः सोपानः समाप्तः ।
कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानसका
यह छठा सोपान समाप्त हुआ ।
(लङ्काकाण्ड समाप्त)
गुरु-वन्दन
धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह॥
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीरामचरितमानस
सप्तम सोपान
उत्तरकाण्ड
श्लोक
केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं शोभाद्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम् । पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारुढरामम् ॥ १ ॥
मोरके कण्ठकी आभाके समान (हरिताभ) नीलवर्ण, देवताओंमें श्रेष्ठ, ब्राह्मण (भृगुजी) के चरणकमलके चिह्नेसे सुशोभित, शोभासे पूर्ण, पीताम्बरधारी, कमलनेत्र, सदा परम प्रसन्न, हाथोंमें बाण और धनुष धारण किये हुए, वानरसमूहसे युक्त, भाई लक्ष्मणजीसे सेवित, स्तुति किये जाने योग्य, श्रीजानकीजीके पति, रघुकुलश्रेष्ठ, पुष्पकविमानपर सवार श्रीरामचन्द्रजीको मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
कोसलेन्द्रपदकञ्चमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ । जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसङ्घिनौ ॥ २ ॥
कोसलपुरीके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर और कोमल दोनों चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजीके द्वारा वन्दित हैं, श्रीजानकीजीके करकमलोंसे दुलराये हुए हैं और चिन्तन करनेवालेके मनरूपी भौरिके नित्य संगी हैं अर्थात् चिन्तन करनेवालोंका मनरूपी भ्रमर सदा उन चरणकमलोंमें बसा रहता है ॥ २ ॥
कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम् । कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शङ्करमनङ्गमोचनम् ॥ ३ ॥
१०६
- रामचरितमानस *
कुन्दके फूल, चन्द्रमा और शङ्खके समान सुन्दर गौरवर्ण, जगज्जननी श्रीपार्वतीजीके पति, वाञ्छित फलके देनेवाले, [दुःखियोंपर सदा] दया करनेवाले, सुन्दर कमलके समान नेत्रवाले, कामदेवसे छुड़ानेवाले, [कल्याणकारी] श्रीशङ्करजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ३ ॥
दो०—रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग। जहाँ तहाँ सोचाहिं नारि नर कूस तन राम बियोग॥
[श्रीरामजीके लौटनेकी] अवधिका एक ही दिन बाकी रह गया, अतएव नगरके लोग बहुत आतुर (अधीर) हो रहे हैं। रामके वियोगमें दुबले हुए स्त्री-पुरुष जहाँ-तहाँ सोच (विचार) कर रहे हैं [कि क्या बात है, श्रीरामजी क्यों नहीं आये]।
सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर। प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर॥
इतनेमें ही सब सुन्दर शकुन होने लगे और सबके मन प्रसन्न हो गये। नगर भी चारों ओरसे रमणीक हो गया। मानो ये सब-के-सब चिह्न प्रभुके [शुभ] आगमनको जना रहे हैं।
कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ। आयउ प्रभु श्री अनुजजुत कहन चहत अब कोइ॥
कौसल्या आदि सब माताओंके मनमें ऐसा आनन्द हो रहा है जैसे अभी कोई कहना ही चाहता है कि सीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी आ गये।
भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार। जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार॥
भरतजीकी दाहिनी आँख और दाहिनी भुजा बार-बार फड़क रही है। इसे शुभ शकुन जानकर उनके मनमें अत्यन्त हर्ष हुआ और वे विचार करने लगे—
रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा॥ कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ॥
प्राणोंकी आधाररूप अवधिका एक ही दिन शेष रह गया। यह सोचते ही भरतजीके मनमें अपार दुःख हुआ। क्या कारण हुआ कि नाथ नहीं आये? प्रभुने कुटिल जानकर मुझे कहीं भुला तो नहीं दिया? ॥ १ ॥
अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी॥ कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा॥
अहा हा! लक्ष्मण बड़े धन्य एवं बड़भागी हैं, जो श्रीरामचन्द्रजीके चरणारविन्दके प्रेमी हैं (अर्थात् उनसे अलग नहीं हुए)। मुझे तो प्रभुने कपटी और कुटिल पहचान लिया, इसीसे नाथने मुझे साथ नहीं लिया! ॥ २ ॥
