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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 910, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 910

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  • रामचरितमानस *

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत । सीता सहित अनुज प्रभु आवत ॥ सुनत बचन बिसरे सब दूखा । तृषावंत जिमि पाड़ पियूषा ॥

शत्रुको रणमें जीतकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु आ रहे हैं; देवता उनका सुन्दर यश गा रहे हैं। ये बचन सुनते ही [भरतजीको] सारे दुःख भूल गये। जैसे प्यासा आदमी अमृत पाकर प्यासके दुःखको भूल जाय ॥ ३ ॥

को तुम्ह तात कहाँ ते आए । मोहि परम प्रिय बचन सुनाए ॥ मारुत सुत मैं कपि हनुमाना । नामु मोर सुनु कृपानिधाना ॥

[भरतजीने पूछा—] हे तात! तुम कौन हो? और कहाँसे आये हो? [जो] तुमने मुझको [ये] परम प्रिय (अत्यन्त आनन्द देनेवाले) बचन सुनाये। [हनुमान्जीने कहा—] हे कृपानिधान! सुनिये, मैं पवनका पुत्र और जातिका वानर हूँ; मेरा नाम हनुमान् है ॥ ४ ॥

दीनबंधु रघुपति कर किंकर । सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर ॥ मिलत प्रेम नहि हृदयँ समाता । नयन स्वरत जल पुलकित गाता ॥

मैं दीनोंके बन्धु श्रीरघुनाथजीका दास हूँ। यह सुनते ही भरतजी उठकर आदरपूर्वक हनुमान्जीसे गले लगकर मिले। मिलते समय प्रेम हृदयमें नहीं समाता। नेत्रोंसे [आनन्द और प्रेमके आँसुओंका] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया ॥ ५ ॥

कपि तव दरस सकल दुख बीते । मिले आजु मोहि राम पिरीते ॥ बार बार बूझी कुसलाता । तो कहूँ देउँ काह सुनु भ्राता ॥

[भरतजीने कहा—] हे हनुमान्! तुम्हारे दर्शनसे मेरे समस्त दुःख समाप्त हो गये (दुःखोंका अन्त हो गया)। [तुम्हारे रूपमें] आज मुझे प्यारे रामजी ही मिल गये। भरतजीने बार-बार कुशल पूछी [और कहा—] हे भाई! सुनो, [इस शुभ संवादके बदलेमें] तुम्हें क्या दूँ? ॥ ६ ॥

एहि संदेस सरिस जग माहीं । करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं ॥ नाहिन तात उरिन मैं तोही । अब प्रभु चरित सुनावहु मोही ॥

इस सन्देशके समान (इसके बदलेमें देने लायक पदार्थ) जगत्में कुछ भी नहीं है, मैंने यह विचार कर देख लिया है। [इसलिये] हे तात! मैं तुमसे किसी प्रकार भी उग्रहण नहीं हो सकता। अब मुझे प्रभुका चरित्र (हाल) सुनाओ ॥ ७ ॥

तब हनुमंत नाड़ पद माथा । कहे सकल रघुपति गुन गाथा ॥ कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाई । सुमिरहिं मोहि दास की नाई ॥