- उत्तरकाण्ड *
१०७
जों करनी समुझै प्रभु मोरी । नहिं निस्तार कलप सत कोरी ॥ जन अवगुन प्रभु मान न काऊ । दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ ॥
[बात भी ठीक ही है, क्योंकि] यदि प्रभु मेरी करनीपर ध्यान दें, तो सौ करोड़ (असंख्य) कल्पोंतक भी मेरा निस्तार (छुटकारा) नहीं हो सकता। [परन्तु आशा इतनी ही है कि] प्रभु सेवकका अवगुण कभी नहीं मानते। वे दीनबन्धु हैं और अत्यन्त ही कोमल स्वभावके हैं ॥ ३ ॥
मोरे जियँ भरोस दृढ़ सोई । मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई ॥ बीतें अवधि रहहिं जों प्राना । अधम कवन जग मोहि समाना ॥
अतएव मेरे हृदयमें ऐसा पक्का भरोसा है कि श्रीरामजी अवश्य मिलेंगे, [क्योंकि] मुझे शकुन बड़े शुभ हो रहे हैं। किन्तु अवधि बीत जानेपर यदि मेरे प्राण रह गये तो जगत्में मेरे समान नीच कौन होगा ? ॥ ४ ॥
दो०— राम बिरह सागर महाँ भरत मगन मन होत ।
बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत ॥ १ ( क ) ॥
श्रीरामजीके विरह-समुद्रमें भरतजीका मन डूब रहा था, उसी समय पवनपुत्र हनुमान्जी ब्राह्मणका रूप धरकर इस प्रकार आ गये, मानो [उन्हें डूबनेसे बचानेके लिये] नाव आ गयी हो ॥ १ ( क ) ॥
बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कूस गात ।
राम राम रघुपति जपत स्वत नयन जलजात ॥ १ ( ख ) ॥
हनुमान्जीने दुर्बलशरीर भरतजीको जटाओंका मुकुट बनाये, राम! राम! रघुपति! जपते और कमलके समान नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओंका] जल बहाते कुशके आसनपर बैठे देखा ॥ १ ( ख ) ॥
देखत हनुमान अति हरषेउ । पुलक गात लोचन जल बरषेउ ॥
मन महाँ बहुत भाँति सुख मानी । बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी ॥
उन्हें देखते ही हनुमान्जी अत्यन्त हर्षित हुए। उनका शरीर पुलकित हो गया, नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओंका] जल बरसने लगा। मनमें बहुत प्रकारसे सुख मानकर वे कानोंके लिये अमृतके समान वाणी बोले— ॥ १ ॥
जासु बिरहँ सोचहु दिन राती । रटहु निरंतर गुन गन पाँती ॥
रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता । आयउ कुसल देव मुनि त्राता ॥
जिनके विरहमें आप दिन-रात सोच करते (घुलते) रहते हैं और जिनके गुण-समूहोंकी पंक्तियोंको आप निरन्तर रटते रहते हैं, वे ही रघुकुलके तिलक, सज्जनोंको सुख देनेवाले और देवताओं तथा मुनियोंके रक्षक श्रीरामजी सकुशल आ गये ॥ २ ॥
१०८
- रामचरितमानस *
रिपु रन जीति सुजस सुर गावत । सीता सहित अनुज प्रभु आवत ॥ सुनत बचन बिसरे सब दूखा । तृषावंत जिमि पाड़ पियूषा ॥
शत्रुको रणमें जीतकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु आ रहे हैं; देवता उनका सुन्दर यश गा रहे हैं। ये बचन सुनते ही [भरतजीको] सारे दुःख भूल गये। जैसे प्यासा आदमी अमृत पाकर प्यासके दुःखको भूल जाय ॥ ३ ॥
को तुम्ह तात कहाँ ते आए । मोहि परम प्रिय बचन सुनाए ॥ मारुत सुत मैं कपि हनुमाना । नामु मोर सुनु कृपानिधाना ॥
[भरतजीने पूछा—] हे तात! तुम कौन हो? और कहाँसे आये हो? [जो] तुमने मुझको [ये] परम प्रिय (अत्यन्त आनन्द देनेवाले) बचन सुनाये। [हनुमान्जीने कहा—] हे कृपानिधान! सुनिये, मैं पवनका पुत्र और जातिका वानर हूँ; मेरा नाम हनुमान् है ॥ ४ ॥
दीनबंधु रघुपति कर किंकर । सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर ॥ मिलत प्रेम नहि हृदयँ समाता । नयन स्वरत जल पुलकित गाता ॥
मैं दीनोंके बन्धु श्रीरघुनाथजीका दास हूँ। यह सुनते ही भरतजी उठकर आदरपूर्वक हनुमान्जीसे गले लगकर मिले। मिलते समय प्रेम हृदयमें नहीं समाता। नेत्रोंसे [आनन्द और प्रेमके आँसुओंका] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया ॥ ५ ॥
कपि तव दरस सकल दुख बीते । मिले आजु मोहि राम पिरीते ॥ बार बार बूझी कुसलाता । तो कहूँ देउँ काह सुनु भ्राता ॥
[भरतजीने कहा—] हे हनुमान्! तुम्हारे दर्शनसे मेरे समस्त दुःख समाप्त हो गये (दुःखोंका अन्त हो गया)। [तुम्हारे रूपमें] आज मुझे प्यारे रामजी ही मिल गये। भरतजीने बार-बार कुशल पूछी [और कहा—] हे भाई! सुनो, [इस शुभ संवादके बदलेमें] तुम्हें क्या दूँ? ॥ ६ ॥
एहि संदेस सरिस जग माहीं । करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं ॥ नाहिन तात उरिन मैं तोही । अब प्रभु चरित सुनावहु मोही ॥
इस सन्देशके समान (इसके बदलेमें देने लायक पदार्थ) जगत्में कुछ भी नहीं है, मैंने यह विचार कर देख लिया है। [इसलिये] हे तात! मैं तुमसे किसी प्रकार भी उग्रहण नहीं हो सकता। अब मुझे प्रभुका चरित्र (हाल) सुनाओ ॥ ७ ॥
तब हनुमंत नाड़ पद माथा । कहे सकल रघुपति गुन गाथा ॥ कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाई । सुमिरहिं मोहि दास की नाई ॥
- उत्तरकाण्ड *
१०१
तब हनुमान्जीने भरतजीके चरणोंमें मस्तक नवाकर श्रीरघुनाथजीकी सारी गुणगाथा कही। [भरतजीने पूछा—] हे हनुमान्! कहो, कृपालु स्वामी श्रीरामचन्द्रजी कभी मुझे अपने दासकी तरह याद भी करते हैं? ॥ ८ ॥
छं०—निज दास ज्यों रघुबंसभूषण कबहूँ मम सुमिरन कर्यो । सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि पर्यो ॥ रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो । काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो ॥
रघुवंशके भूषण श्रीरामजी क्या कभी अपने दासकी भाँति मेरा स्मरण करते रहे हैं? भरतजीके अत्यन्त नम्र वचन सुनकर हनुमान्जी पुलकित शरीर होकर उनके चरणोंपर गिर पड़े [और मनमें विचारने लगे कि] जो चराचरके स्वामी हैं वे श्रीरघुवीर अपने श्रीमुखसे जिनके गुणसमूहोंका वर्णन करते हैं, वे भरतजी ऐसे विनम्र, परम पवित्र और सदगुणोंके समुद्र क्यों न हों?
दो०—राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात । पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात ॥ २ ( क ) ॥
[हनुमान्जीने कहा—] हे नाथ! आप श्रीरामजीको प्राणोंके समान प्रिय हैं, हे तात! मेरा वचन सत्य है। यह सुनकर भरतजी बार-बार मिलते हैं, हृदयमें हर्ष समाता नहीं है ॥ २ ( क ) ॥
सो०—भरत चरन सिरु नाड़ तुरित गयउ कपि राम पहँ । कही कुसल सब जाड़ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि ॥ २ ( ख ) ॥
फिर भरतजीके चरणोंमें सिर नवाकर हनुमान्जी तुरंत ही श्रीरामजीके पास [लौट] गये और जाकर उन्होंने सब कुशल कही। तब प्रभु हर्षित होकर विमानपर चढ़कर चले ॥ २ ( ख ) ॥
हरषि भरत कोसलपुर आए । समाचार सब गुरहि सुनाए ॥ पुनि मंदिर महँ बात जनाई । आवत नगर कुसल रघुराई ॥
इधर भरतजी भी हर्षित होकर अयोध्यापुरीमें आये और उन्होंने गुरुजीको सब समाचार सुनाया। फिर राजमहलमें खबर जनायी कि श्रीरघुनाथजी कुशलपूर्वक नगरको आ रहे हैं ॥ १ ॥
सुनत सकल जननीं उठि धाई । कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई ॥ समाचार पुरबासिन्ह पाए । नर अरु नारि हरषि सब धाए ॥
खबर सुनते ही सब माताएँ उठ दीड़ीं। भरतजीने प्रभुकी कुशल कहकर सबको समझाया। नगरनिवासियोंने यह समाचार पाया, तो स्त्री-पुरुष सभी हर्षित होकर दौड़े ॥ २ ॥
दधि दुर्बा रोचन फल फूला । नव तुलसी दल मंगल मूला ॥ भरि भरि हेम थार भामिनी । गावत चर्लि सिंधुरगामिनी ॥
११०
- रामचरितमानस *
[श्रीरामजीके स्वागतके लिये] दही, दूब, गोरोचन, फल, फूल और मङ्गलके मूल नवीन तुलसीदल आदि वस्तुएँ सोनेके थालोंमें भर-भरकर हथिनीकी-सी चालवाली सौभाग्यवती स्त्रियाँ [उन्हें लेकर] गाती हुई चलीं ॥ ३ ॥
जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं । बाल बूद्ध कहैं संग न लावहिं ॥ एक एकन्ह कहैं बूझहिं भाई । तुम्ह देखे दयाल रघुराई ॥
जो जैसे हैं (जहाँ जिस दशामें हैं) वे वैसे ही (वहींसे उसी दशामें) उठ दौड़ते हैं। [देर हो जानेके डरसे] बालकों और बूढ़ोंको कोई साथ नहीं लाते। एक दूसरेसे पूछते हैं—भाई! तुमने दयालु श्रीरघुनाथजीको देखा है? ॥ ४ ॥
अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी ॥ बहड़ सुहावन त्रिबिध समीरा। भड़ सरजू अति निर्मल नीरा ॥
प्रभुको आते जानकर अवधपुरी सम्पूर्ण शोभाओंकी खान हो गयी। तीनों प्रकारकी सुन्दर वायु बहने लगी। सरयूजी अति निर्मल जलवाली हो गयी (अर्थात् सरयूजीका जल अत्यन्त निर्मल हो गया) ॥ ५ ॥
दो०—हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत।
चले भरत मन प्रेम अति सम्मुख कृपानिकेत ॥ ३ ( क ) ॥
गुरु वसिष्ठजी, कुटुम्बी, छोटे भाई शत्रुघ्न तथा ब्राह्मणोंके समूहके साथ हर्षित होकर भरतजी अत्यन्त प्रेमपूर्ण मनसे कृपाधाम श्रीरामजीके सामने (अर्थात् उनकी अगवानीके लिये) चले ॥ ३ ( क ) ॥
बहुतक चढ़ीं अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान।
देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान ॥ ३ ( ख ) ॥
बहुत-सी स्त्रियाँ अटारियोंपर चढ़ीं आकाशमें विमान देख रही हैं और उसे देखकर हर्षित होकर मीठे स्वरसे सुन्दर मङ्गलगीत गा रही हैं ॥ ३ ( ख ) ॥
राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान।
बढ़्यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान ॥ ३ ( ग ) ॥
श्रीरघुनाथजी पूर्णिमाके चन्द्रमा हैं, तथा अवधपुर समुद्र है, जो उस पूर्णचन्द्रको देखकर हर्षित हो रहा है और शोर करता हुआ बढ़ रहा है [इधर-उधर दौड़ती हुई] स्त्रियाँ उसकी तरङ्गोंके समान लगती हैं ॥ ३ ( ग ) ॥
इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर ॥
सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा ॥
- उत्तरकाण्ड *
१११
यहाँ (विमानपरसे) सूर्यकुलरूपी कमलके प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामजी वानरोंको मनोहर नगर दिखला रहे हैं। [वे कहते हैं—] हे सुप्रीव! हे अंगद! हे लंकापति विभीषण! सुनो। यह पुरी पवित्र है और यह देश सुन्दर है ॥ १ ॥
जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना ॥ अवधपुरी सम प्रिय नहीं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ ॥
जद्यपि सबने वैकुण्ठकी बड़ाई की है—यह वेद-पुराणोंमें प्रसिद्ध है और जगत् जानता है, परन्तु अवधपुरीके समान मुझे वह भी प्रिय नहीं है। यह बात (भेद) कोई-कोई (विरले ही) जानते हैं ॥ २ ॥
जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि ॥ जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा ॥
यह सुहावनी पुरी मेरी जन्मभूमि है। इसके उत्तर दिशामें [जीवोंको] पवित्र करनेवाली सरयू नदी बहती है, जिसमें स्नान करनेसे मनुष्य बिना ही परिश्रम मेरे समीप निवास (सामीप्य मुक्ति) पा जाते हैं ॥ ३ ॥
अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी ॥ हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी ॥
यहाँके निवासी मुझे बहुत ही प्रिय हैं। यह पुरी सुखकी राशि और मेरे परमधामको देनेवाली है। प्रभुकी वाणी सुनकर सब वानर हर्षित हुए [और कहने लगे कि] जिस अवधकी स्वयं श्रीरामजीने बड़ाई की, वह [अवश्य ही] धन्य है ॥ ४ ॥
दो०—आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान।
नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि विमान ॥ ४ ( क ) ॥
कृपासागर भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने सब लोगोंको आते देखा, तो प्रभुने विमानको नगरके समीप उतरनेकी प्रेरणा की। तब वह पृथ्वीपर उतरा ॥ ४ ( क ) ॥
उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु।
प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु ॥ ४ ( ख ) ॥
विमानसे उतरकर प्रभुने पुष्पकविमानसे कहा कि तुम अब कुबेरके पास जाओ। श्रीरामजीकी प्रेरणासे वह चला; उसे [अपने स्वामीके पास जानेका] हर्ष है और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीसे अलग होनेका अत्यन्त दुःख भी ॥ ४ ( ख ) ॥
आए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा ॥
बामदेव बसिष्ठ मुनिनायक। देखे प्रभु महि धरि धनु सायक ॥
भरतजीके साथ सब लोग आये। श्रीरघुवीरके वियोगसे सबके शरीर दुबले हो रहे हैं। प्रभुने वामदेव, वसिष्ठ आदि मुनिश्रेष्ठोंको देखा, तो उन्होंने धनुष-बाण पृथ्वीपर रखकर— ॥ १ ॥
११२
- रामचरितमानस *
धाइ धरे गुर चरण सरोरुह । अनुज सहित अति पुलक तनोरुह ॥ भेंटि कुसल बूझी मुनिराया । हमरें कुसल तुम्हारिहिं दया ॥
छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित दौड़कर गुरुजीके चरणकमल पकड़ लिये; उनके रोम-रोम अत्यन्त पुलकित हो रहे हैं। मुनिराज वसिष्ठजीने [उठाकर] उन्हें गले लगाकर कुशल पूछी। [प्रभुने कहा—] आपहीकी दयामें हमारी कुशल है ॥ २ ॥
सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा । धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा ॥ गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज । नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज ॥
धर्मकी धुरी धारण करनेवाले रघुकुलके स्वामी श्रीरामजीने सब ब्राह्मणोंसे मिलकर उन्हें मस्तक नवाया। फिर भरतजीने प्रभुके वे चरणकमल पकड़े जिन्हें देवता, मुनि, शङ्करजी और ब्रह्माजी [भी] नमस्कार करते हैं ॥ ३ ॥
परे भूमि नहिं उठत उठाए । बर करि कृपासिंधु उर लाए ॥ स्यामल गात रोम भए ठाढ़े । नव राजीव नयन जल बाढ़े ॥
भरतजी पृथ्वीपर पड़े हैं, उठाये उठते नहीं। तब कृपासिंधु श्रीरामजीने उन्हें जबर्दस्ती उठाकर हृदयसे लगा लिया। [उनके] साँवले शरीरपर रोएँ खड़े हो गये। नवीन कमलके समान नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंके] जलकी बाढ़ आ गयी ॥ ४ ॥
छं०— राजीव लोचन स्वत जल तन ललित पुलकावलि बनी । अति प्रेम हृदयैँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी ॥ प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही । जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही ॥
कमलके समान नेत्रोंसे जल बह रहा है। सुन्दर शरीरमें पुलकावली [अत्यन्त] शोभा दे रही है। त्रिलोकीके स्वामी प्रभु श्रीरामजी छोटे भाई भरतजीको अत्यन्त प्रेमसे हृदयसे लगाकर मिले। भाईसे मिलते समय प्रभु जैसे शोभित हो रहे हैं उसकी उपमा मुझसे कही नहीं जाती। मानो प्रेम और शृंगार शरीर धारण करके मिले और श्रेष्ठ शोभाको प्राप्त हुए ॥ १ ॥
बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई । सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई ॥ अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो । बूझत बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो ॥
- उत्तरकाण्ड *
११३
कृपानिधान श्रीरामजी भरतजीसे कुशल पूछते हैं; परन्तु आनन्दवश भरतजीके मुखसे वचन शीघ्र नहीं निकलते। [शिवजीने कहा—] हे पार्वती! सुनो, वह सुख (जो उस समय भरतजीको मिल रहा था) वचन और मनसे परे है; उसे वही जानता है जो उसे पाता है। [भरतजीने कहा—] हे कोसलनाथ! आपने आर्त (दुःखी) जानकर दासको दर्शन दिये, इससे अब कुशल है। विरहसमुद्रमें डूबते हुए मुझको कृपानिधानने हाथ पकड़कर बचा लिया! ॥ २ ॥
दो०—पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ।
लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ ॥ ५ ॥
फिर प्रभु हर्षित होकर शत्रुघ्नजीको हृदयसे लगाकर उनसे मिले। तब लक्ष्मणजी और भरतजी दोनों भाई परम प्रेमसे मिले ॥ ५ ॥
भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे ॥
सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा ॥
फिर लक्ष्मणजी शत्रुघ्नजीसे गले लगकर मिले और इस प्रकार विरहसे उत्पन्न दुःसह दुःखका नाश किया। फिर भाई शत्रुघ्नजीसहित भरतजीने सीताजीके चरणोंमें सिर नवाया और परम सुख प्राप्त किया ॥ १ ॥
प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी ॥
प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी ॥
प्रभुको देखकर अयोध्यावासी सब हर्षित हुए। वियोगसे उत्पन्न सब दुःख नष्ट हो गये। सब लोगोंको प्रेमविह्वल [और मिलनेके लिये अत्यन्त आतुर] देखकर खरके शत्रु कृपालु श्रीरामजीने एक चमत्कार किया ॥ २ ॥
अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथा जोग मिले सबहि कृपाला ॥
कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी ॥
उसी समय कृपालु श्रीरामजी असंख्य रूपोंमें प्रकट हो गये और सबसे [एक ही साथ] यथायोग्य मिले। श्रीरघुवीरने कृपाकी दृष्टिसे देखकर सब नर-नारियोंको शोकसे रहित कर दिया ॥ ३ ॥
छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना ॥
एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा ॥
भगवान् क्षणमात्रमें सबसे मिल लिये। हे उमा! यह रहस्य किसीने नहीं जाना। इस प्रकार शील और गुणोंके धाम श्रीरामजी सबको सुखी करके आगे बढ़े ॥ ४ ॥
कौसल्यादि मातु सब धाई। निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई ॥
कौसल्या आदि माताएँ ऐसे दौड़ीं मानो नयी ब्यायी हुईं गौँँ अपने बछड़ोंको देखकर दौड़ीं हों ॥ ५ ॥
११४
- रामचरितमानस *
छं०—जनु धेनु बालक बच्छ तजि गूहँ चरन बन परबस गई । दिन अंत पुर रुख स्वत थन हुंकार करि धावत भई ॥ अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे । गड़ बिषम बिपति बियोगभव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे ॥
मानो नयी ब्यायी हुई गौएँ अपने छोटे बछड़ोंको घरपर छोड़ परवश होकर वनमें चरने गयीं हों और दिनका अन्त होनेपर [बछड़ोंसे मिलनेके लिये] हुंकार करके थनसे दूध गिराती हुई नगरकी ओर दौड़ी हों। प्रभुने अत्यन्त प्रेमसे सब माताओंसे मिलकर उनसे बहुत प्रकारके कोमल वचन कहे। वियोगसे उत्पन्न भयानक विपत्ति दूर हो गयी और सबने [भगवान्से मिलकर और उनके वचन सुनकर] अगणित सुख और हर्ष प्राप्त किये।
दो०—भेटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि । रामहि मिलत कैकई हृदयँ बहुत सकुचानि ॥ ६ ( क ) ॥
सुमित्राजी अपने पुत्र लक्ष्मणजीकी श्रीरामजीके चरणोंमें प्रीति जानकर उनसे मिलीं। श्रीरामजीसे मिलते समय कैकेयीजी हृदयमें बहुत सकुचार्यीं ॥ ६ ( क ) ॥
लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ ।
कैकड़ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ ॥ ६ ( ख ) ॥
लक्ष्मणजी भी सब माताओंसे मिलकर और आशीर्वाद पाकर हर्षित हुए। वे कैकेयीजीसे बार-बार मिले, परन्तु उनके मनका क्षोभ (रोष) नहीं जाता ॥ ६ (ख) ॥
सासुन्ह सबनि मिली बैदेही । चरनन्हि लागि हरषु अति तेही ॥ देहिं असीस बूझि कुसलाता । होइ अचल तुम्हार अहिवाता ॥
जानकीजी सब सासुओंसे मिलीं और उनके चरणों लगकर उन्हें अत्यन्त हर्ष हुआ। सासुएँ कुशल पूछकर आशिष दे रही हैं कि तुम्हारा सुहाग अचल हो ॥ १ ॥
सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं । मंगल जानि नयन जल रोकहिं ॥ कनक थार आरती उतारहिं । बार बार प्रभु गात निहारहिं ॥
सब माताएँ श्रीरघुनाथजीका कमल-सा मुखड़ा देख रही हैं। [नेत्रोंसे प्रेमके आँसू उमड़े आते हैं, परन्तु] मङ्गलका समय जानकर वे आँसुओंके जलको नेत्रोंमें ही रोक रखती हैं। सोनेके थालसे आरती उतारती हैं और बार-बार प्रभुके श्रीअङ्गोंकी ओर देखती हैं ॥ २ ॥
नाना भाँति निछावरि करहीं । परमानंद हरष उर भरहीं ॥ कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि । चितवति कृपासिंधु रनधीरहि ॥
- उत्तरकाण्ड *
११५
अनेकों प्रकारसे निछावरें करती हैं और हृदयमें परमानन्द तथा हर्ष भर रही हैं। कौसल्याजी बार-बार कृपाके समुद्र और रणधीर श्रीरघुवीरको देख रही हैं ॥ ३ ॥
हृदयं बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा ॥ अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे ॥
वे बार-बार हृदयमें विचारती हैं कि इन्होंने लंकापति रावणको कैसे मारा? मेरे ये दोनों बच्चे बड़े ही सुकुमार हैं और राक्षस तो बड़े भारी योद्धा और महान् बली थे ॥ ४ ॥
दो०—लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु।
परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु ॥ ७ ॥
लक्ष्मणजी और सीताजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको माता देख रही हैं। उनका मन परमानन्दमें मग्न है और शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है ॥ ७ ॥
लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला ॥ हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा ॥
लंकापति विभीषण, वानरराज सुग्रीव, नल, नील, जाम्बवान् और अंगद तथा हनुमान्जी आदि सभी उत्तम स्वभाववाले वीर वानरोंने मनुष्योंके मनोहर शरीर धारण कर लिये ॥ १ ॥
भरत सनेह सील व्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा ॥ देखि नगरवासिन्ह कै रीती। सकल सराहहिं प्रभु पद प्रीती ॥
वे सब भरतजीके प्रेम, सुन्दर स्वभाव, [त्यागके] व्रत और नियमोंकी अत्यन्त प्रेमसे आदरपूर्वक बड़ाई कर रहे हैं। और नगरनिवासियोंकी [प्रेम, शील और विनयसे पूर्ण] रीति देखकर वे सब प्रभुके चरणोंमें उनके प्रेमकी सराहना कर रहे हैं ॥ २ ॥
पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए ॥ गुर बसिष्ठ कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे ॥
फिर श्रीरघुनाथजीने सब सखाओंको बुलाया और सबको सिखाया कि मुनिके चरणोंमें लगे। ये गुरु बसिष्ठजी हमारे कुलभरके पूज्य हैं। इन्हींकी कृपासे रणमें राक्षस मारे गये हैं ॥ ३ ॥
ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे ॥ मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे ॥
[फिर गुरुजीसे कहा—] हे मुनि! सुनिये। ये सब मेरे सखा हैं। ये संग्रामरूपी समुद्रमें मेरे लिये बेड़े (जहाज) के समान हुए। मेरे हितके लिये इन्होंने अपने जन्मतक हार दिये (अपने प्राणोंतकको होम दिया)। ये मुझे भरतसे भी अधिक प्रिय हैं ॥ ४ ॥
११६
- रामचरितमानस *
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए । निमिष निमिष उपजत सुख नए ॥
प्रभुके वचन सुनकर सब प्रेम और आनन्दमें मग्न हो गये। इस प्रकार पल-पलमें उन्हें नये-नये सुख उत्पन्न हो रहे हैं ॥ ५ ॥
दो०—कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ।
आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ ॥ ८ ( क ) ॥
फिर उन लोगोंने कौसल्याजीके चरणोंमें मस्तक नवाये। कौसल्याजीने हर्षित होकर आशिषें दीं [और कहा—] तुम मुझे रघुनाथके समान प्यारे हो ॥ ८ (क) ॥
सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद।
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद ॥ ८ ( ख ) ॥
आनन्दकन्द श्रीरामजी अपने महलको चले, आकाश फूलोंकी वृष्टिसे छा गया। नगरके स्त्री-पुरुषोंके समूह अटारियोंपर चढ़कर उनके दर्शन कर रहे हैं ॥ ८ (ख) ॥
कंचन कलस बिचित्र सँवारे । सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे ॥
बंदनवार पताका केतू । सबन्हि बनाए मंगल हेतू ॥
सोनेके कलशोंको विचित्र रीतिसे [मणि-रत्नादिसे] अलंकृत कर और सजाकर सब लोगोंने अपने-अपने दरवाजोंपर रख लिया। सब लोगोंने मङ्गलके लिये बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ लगायीं ॥ १ ॥
बीथीं सकल सुगंध सिंचाई । गजमनि रचि बहु चौक पुराई ॥
नाना भाँति सुमंगल साजे । हरषि नगर निसान बहु बाजे ॥
सारी गलियाँ सुगन्धित द्वोंसे सिंचायी गयीं। गजमुक्ताओंसे रचकर बहुत-सी चौकें पुरायी गयीं। अनेकों प्रकारके सुन्दर मङ्गल-साज सजाये गये और हर्षपूर्वक नगरमें बहुत-से ढंके बजने लगे ॥ २ ॥
जहँ तहँ नारि निछावरि करहीं । देहिं असीस हरष उर भरहीं ॥
कंचन थार आरतीं नाना । जुबतीं सजें करहिं सुभ गाना ॥
स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ निछावर कर रही हैं, और हृदयमें हर्षित होकर आशीर्वाद देती हैं। बहुत-सी युवती [सौभाग्यवती] स्त्रियाँ सोनेके थालोंमें अनेकों प्रकारकी आरती सजकर मङ्गलगान कर रही हैं ॥ ३ ॥
करहिं आरती आरतिहर कें । रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें ॥
पुर सोभा संपत्ति कल्याना । निगम सेष सारदा बखाना ॥
वे आर्तिहर (दुःखोंको हरनेवाले) और सूर्यकुलरूपी कमलवनके प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामजीकी आरती कर रही हैं। नगरकी शोभा, सम्पत्ति और कल्याणका वेद, शेषजी और सरस्वतीजी वर्णन करते हैं— ॥ ४ ॥
- उत्तरकाण्ड *
११७
तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं । उमा तासु गुन नर किमि कहहीं ॥
परन्तु वे भी यह चरित्र देखकर ठगे-से रह जाते हैं (स्तम्भित हो रहते हैं) । [शिवजी कहते हैं—] हे उमा! तब भला मनुष्य उनके गुणोंको कैसे कह सकते हैं ॥५॥
दो०— नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस ।
अस्त भएँ बिगसत भई निरखि राम राकेस ॥ १ ( क ) ॥
स्त्रियाँ कुमुदिनी हैं, अयोध्या सरोवर है और श्रीरघुनाथजीका विरह सूर्य है [इस विरह-सूर्यके तापसे वे मुरझा गयी थीं] । अब उस विरहरूपी सूर्यके अस्त होनेपर श्रीरामरूपी पूर्णचन्द्रको निरखकर वे खिल उठीं ॥१ (क)॥
होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान ।
पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान् ॥ १ ( ख ) ॥
अनेक प्रकारके शुभ शकुन हो रहे हैं, आकाशमें नगाड़े बज रहे हैं । नगरके पुरुषों और स्त्रियोंको सनाथ (दर्शनद्वारा कृतार्थ) करके भगवान् श्रीरामचन्द्रजी महलको चले ॥१ (ख)॥
प्रभु जानी कैकई लजानी । प्रथम तासु गूह गए भवानी ॥
ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा । पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा ॥
[शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! प्रभुने जान लिया कि माता कैकेयी लज्जित हो गयी हैं । [इसलिये] वे पहले उन्हींके महलको गये और उन्हें समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया । फिर श्रीहरिने अपने महलको गमन किया ॥१॥
कृपासिंधु जब मंदिर गए । पुर नर नारि सुखी सब भए ॥
गुर बसिष्ठ द्विज लिए बुलाई । आजु सुधरी सुदिन समुदाई ॥
कृपाके समुद्र श्रीरामजी जब अपने महलको गये, तब नगरके स्त्री-पुरुष सब सुखी हुए । गुरु बसिष्ठजीने ब्राह्मणोंको बुला लिया [और कहा—] आज शुभ घड़ी, सुन्दर दिन आदि सभी शुभ योग हैं ॥२॥
सब द्विज देहु हरषि अनुसासन । रामचंद्र बैठहिं सिंघासन ॥
मुनि बसिष्ठ के बचन सुहाए । सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए ॥
आप सब ब्राह्मण हर्षित होकर आज्ञा दीजिये, जिसमें श्रीरामचन्द्रजी सिंहासनपर विराजमान हों । बसिष्ठ मुनिके सुहावने वचन सुनते ही सब ब्राह्मणोंको बहुत ही अच्छे लगे ॥३॥
कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका । जग अभिराम राम अभिषेका ॥
अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजै । महाराज कहैं तिलक करीजै ॥
वे सब अनेकों ब्राह्मण कोमल वचन कहने लगे कि श्रीरामजीका राज्याभिषेक सम्पूर्ण जगत्को आनन्द देनेवाला है । हे मुनिश्रेष्ठ ! अब विलम्ब न कीजिये और महाराजका तिलक शीघ्र कीजिये ॥४॥
११८
- रामचरितमानस *
दो०—तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ।
रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ॥ १० (क)॥
तब मुनिने सुमन्त्रजीसे कहा, वे सुनते ही हर्षित होकर चले। उन्होंने तुरंत ही जाकर अनेकों रथ, घोड़े और हाथी सजाये;॥ १० (क)॥
जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ।
हरष समेत बसिष्ठ पद पुनि सिरु नायउ आइ॥ १० (ख)॥
और जहाँ-तहाँ [सूचना देनेवाले] दूतोंको भेजकर माङ्गलिक वस्तुएँ मँगाकर फिर हर्षके साथ आकर बसिष्ठजीके चरणोंमें सिर नवाया॥ १० (ख)॥
नवाह्वपारायण, आठवाँ विश्राम
अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई॥
राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई॥
अवधपुरी बहुत ही सुन्दर सजायी गयी। देवताओंने पुष्पोंकी वर्षाकी झड़ी लगा दी। श्रीरामचन्द्रजीने सेवकोंको बुलाकर कहा कि तुमलोग जाकर पहले मेरे सखाओंको स्नान कराओ॥ १॥
सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए॥
पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुअरे॥
भगवान्के वचन सुनते ही सेवक जहाँ-तहाँ दौड़े और तुरंत ही उन्होंने सुग्रीवादिको स्नान कराया। फिर करुणानिधान श्रीरामजीने भरतजीको बुलाया और उनकी जटाओंको अपने हाथोंसे सुलझाया॥ २॥
अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई॥
भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई॥
तदनन्तर भक्तवत्सल कृपालु प्रभु श्रीरघुनाथजीने तीनों भाइयोंको स्नान कराया। भरतजीका भाग्य और प्रभुकी कोमलताका वर्णन अरबों शेषजी भी नहीं कर सकते॥ ३॥
पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए॥
करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे॥
फिर श्रीरामजीने अपनी जटाएँ खोलीं और गुरुजीकी आज्ञा माँगकर स्नान किया। स्नान करके प्रभुने आभूषण धारण किये। उनके [सुशोभित] अङ्गोंको देखकर सैकड़ों (असंख्य) कामदेव लजा गये॥ ४॥
दो०—सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ।
दिब्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ॥ ११ (क)॥